भगवान् अतीत, नित्य और चिन्मात्र हैं। अतीत का मतलब आत्यन्तिक रूप से इत यानी कि गत। अर्थात् शब्दातीत,स्पर्शातीत
रूपातीत,रसातीत और गन्धातीत। इसीलिये गीताशास्त्र में वे कहते हैं कि मैं विषयातीत हूँ। मुझमें संसार तो है लेकिन मैं संसार में नहीं हूँ।
श्रुति कहती है कि मन और वाणी जहाँ ,जीव को पहुँचा कर लौट आते हैं ,ऐसे परब्रह्म के आनन्द को जान लेने वाला, निर्भय हो जाता है-
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।
आनन्दं ब्रह्मणः विद् वान् न विभेति कदाचन- तैत्तिरीय उपनिषद् ।
अब इस ऋषि वाणी का मतलब यह निकला कि संसार भयंकर और परमात्मा अभयंकर। संसार के सारे सुख-दुःखादि द्वन्द्व, भयमूलक हैं ,जिनसे मुक्ति का एक मात्र उपाय “द्वन्द्वातीतो द्वयातिगः” की शरण ग्रहण ही है।
अब मुक्ति का सन्दर्भ बन्धन से और भय का सम्बन्ध अभय से है। कहीं से बँधा है,अतः मुक्ति और भय है तो अभयता साकांक्ष हो जाती है।
बन्धन-मुक्ति और भयाभय की जन्म जन्मान्तर प्रवृत्ति का प्रवाह चलता रहता है।लेकिन मन की वृत्ति मायिक होने से वही कहानी दोहराई जाती है-
सो माया बस भयौ गोसाईं।
बन्ध्यौ कीर मर्कट की नाईं।।
और इसीलिये किसी ने यह भी कह दिया-
माया तू ठगिनी हम जानी।
लेकिन हम हैं कि ठगिनी को पहचान कर भी उसी में फँसे हुए हैं।
यह माया तो सर्वकारणकारण,जगद् के आधार, जगन्नियन्ता परम प्रभु की ही है।इसी से ये मायाधीश और हम अकिंचन जीव , मायाधीन।
हम माया के अधीन जीव जब तक परिणामी जगत् में आनंद खोजते हैं, तब तक शरीरान्तर भटकाव में ही रहते हैं।
इस भटकाव से बचने और नित्य आनंद की प्राप्ति के लिए हम भक्ति-स्तोत्र साहित्य एवं नाम-जपादि का आश्रय लेते हैं। और यह सब कुछ शब्द स्वरुप है।
इस शब्द की साधना ऐसे रूपारूप अर्थ में जाकर समाप्त होती है, जहाँ सब का विलय हो जाता है। तत्वतः शब्द से शब्दातीत की अवस्था। और यही अवस्थान है आनंद का ।
सृष्टि का अनुक्रम भी ऐसा ही है, जहाँ उस परमात्मा से आकाश और आकाश से शब्द तत्व उपजता है।लेकिन आनन्द के लिए शब्दातीत अथवा अर्थ की अपरिमित अवस्था की अनुभूति ही अनिवार्य है।
अतः शब्द साधन का चरम, अशब्द में लय है।
आकाश शरीर वाले परमात्मा और उनके गुणस्वरूप शब्द के अनुकम्प से वायु तत्व का सृजन है जो अस्थिचर्ममय देह में त्वचा द्वारा अनुभूयमान होता हुआ सम्पूर्ण शरीर में जीवनी शक्ति प्राण है।
इसी प्राण वायु रूप के प्रकारान्तर अन्य अपान, समान ,व्यान और उदान हैं, जिनसे शरीर व्यवस्थित बना रहता है। किन्तु इससे भी अतीत जाना होगा, क्योंकि प्राणाधार तो एकमेवाद्वितीय ही है।
आगे की मीमांसा में नेत्रेन्द्रिय से अग्राह्य क्रमशः आकाश और वायु द्वारा अग्नि की सृष्टि होती है,जो प्रत्यक्ष दृष्ट ” रूप ” है।
लेकिन इस रूप तत्व की साधना भी पूर्व की तरह रूपातीत को चरम बनाती है।
क्रमिक रूप से चलती यह सृजन यात्रा निराकार आकाश- वायु और साकार अग्नि से जल तत्व पर पहुँचती है ,जो शरीर में रस रूप में रसनेन्द्रिय द्वारा ग्राह्य है।और इसके भी पार” रसो वै सः ” की अनुभूति इसका परिणाम है।
अनन्तर की अन्तिम यात्रा का क्रमिक विकास, आकाश-वायु-अग्नि और जल से पृथ्वी तत्व पर आता है ,जो शरीर में गन्ध गुणस्वरूप में प्रतिष्ठित है, जहाँ कि इससे भी अतीत यानी कि गन्धातीत स्थिति की प्राप्ति ही गन्धोपासना का लक्ष्य है।
इस प्रकार शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध के परं पार होने पर अतीत, नित्य, चिन्मात्र आनन्दकारी सत्ता की प्राप्ति अपनी आत्मा में ही अनुभूत है, अन्यत्र नहीं।
जो आनंद सिन्धु सुखरासी।
सीकर ते त्रैलोक सुपासी।।
सो सुखधाम राम अस नामा।
अखिल लोक दायक विश्रामा।।
।।हरिश्शरणम्।।
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