मन का भटकाव/ठहराव

यह मन भी बड़ा विचित्र है। अनेक जन्मों और शरीरों के धारण का कारण यह मन ही तो है , जिसके भटकाव से चित्त अस्थिर है और कहीँ विश्रान्ति नहीं मिली।
विषयों का आसंगी यह बेचारा एक कामना के पूरा होते ही दूसरे की ओर दौड़ पड़ता है।और कबीर ने इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहा-
माला फेरत जुग भया फिरा न मन फेर।
कर का मनका डारि दे मन का मनका फेर

माया के झाँसे में पड़ कर इसकी विवशता तो देखिये कि इसी के इधर-उधर विषयोँ में फिरते रहने से अनेक युग ही बीत गए और यह अब तक भटकाए ही जा रहा। कबीर ने कहा कि इसलिए कर में लिए हुए गोलाकार माले के मनके दाने को छोड़ कर अब मन के मनके को फिराने को सोचना चाहिए।क्योंकि जब तक यह विषयों में फिरता रहेगा और उन विषयों से नहीं फिरेगा यानी कि विमुख नहीं होगा, तब तक परम शान्ति और विश्रान्ति नहीं मिलेगी।
और यदि किसीने इस मन को मूड़ लिया या विषयों से मोड़ लिया, तो बार बार सिर मुड़ाने की जरूरत नहीं-
केसन कहाँ बिगारिया जे मुंडे सौ बार।
मन को काहे न मूड़िये, जाने विषय विकार

भगवान् ने गीता में इसीलिए इस मन को बन्धन /मुक्ति का कारण कह दिया-
मन एव मनष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः

और कबीरवाणी ये भी है कि यदि इस मन को वैराग्य अभ्यास के द्वारा भगवन् नाम और भजन में बाँधकर निर्मल कर लिया जाय तो यह गंगा की तरह परम पवित्र हो जायेगा और भगवान् भी उस भाग्यवान् के अनुगामी हो जायेंगे-

कबिरा मन निर्मल भया जैसै गंगा नीर।
पाछे पाछे हरि फिरैं कहत कबीर कबीर।।

लाखन में एक बात तुलसी बताये जात।
जन्म जो सुधारो चाहो तो राम नाम लीजिए।।
और यह भगवन् नाम जपने रटने की ही महिमा है माहात्म्य है कि मन निर्मल हो जायेगा केन्द्रित और नियन्त्रित हो जायेगा, एकत्व को प्राप्त हो जायेगा और कोई आत्मा से महात्मा भी हो जायेगा-

मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्।
मनस्यन्यद् वचस्यन्यद् कर्मण्यन्यद् दुरात्मनाम् ।।

भगवान् श्रीराम ने इसीलिये स्पष्ट कहा था कि-
मोहि कपट छलछिद्र न भावा।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।।
और इसीलिए चैतन्य वाणी का नाद भी इसी भगवन् नाम को रटने,गद्गद वाणी और गलदश्रु होकर रोमांचित होकर जीवन धन्य बनाने को बैचैन है-

नयनं गलदश्रुधारया वदनं गद्गदया गिरा।
पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नामग्रहणे भविष्यति।।

और मन्मना भव मद्याजी मद्भक्तः मां नमस्कुरु का गीतानाद इन्ही विषयों में अटके भटके मन को बाँध कर मायाधीश के चरणों में समर्पण करके परमात्म भाव में अनन्त शान्ति पाने का मन्त्र है।
इसी भाव को कबीर ने स्मरण करते हुए मन के मरने या नाम में रमने पर माया के मरने तथा सद्यः मुक्ति और आत्मलाभ की बात कह डाली है-

मन मरा माया मरी हंसा बेपरवाह।
जाको कछू न चाहिए सो शाहन का शाह

अतः अपवित्र विषयों के राग से मुक्ति और मूलतः बन्धन मुक्ति हेतु नामजप में बँधने पर ही अन्तिम आत्यन्तिक शान्ति की प्राप्ति सम्भव है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/04/06/मन-का-भटकाव-ठहराव/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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