गीता के चतुर्दश अध्याय के पचीसवें मन्त्र में भगवान् ने एक कठिन बात बड़ी सरलता से कही है, जिसका पालन करना अत्यन्त दुरूह है।उन्होंने कहा कि मनुष्य को मान और अपमान दोनों ही दशाओं में समान भाव से रहना चाहिए। लेकिन ऐसा प्रायः होता नहीं और मान- प्रतिष्ठा-बड़ाई होने पर मन में होता है कि हम तो इसके योग्य हैं, मुझे तो यह मिलना ही चाहिए था।अथवा हम इससे भी कहीं अधिक सम्मान के पात्र हैं, मुझे तो कम ही मिला।इसके विपरीत होन की दशा भी विचित्र है।
अपमान होने की स्थिति में सामर्थ्य वश प्रतीकार या स्वयं के शरीरादि को त्यागने तक की मनःस्थिति बन जाती है।
एक अनुकूल दशा है तो दूसरी प्रतिकूल,जिसे हमारे पूर्वज ऋषियों ने सुख और दुःख नाम दिया है। इस सम्मानजनित सुख की अवस्था से ऊपर भी एक सुखानुभूति है जिसे प्रतिष्ठा अथवा यश-कीर्ति से अभिहित किया गया है। मान-सम्मान और प्रतिष्ठा में वस्तुतः आधार-आधेय सम्बन्ध है।
सन्तशिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास इस लोकप्रतिष्ठा को हेय मानते हुए,उससे सावधान करते हैं-
सुत वित लोक ईषणा तीनी।
केहि कर मति इन्ह कृत न मलीनी।।
मतलब कि तीन मानवीय एषणाएँ हैं-सुतेषणा,वित्तेषणा और लोकेषणा।
गहन विचार करने पर यह भी प्रतीत होता है कि अन्तिम एषणा या कामना रहने पर अन्य दो तो अवश्य ही आ जायेंगी।क्योंकि लोकप्रतिष्ठा होने पर प्रचुर वित्त और पुत्रादि रूप में ,चाहे शिष्य-प्रशिष्य और सेवकादि ही क्यों न हों,अवश्य जुड़ जाते हैं।इस प्रकार एक ,मानजनित कारण से लोकेषणा तथा अन्य सुतवित्तादि स्वतः उपस्थित हो जाते हैं।
अब बात यह भी विचारने की है कि इस मान-सम्मान और लोकप्रतिष्ठा से होने वाली आनन्दानुभूति दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती ही जाती है। अब यह भी सत्य है कि इससे अहंकार का परिपोषण होने लगता है।यह अहंकार-अहंभाव या व्यर्थ का मिथ्याभिमान मनुष्य को पतन के गर्त में डाल कर तिर्यग् योनियों में भटकाता रहता है। और इस अहंभाव का मूलकारण प्रकृति के रजोगुण और तमोगुण तो ही हैं।
यही अहम् और मम(मैं-मेरा) का भाव बार-बार संसार जनक बनता है।
इसीलिये गोस्वामी जी “बड़े भाग मानुष तन पावा” और ” पाइ न जे परलोक सुधारा” की बात करते हुए मानवशरीर की दुर्लभता सिद्ध करके एक प्रसंग में इस मानापमान से ऊपर होने का सर्वोत्तम और सत्य उपाय बताते हैं-
गुन तुम्हार समुझहिं निज दोषा।
जेहिं सब भाँति तुम्हात भरोसा।।
इसमें भक्त भगवान से कहता है कि, हे भगवान्! मुझमें जो कुछ भी गुण है, वह तो आपका ही है और अवगुण हमारा।
मायिक पर्दे के कारण हम वास्तविक स्थिति और स्वस्वरूप को जान नहीं पाते।
इसी मानापमान में उलझ कर नीचे गिर जाते हैं।
” क्वचिदन्यतोपि” की सरणि में मेरे द्वारा सन्त मुख से यह भी सुना गया है कि मान-सम्मान से पुण्य क्षय होता है और अपमान से पापक्षय। अब संसार में कौन होगा जो पुण्य क्षय करना चाहेगा?
अतः मानापमान के संसारभाव से ऊपर उठकर ,सारे सद्गुणों को ईश्वरीय मानते हुए सम्मान प्राप्ति की दशा में उस परम पिता के प्रति कृतज्ञ होना ही सबसे उत्तम आनन्द का मूल है।
और इसी कारण गीता के द्वादश अध्याय में पहले ही भगवान् ने अर्जुन को लक्ष्य कर सारी मानवजाति को निन्दा और स्तुति के समय समान भाव में रहने का अमूल्य उपदेश दिया है-
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी।
सन्तुष्टो येन केनचित्।।
अतः समस्त मानव जाति हेतु इस सरल सी बात पर बुद्धि दृढ होनी चाहिए कि सारे गुणगण भगवान् के और अवगुण हमारे।
तभी यह जन्म सार्थक सिद्ध हो सकता है।
श्रीअनन्तानन्त श्रीभगवान् कृपा करें।
।। हरिश्शरणम्।।
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