अनेक स्थलों पर भक्ति की चर्चा आती है और भगवान् ने तो भक्त के ही चार स्वरूप बता दिया है-चतुर्विधा मां भजन्ते जना: सुकृतिनोर्जुन।आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।
आर्त,जिज्ञासु ,अर्थ को चाहने वाले और ज्ञानी ये चार प्रकार के मेरे भक्त हैं जिनमें ज्ञानी भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय है(तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त: एकभक्तिर्विशिष्यते।प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रिय:)अनन्य प्रेम वाला ज्ञानी भक्त मुझमें एकीभाव से स्थित है, क्योंकि वह तत्व दर्शी मुझसे प्रेम करता है और मैं उससे।
आगे कहते हैं-उदारा:सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थित: स हि युक्तात्मा मामे-
वानुत्तमां गतिम्।।
सभी भक्त उदार तो हैं, किन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा ही
स्वरूप है।वह उत्तम गतिस्वरुप
मुझमें अच्छी प्रकार स्थित है।
अन्त मे इस प्रकरण का संहरण करते हुए और भी स्पष्ट कर दिया-
बहूनां जन्मनामन्ते
ज्ञानवान्मां प्रपद्यते
वासुदेव:सर्वमिति
स महात्मा सुदुर्लभः।।
बहुत जन्मो को धारण करते हुए
अन्त मे तत्वज्ञ पुरष ही सब कुछ मुझे ही मानने वाला महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।
।।हरिश्शरणम्।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/07/11/भक्ति-भक्त-स्वरूप-2/