अस प्रभु हृदय अछत अविकारी।
सकल जीव जग माहिं दुखारी ।।
जब ऐसे अक्षय निर्विकारी परमात्मा प्रभु हृदय में विराजते हैं, तब यह सारा संसार दुखी क्यों है? इसके दुःख का कारण क्या है? आनन्द घन घनश्याम के हृद्देश में रहने पर हमें उस आनन्द की अनुभूति आखिर क्यों नहीं?
ईश्वर अंश जीव अविनाशी।
चेतन अमल सहज सुखरासी।।
यह जीवात्मा ऐसे अविनाशी चेतनमात्र निर्मल स्वभावसिद्ध सुखराशि स्वात्म मात्र पर्यवसित ईश्वर का अंश है ,फिर पुनः दुखी क्यों है?
आगे पंक्तियों में उत्तर साफ-साफ दे देते हैं
सो माया बस भयेउ गोसाईं।
बँध्यौ कीर मर्कट की नाईं।।
और
भूमि परत भा ढाबर पानी।
जिमि जीवहिं माया लिपटानी।।
यह मानव जगत् माया की अधीनता परवशता स्वीकार कर लेने से कीर (तोते)और मर्कट(बन्दर) अथवा अन्यान्य पशु जीवों की तरह पीने खाने के पदार्थों में आकृष्ट होकर स्वयं बँध गया है।
जैसै वर्षा का निर्मल जल आकाश से गिरता तो है स्वच्छ रूप में किन्तु भूमि पर आकर गन्दा हो जाता है, उसी तरह इस मनुष्य की भी गति है,कि माया रूपी आपातरमणीय किन्तु दुख परिणामी ठगिनी के वशीभूत हो जाता है और इसको आत्मविस्मृति हो जाती है।इस तरह आनन्दी परमात्मा का का अंश बेचारा बार बार जीव जगत् का चक्कर लगाता फिरता है। और बात ये भी है कि अनेकानेक जन्मों के पश्चात् स्वकीय कर्मों और करुणा के अविकल कोश अंशी परमात्मा की कृपा से प्राप्त यह मानव शरीर उसी की प्राप्ति का साधनभूत है। मुक्ति का एकमात्र परम मार्गस्वरूप है,किन्तु-
फिरत सदा माया कर फेरा।
काल कर्म स्वभाव गुन घेरा।।
काम,क्रोधादि और अहंकार के कारण माया की अधीनता स्वीकार करके संसार चक्र में पड़ा हुआ है।
अब बात ये भी है कि बिना अंशी को प्राप्त किये इस अंश रूप मनुष्य का परम कल्याण भी सम्भव नहीं।और यही अंशी ही एक है जो हृद्गत और समस्त चर अजर में व्याप्त उसकी अनुभूति कर सकता है।
जब तक स्वयं में उसकी अनुभूति नहीं होगी तब तक कहीं भी और कभी भी उसकी अनुभूति सम्भव नहीं।
और स्वयं में अनुभूति होने के लिए सन्त भगवन्त की कृपा करुणा अनिवार्य है।
इस कृपाकरुणा की प्राप्ति हेतु उस अंशी का सतत स्मरण परम अनिवार्य है।
क्योंकि –विपद् विस्मरणं विष्णोः सम्पद्
नारायणस्मृतिः। उसको भूलना और उसकी स्वप्नवन्माया में भटकना ही विपत्ति का मूल और माया के गुणों बन्धनों में बँन्धन स्वीकारना तथा उस चिदानन्द घन का निरन्तर स्मरण रखना समस्त सुख शान्ति का मूल है और यही आत्मानुभूति भी है।
और इसलिये-
जब लगि उर न बसत रघुनाथा।
धरे चाप सायक कटि भाथा।।
ममता तमी तरुन अँधियारी ।
राग द्वेष उलूक सुखकारी ।।
तब लगि बसति जीव मन माहीं।
जब लगि प्रभु प्रताप रवि नाहीं।।
इसलिये संसार की अहंता ममता को छोड़ और निर्मल मन से प्रभुस्मरण ही आत्मानुभूति और उनकी कृपा प्राप्ति का एकमेव उपाय है-
मन क्रम बचन छाँड़ि चतुराई।
भजत कृपा करिहहिं रघुराई।।
सन्त भगवन्त की हो और तत्क्षण आत्मानुभूति हो जाय।
।।हरिश्शरणम्।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/05/03/आत्मानुभूति/