जड चैतन्यव्यतिरेक कैसे हो

अब प्रश्न है कि जड चैतन्यव्यतिरेक कैसे हो?
अथवा इन गुणों से पार कैसे पाया जाय?

उत्तर साफ है कि इसमें सर्वप्रथम भगवत् कृपा ही मूल कारण है, जिससे आत्मजिज्ञासा और सद्गुरु का मिलन प्राप्त होता है।सद्गुरु गुणों से पार जाने का साधन, युक्ति, उपाय बताते हैं।तब साधक उसके अनुकूल साधन करके अविद्या को पार कर सकता है।वेदान्त ग्रन्थों मे अविद्यासे पार पाने या गुणों के चक्कर से छूटने के लिये व्यवस्था दी गई है-

“वाचं यच्छ मनो यच्छ प्राणान् यच्छेन्द्रियाणि च।आत्मानमात्मना यच्छ न भूयः कल्पसेध्वने:।”वाचं नियच्छात्मनि तं नियच्छ,बुद्धौ धियं यच्छ च बुद्धि-साक्षिणि।तं चापि पूर्णात्मनि निर्विकल्पे,विलोप्य शान्तिं परमां भजस्व।”

अर्थात् वाणी को स्वतंत्रता से रोक कर,मन मे लय करे ।मन को संकल्प विकल्प से हटा कर बुद्धि मे लय करे।बुद्धि को साक्षी आत्मा मे लय करे।आत्मा को पूर्ण चैतन्य मे लय करके शान्त हो जाय।

ओ3म् शान्ति:शान्ति:शान्ति:।

यही बात सर्वोत्कृष्ट उपदेष्टा भगवान् श्रीकृष्ण ने प्रकारान्तर से सरलीकृत, समूहालम्बीकृत करके इस सन्दर्भ पर पूर्ण विराम लगा दिया कि सर्वथा मत्परायण होकर ही मायापारगम्यता सम्भव है-

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।

|| हरिश्शरणम् ||

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/06/21/जड-चैतन्यव्यतिरेक-कैसे-ह/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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