जगत् प्रकाश्य प्रकाशक रामू

यह जगत् प्रकाश्य है और इसके प्रकाशक श्रीराम हैं। कलिपावनावनावतार गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री राम को परमात्मरूप में चित्रित किया है। इसलिए वे उक्त बात कहते हैं कि यह संसार इन्हीं भगवान् के द्वारा प्रकाशित हो रहा है।
परमात्मा स्वयं प्रकाश स्वरूप है, जिनके प्रकाश से संसार प्रकाशित है।
और मनुष्य शरीर में इसी तरह आत्मा भी है,जिससे समग्र शरीर प्रकाशित है।
बात केवल अनुभव की है, कि हम इस प्रकाश का कितना ,कैसे और किस रुप में अनुभव करते हैं।
क्योंकि अनुभव (Perception) ही किसी भी अस्तित्व का अद्वितीय प्रमाण है। यह अनुभूति स्वयं ज्योति या स्वयं प्रकाश है। किसी भी इन्द्रियातीत ज्ञान से परे जाने के लिए इसी प्रकाशरूप आत्मा की आवश्यकता होती है।
यह अनुभूति ,अस्तित्व, भाव सभी एकार्थक सिद्ध हैं।क्योंकि सभी में पृथक् प्रत्यय अवश्य लगे हैं, कि धातु सभी में एक है, जिसका अर्थ सत्तात्मक है। आत्मा का अर्थ है आत्मीयते ,अर्थात् जो सबका मानदण्ड या प्रमाण हो।किन्तु उसका कोई प्रमाण नहीं हो।
इस प्रकार शरीर है तो उसमें और उससे अनेक अनुभव क्रियाएँ भी हैं। कोई अनुभव क्रिया संज्ञाविहीन नहीं है।प्रत्येक अनुभूति क्रिया का स्वरूप ही संज्ञात्मक है।और उपर्युक्त धात्विज अर्थ के अनुसार जब सत्ता और अनुभव एक वस्तु है तथा जिसका कोई कारण नहीं है, वही अनन्त है।इसीलिये अनुभूति स्वयमेव अपना चरम प्रमाण और अनन्तस्वरूप है।
अनुभूति,अस्तित्व या भाव जब स्वसंवेद्य है ,तब यह स्वयं ज्ञाता स्वरूप है।
यह स्वयं ज्ञातृत्व मन का धर्म नहीं, किन्तु इसके रहने से मन रहता है।यही एकमेव अनुभूति ही स्वप्रकाश रूप आत्मा है।और यह आत्मा है परमात्मा का अंश।इसीलिये वेद में –द्वासुपर्णा सयुजा सखाया..इत्यादि के द्वारा जीवात्मा को प्रारब्धवश भोगी और परमात्मा को आनन्दमात्र स्वरूप चित् सिद्ध किया है।
वास्तव में एकमेवाद्वितीय आत्मा ही अनेक शरीर गामी जीवात्मा पद वाच्य है, जहाँ पंचप्राण एकीभूत हैं और उसका नियामक आत्मा ही है। यही जीवात्मा परमात्मा है। अन्य को अन्य समझना भ्रमादि वश है,जो मायिक है।
यह अनुभूति ,भाव ,स्वयं ज्योति ही केवल मायिक नहीं अतः यही अमायिक राम हैं।इन्हें आत्मा में ही उपासित किया जा सकता है और केवल आत्मोपासना से ही मुक्ति प्रकट होगी।इसीलिये आदि शङ्कर ने अपने आत्म स्वरूप के आन्तरिक अनुसन्धान को भक्ति कहा-
“स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते”
और इसलिये एक सुन्दर सा दोहा इस समस्त विचार को समेटता है-

कस्तूरी कुण्डल बसै ,मृग ढूँढै बन माहिं।
ऐसे घट-घट राम हैं ,दुनिया दखै नाहिं।।

बालकाण्ड में भगवान् शिव ,माता पार्वती से उनके प्रश्न के उत्तर में इन्ही अनुभव ही एकमात्र प्रमाणवाले श्रीराम को बताते हैं-

विषय करन सुर जीव समेता।
सकल एक ते एक सचेता।।
सब कर परम प्रकाशक जोई।
राम अनादि अवध पति सोई।।

अर्थात् शब्द,स्पर्श, रूपादि विषयों का प्रकाश इन्द्रियों द्वारा होता है और इन्द्रियों का प्रकाशन तत् तत् स्थानीय देवों द्वारा।
क्योंकि-
इन्द्री द्वार झरोखे नाना।
जहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।।
सभी पञ्च ज्ञानेन्द्रियों और छठवें मन आदि सभी में तत्तत् स्थानिक देवों का निवास है। और इन ऐन्द्रिक देवों का भी प्रकाशक जीवात्मा स्वयं है।इस तरह ये विषय, इन्द्रियाँ, तद्गत देवता गण और जीवात्मा सभी क्रमशः एक की सहायता से एक चिद्रूप होते हैं।
इन सभी का जो प्रकाशक है,वह “परम” अर्थात् परमात्मा है, जो परमात्मा और कोई नहीं प्रत्युत अनादि अनन्त अयोध्या के नरेश भगवान् श्री राम हैं।

अब कहते हैं-

जगत् प्रकाश्य प्रकाशक रामू।
मायाधीश ग्यान गुन धामू।।
जासु सत्यता ते जड़ माया।
भास सत्य इव मोह सहाया।।

मतलब कि इस प्रकाश्य जगत् के प्रकाशक मायाधीश स्वयं भगवान् श्रीराम हैं।ये ज्ञान और गुणों के धाम हैं।इन्हीं की आंशिक आत्मा रूप सत्ता, अस्तित्व, भाव, भावना, अनुभूति,और स्वयं ज्योति की सहायता पाकर मोह(अज्ञान)वश माया भी सत्य जैसी दीख रही है।
क्योंकि-

रजत सीप महुँ भास जिमि,
यथा भानु कर वारि।
जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ,
भ्रम न सकै कोउ टारि।।

जैसे सीप में चाँदी और सूर्य की किरणों में जल की प्रतीति होती है, यद्यपि यह प्रतीति तीनों कालों में असत्य है, फिर भी इस भ्रम को कोई हटा नहीं पाता।
और इसलिये-

जो आनंद सिन्धु सुखराशी।
सीकर तें त्रैलोक सुपासी।
सो सुख धाम राम अस नामा।
अखिल लोक दायक विश्रामा।।

आनन्द के सागर ,सुख की राशि और जिनके सीकर (एक जलकण) मात्र से तीनों लोकों का पोषण होता है, ऐसे ब्रह्माण्ड के चरम विश्राम स्थान श्री राम की स्वयं प्रकाश रूप में स्वात्मा में अनुभूति ही वरेण्य है। अनन्त जन्मो से भटके और नाना शरीरों में अटके इस मन को उन्हीं प्रभु चरणों में डालना होगा तभी एकाश्रित होकर यह आत्मदेव के रूप में उनके दर्शन का साधन हो पायेगा। भगवान् सहायता करें।

।।हरिश्शरणम्।।

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यक्ष – युधिष्ठिर संवाद

का वार्ता किमाश्चर्यं कः पन्थाः कश्च मोदते।
इति मे चतुरः प्रश्नान् पूरयित्वा जलं पिब ।।

सबसे बड़ी बात क्या है?
सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?
संसार में चलने का मार्ग क्या है?
संसार में कौन आनन्दित होता है?

1-मासर्तु वर्षाःपरिवर्तनेन
सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन।
अस्मिन् महामोहमये कटाहे
भूतानि कालः पचतीति वार्ता।।

इस संसार रूपी महा मोहमय कड़ाही में मास,वर्ष आदि ऋतुओं के परिवर्तन से, सूर्यरूप अग्नि के ईंधन से रात्रिऔर दिन का काल प्राणियों को पकाता है।इस बात का अहसास मनुष्य को नहीं होता, यही सबसे बड़ी बात है।

2-अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यममन्दिरम्
शेषाः जीवितुमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतःपरम् ।।

प्रतिदिन प्राणी संसार को त्याग कर यमलोक सिधार रहे हैं।इसे देखने के बाद भी अन्य लोग जीने की इच्छा पाल कर सोचते हैं, हम ऐसे ही रहेंगे।इससे बड़ा आश्चर्य क्या है?

3-श्रुतयो विभिन्ना स्मृतयो विभिन्नाः
नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् ।
धर्मस्य तत्वं नहितं गुहायां
महाजनो येन गतः स पन्थाः।।

श्रुतियाँ अनेक ,स्मृतियाँ भी अनेक हैं।कोई
एक भी ऐसे ऋषि नहीं हैं, जिनका ही केवल एक वचन प्रमाण रूप माना जा सके।और धर्म का तत्व भी बड़ा गूढ़ है।अतः श्रेष्ठ जन जिस मार्ग पर चले हैं, वही मार्ग ग्रहण करना चाहिए।

4-दिवसस्याष्टमे भागे शाकं पचति स्वे गृहे।
अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते।।

हे जलचर प्राणी! दिन के आठवें भाग यानी कि सुबह शाम जो अपने घर में शाक आदि पूर्ण अन्न भोजन करता है।साथ ही जिस पर कोई ऋण न हो और जिसे जीविका वश अन्यत्र प्रवास नहीं करना पड़ता, वही इस संसार का सबसे सुखी प्राणी है।

।।हरिश्शरणम्।।

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आत्मानुभूति

अस प्रभु हृदय अछत अविकारी।
सकल जीव जग माहिं दुखारी ।।

जब ऐसे अक्षय निर्विकारी परमात्मा प्रभु हृदय में विराजते हैं, तब यह सारा संसार दुखी क्यों है? इसके दुःख का कारण क्या है? आनन्द घन घनश्याम के हृद्देश में रहने पर हमें उस आनन्द की अनुभूति आखिर क्यों नहीं?
ईश्वर अंश जीव अविनाशी।
चेतन अमल सहज सुखरासी।।
यह जीवात्मा ऐसे अविनाशी चेतनमात्र निर्मल स्वभावसिद्ध सुखराशि स्वात्म मात्र पर्यवसित ईश्वर का अंश है ,फिर पुनः दुखी क्यों है?

आगे पंक्तियों में उत्तर साफ-साफ दे देते हैं

सो माया बस भयेउ गोसाईं।
बँध्यौ कीर मर्कट की नाईं।।
और
भूमि परत भा ढाबर पानी।
जिमि जीवहिं माया लिपटानी।।

यह मानव जगत् माया की अधीनता परवशता स्वीकार कर लेने से कीर (तोते)और मर्कट(बन्दर) अथवा अन्यान्य पशु जीवों की तरह पीने खाने के पदार्थों में आकृष्ट होकर स्वयं बँध गया है।
जैसै वर्षा का निर्मल जल आकाश से गिरता तो है स्वच्छ रूप में किन्तु भूमि पर आकर गन्दा हो जाता है, उसी तरह इस मनुष्य की भी गति है,कि माया रूपी आपातरमणीय किन्तु दुख परिणामी ठगिनी के वशीभूत हो जाता है और इसको आत्मविस्मृति हो जाती है।इस तरह आनन्दी परमात्मा का का अंश बेचारा बार बार जीव जगत् का चक्कर लगाता फिरता है। और बात ये भी है कि अनेकानेक जन्मों के पश्चात् स्वकीय कर्मों और करुणा के अविकल कोश अंशी परमात्मा की कृपा से प्राप्त यह मानव शरीर उसी की प्राप्ति का साधनभूत है। मुक्ति का एकमात्र परम मार्गस्वरूप है,किन्तु-

फिरत सदा माया कर फेरा।
काल कर्म स्वभाव गुन घेरा।।

काम,क्रोधादि और अहंकार के कारण माया की अधीनता स्वीकार करके संसार चक्र में पड़ा हुआ है।
अब बात ये भी है कि बिना अंशी को प्राप्त किये इस अंश रूप मनुष्य का परम कल्याण भी सम्भव नहीं।और यही अंशी ही एक है जो हृद्गत और समस्त चर अजर में व्याप्त उसकी अनुभूति कर सकता है।
जब तक स्वयं में उसकी अनुभूति नहीं होगी तब तक कहीं भी और कभी भी उसकी अनुभूति सम्भव नहीं।
और स्वयं में अनुभूति होने के लिए सन्त भगवन्त की कृपा करुणा अनिवार्य है।
इस कृपाकरुणा की प्राप्ति हेतु उस अंशी का सतत स्मरण परम अनिवार्य है।

क्योंकि –विपद् विस्मरणं विष्णोः सम्पद्
नारायणस्मृतिः।
उसको भूलना और उसकी स्वप्नवन्माया में भटकना ही विपत्ति का मूल और माया के गुणों बन्धनों में बँन्धन स्वीकारना तथा उस चिदानन्द घन का निरन्तर स्मरण रखना समस्त सुख शान्ति का मूल है और यही आत्मानुभूति भी है।
और इसलिये-
जब लगि उर न बसत रघुनाथा।
धरे चाप सायक कटि भाथा।।
ममता तमी तरुन अँधियारी ।
राग द्वेष उलूक सुखकारी ।।
तब लगि बसति जीव मन माहीं।
जब लगि प्रभु प्रताप रवि नाहीं।।

इसलिये संसार की अहंता ममता को छोड़ और निर्मल मन से प्रभुस्मरण ही आत्मानुभूति और उनकी कृपा प्राप्ति का एकमेव उपाय है-
मन क्रम बचन छाँड़ि चतुराई।
भजत कृपा करिहहिं रघुराई।।

सन्त भगवन्त की हो और तत्क्षण आत्मानुभूति हो जाय।

।।हरिश्शरणम्।।

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