मनुष्य का नित्य वैरी काम

धर्म ,अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों के मध्य में पड़ा काम तो अराजक नहीं दीखता, क्योंकि उस पर धर्म का अंकुश जो है । और काम- क्रोधादि षड् रिपु वर्ग में परिगणित जो काम है,वह भी सृष्टि व्यवहार के लिये ही निर्धारित है, उस पर भी धर्म का अंकुश अनिवार्य है।
किन्तु धर्म मर्यादा को त्यागने वाला काम ,निश्चय ही पशु ( सर्वम् अविशेषेण सामान्येन पश्यति इति पशुः) आचरण में पतन करा देता है। पशु का मतलब, जिसका आचरण धर्म विहीन हो। इस प्रकार सब में अविशेष अर्थात् सामान्य बोध-व्यवहार वाला प्राणी पशु है ,जिसके लिये कोई आचार नियत नहीं है।जो केवल और केवल भोग के लिये ही शरीर धारण किए है,वह पशु है।
किन्तु अनेक जन्मार्जित पुण्य और प्रभु कृपा से प्राप्त देव दुर्लभ यह मनुष्य शरीर भी ,यदि उसी पशु प्रवृत्ति या भोगवृत्ति में पड़ जाये तो इससे बड़ा पाप क्या होगा?
अधर्म पूर्वक सेवित काम , मानव का सबसे बड़ा शत्रु है।और यह जगद् विदित तथ्य है कि मनुष्य और पशु में अन्तर करने वाला भेदक तत्व धर्म ही है।
अब श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय में अर्जुन की जिज्ञासा देखें, जब प्रश्न उठता है कि ,वह कौन है ,जो बल पूर्वक राजा की से प्रयुक्त सेवक की तरह,मनुष्य को पाप कर्म में लगा देता है?

अथ केन प्रयुक्तोयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:

इस पर भगवान् ने उत्तर दिया-

काम एषः क्रोध एषः रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्धि एनमिह वैरिणम्

मतलब कि रजोगुण से उत्पन्न होने वाला यह काम ,मनुष्य का सबसे प्रबल शत्रु है।
एक काम या कामना की पूर्ति होते ही, दूसरी आकर खड़ी हो जाती है। और उसके बाद यह अनेक रूप, आकार, प्रकार और परिमाण में वृद्धि को प्राप्त होता रहता है।हमेशा अविश्रान्त ही रहने वाला यह विषयसंगी कामशत्रु ,जब कभी पूरा नहीं होता तब, इसका आत्मज क्रोध आकर दस्तक देता है ।रजोगुणसमुद्भव यह काम ,अपूर्ण रहने पर जब क्रोध पुत्र को पैदा करता है, तब मेरे विचार से क्रोध तमोगुण को स्पर्श कर लेता है, और मनुष्य को असंतुलित करके एकदम से गिरा देता है। क्रोध पाप कर मूल।
भगवान् तो इन दोनों पिता-पुत्रों ,काम-क्रोध को महा अशन करने वाला, कहते हैं। महा अशन का मतलब कि बहुत खाने वाले और कभी भी तृप्त न होने वाले।
भगवान् आगे इसका स्वभाव बताते हुए कहते हैं कि ये नित्यवैरी काम, मनुष्य के ज्ञान को आच्छादित करके इन्द्रिय, मन और बुद्धि पर अधिष्ठित होकर जीवात्मा को नाना प्रकार से मोह में फँसाए रखता है।

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्।।
गीता- 3/39-40 ।
इस तरह के ज्ञानविज्ञान नाशी कामक्रोध को ,स्वयं इन्द्रियों को वश में करके त्याग देना चाहिए –

पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्।
जहि शत्रुं महाबहो कामरूपं दुरासदम्।।
गीता- 3/ 41-43 ।
उधर मानस में भी जब विभीषण ,प्रभु राम से मिलने आते हैं, और वानर समुदाय शंका करता है यह कामी-क्रोधी राक्षस क्यों आया है?
जानि न जाइ निशाचर माया।
कामरूप केहि कारन आया।।
तब त्रिकालज्ञ भगवान् उस विभीषण को निर्मल मन वाला निर्दिष्ट करके अपनाने की बात करते दीखते हैं-
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।।

इस प्रकार कामक्रोधादि राक्षसी वृत्ति को त्यागना पड़ेगा और मनुष्य के स्वभाविक सन्त सरल स्वभाव को अपनाना होगा, तभी भगवान् की कृपा प्राप्त होगी और कल्याण भी सम्भव है-

मन क्रम बचन छाँड़ि चतुराई।
भजत कृपा करहहिं रघुराई।।

यह सरलता और सन्तस्वभावता शबरी के नवधा भक्ति प्रसंग में नवीं भक्ति है-

नवम सरल सब सन छल हीना।।

अतः मानव जीवन को अमानव या दानव पशु अधम बना देने वाले इन बाप बेटों से अत्यन्त सावधानी बरतनी चाहिए,क्योंकि ये आत्मा का नाश कर देने वाले नरकद्वार भी हैं-
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामःक्रोधःतथा लोभः तस्मादेतत्रयं त्यजेत्

गीता-अध्याय- 16 मन्त्र 21 ।
अतः भगवान् कृपा करें और उन बाप-बेटों काम-क्रोध से मुक्ति हो।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/04/06/मनुष्य-का-नित्य-वैरी-काम/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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