भक्ति और ज्ञान में अभेद

भक्ति शब्द सेवार्थक है ,तो ज्ञान का सम्बन्ध बुद्धि-विवेक से। दोनों एक दूसरे के परिपूरक और एकत्व विधायक भी।
श्रीमदाद्य भगवत्पाद आचार्य शङ्कर ,जब भक्ति का मतलब आत्मस्वरूप के परिज्ञान से करते हैं, तब भक्ति और ज्ञान एक दूसरे से अभिन्न प्रतीत होते हैं।
नारद भक्तिसूत्र में चर्चा है कि” भक्ति को किसी भी वासना की पूर्ति का साधन नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि वह तो सारी वासनाओं के निरोध का कारणस्वरूप है।”
“सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात्।”
और सेवार्थक भज् धातु इस बात को भी निश्चित करती है कि, जब सेवक की अपने सेव्य के प्रति समस्त क्रियाएँ समर्पित हों जायें तथा और उसके विस्मरण से व्याकुलता उत्पन्न हो जाय, तभी भक्ति का उदय समझे।
“नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारिता तद् विस्मरणे परमव्याकुलितेति।”
तब इस प्रकार स्वकीय ज्ञान का पर्यवसान अपने सेव्य में होना ही भक्ति का स्वरूप निश्चित होने से ज्ञान एवं भक्ति में एकत्व सिद्ध होता है।
कलिपावनावनावतार गोस्वामीजी भी भक्ति और ज्ञान में अभेद मानते हुए दोनों के द्वारा भवमुक्ति स्वीकारते हैं-

भगतिहिं ज्ञानिहिं नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भवसम्भव खेदा ।।

और भक्ति-ज्ञान की अखण्ड परिपूत अवस्था में भक्त तुलसी अपने आराध्य में
कैसे रससिक्त हैं।वे कहते हैं-

रामचरित जे सुनत अघाहीं।
रसविशेष जाना तिन नाहीं।।
वे कहते हैं “ज्ञान “तो एकमात्र मेरे प्रभु श्रीराम हैं और जीव माया के वशीभूत।
ज्ञान अखण्ड एक सीतावर।
मायावस्य जीव सचराचर।।

माया के द्वारा रचित सारे भेदाभेद यद्यपि व्यर्थ हैं, किन्तु बिना हरिसेवा के यह मायिक भेद जा भी नहीं सकता।
मुधा भेद यद्यपि कृत माया।
बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया ।।
भगवान् स्वयं अपने श्रीमुख से कहते हैं-
भगतिवन्त अति नीचउ प्रानी।
मोहिं प्रान प्रिय अस मम बानी।।
मतलब कि निम्न कुल और कर्मादि वाला प्राणी भी यदि मेरी भक्ति में प्रीति में एक निष्ठ हो ,तो वह मेरा अतिप्रिय है।
इसीलिये भगवान् ने गीता में एक बात कही है-
अपि चेत् सुदुराचारो,
भजते मामन्यभाक्।
साघुरेव स मन्तव्यः,
सम्यग् व्यवसितो हि सः।।

तात्पर्यतः ज्ञान स्वरूप परमात्मा में किन्हीं कारणों से जिस किसी ने भी आत्मस्वरूप को जान लिया है, वह अनन्यपरायण व्यक्ति जन्मजन्मान्तर के प्रारब्ध को छिन्न करके मुक्त हो जाता है।
यही भक्ति (सेवा)और ज्ञान(परमात्मा) के ऐक्य का परम रहस्य है।
अतः श्रद्धा -भक्ति और सदाचार पूर्वक अवतार-चरित्रों में सञ्जीवनी मानते हुए कलि के एकमेवाद्वितीय धर्म श्रीरामकृष्ण के नामजप का आश्रयण विश्वास पूर्वक
करना चाहिए-
बिनु विश्वास भगति नहिं,
तेहिं बिनु द्रवहिं न राम।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ,
जीव न लह विश्राम।।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/06/21/भक्ति-और-ज्ञान-में-अभेद/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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