मायिक भ्रान्ति का नाश रामनामद्वारा

माया , मा मतलब नहीं ,या मतलब जो,अर्थात् जो नहीं, वह दीखे और जो दिखे,वह वह नहीं ।
तुलसी कृत रामचरितमानस में एक साथ ,श्रीरामकथा के तीन वक्ता-श्रोता हैं-
भगवान् शिव-पार्वती, याज्ञवल्क्य-भरद्वाज
कागभुशुण्डि-गरुड़।इस गूढ कथा में –
गो गोचर जहँ लगि मन जाई।
सो सब जानेहु माया भाई।।

अरण्यकाण्ड के दोहा सं.14 के बाद उक्त चौपाई आई है। इसमें इस माया के अविद्या और विद्या माया रूप से दो भेद –
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ।विद्या अपर अविद्या दोऊ।। कहा गया है।
मूलतः उक्त राम-कथा -रचि महेश निज मानस राखा पाइ सुसमउ शिवा सन भाखा,की उक्ति से शिव-पार्वती संवाद ही है।
ऊपर कही चौपाई के अनुसार – मन तथा, गो=इन्द्रिय , से चर= गम्य, जो भी पदार्थ हैं, वे सभी माया (अविद्या माया) हैं।
इस सुन्दर संसार की समस्त रचना प्रपंच विस्तार के मूल में यही माया,अविद्या माया ही है ।आखिर इस अविद्या माया की विद्यमानता नहीं हो तो, संसार भी रचा कैसे जा सके?
अतः इसकी उपस्थिति और इससे जन्य भ्रमादि भी आवश्यक ही है ।लेकिन , केवल और केवल बात इतनी सी ही है, कि
हमें इसके एक और दूसरे भेद यानी कि –
विद्या माया का स्मरण भी नित्य बनाये रखना होगा।
यह विद्या माया भगवान् की चिर संगिनी, नित्य, शुद्ध,बुद्ध और स्वयं चैतन्य है।यह अनादि परम पुरुष की परमा चित् है सर्वकारण कारण है।इसीलिये लगता हमारे आर्ष ग्रन्थों में यहाँ तक आते-आते ,
एक ब्रह्म की दृष्टि दृष्ट है।
मानसकार की, वेद- ऋषि-संमत दृष्टि भी यही बात बोलती है- तुम्ह जो कहा राम कोउ आना ।जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना।। राम कोई अन्य नहीं , ये तो वही हैं, जो वेदवर्णित मुनियों के ध्यान के मूल हैं।
बालकाण्ड के दोहा 114 के पूर्व उक्त चौपाई के बाद दोहा 115 के पश्चात्-
राम ब्रह्म व्यापक जग जाना।
परपानन्द परेस पुराना।।
इस पंक्ति से भगवान् श्रीराम को ब्रह्म सिद्ध कर दिया।यही परमात्मा और परम आनन्द सर्वव्यापी हैं। निर्गुण रूप में नित्य और विद्यामाया से विहित यही ,सगुण रूप में भक्त-भक्ति, जीव-प्रेम निष्ठा से राम रूम में अयोध्या में अवतरित होते हैं।
हरष विषाद ज्ञान अज्ञाना।
जीव धर्म अहमिति अभिमाना।।

यह जीव का अविद्या माया रचित या प्रेरित
हर्ष-विषाद,अज्ञानावृत ज्ञान का अहं वश अभिमान है, कि हम उन्हे समझ नहीं पाते
निज भ्रम नहिं समुझहिं अज्ञानी।
प्रभु पर मोह धरहिं जड प्रानी।।
और एक बात और है कि जो निर्गुण है वह सगुण कैसे हुआ, यह भ्रम नहीं होना चाहिए ,क्योंकि जैसे जल और ओले में कोई भेद नहीं दोनों जल ही हैं, वैसे ही निर्गुण (ब्रह्म)और सगुण ब्रह्म रूप राम में
भी कोई भेद नहीं।
इसलिये सभी के प्रकाशक और स्वयं प्रकाश्य सूर्य की भाँति इन श्रीराम को मायाधीश ज्ञान गुन का धाम मानना चाहिए।और स्वाभाविक भी है कि इनकी भक्ति- यज्ञ( सेवन नाम स्मरण पूजन संगति करण दान) से अथवा विवश होकर(विना इच्छा के)भी नाम ले लेने से अनेक जन्मार्जित पाप जल जाते हैं-
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं।
जनम अनेक रचित अघ दहहीं।।

और बात, संसार के बने रहने और मोह के कारण निरानन्द को भ्रमवश आनन्द मानने की करें तो वही ऊपर कही गई अविद्या माया आ जाती है, जिसके कारण सीपी में चाँदी और सूर्य किरणों में पानी( बिना हुए भी ) प्रतीति होती रहती है।
रजत सीप महुँ भास जिमि,
जथा भानु कर वारि।
जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ,
भ्रम न सकै कोउ टारि।।
अतः इस अविद्या मायिक भ्रम को दूर करनेमें एकमात्र कारण और सभी के परम प्रकाशक स्वयं प्रकाश्य अनादि अवधपति विद्यामायाधीश को भजना ही श्रेषठतम है-
सब कर परम परम प्रकाशक जोई।
राम अनादि अवधपति सोई।।
जगत प्रकाश्य प्रकाशक रामू।
मायाधीश ज्ञान गुन धामू।।
और इनका सादर स्मरण मात्र तो ऐसा कि जैसे इस भवसागर रूप संसार सागर को कोई गाय द्वारा निर्मित छोटे से गड्ढे को बड़ी आसानी से पार कर ले-
इसलिए
उमा कहहुँ यह अनुभव अपना।
सत हरि भजन जगत सब सपना।।
और
सादर सुमिरन जे नर करहीं।
भव बारिधि गोपद इव तरहीं।।
और यही बात जैसा कि शिव-पार्वती संवाद है ,वही कागभुशुण्डि-गरुड संवाद भी है-
सुनु सुभ कथा भवानि,
रामचरितमानस बिमल।
कहा भुशुण्डि बखानि,
सुना बिहगनायक गरुड।।
सो संवाद उदार ,
जेहि बिधि भा आगे कसब।
सुनहु राम अवतार,
चरित परम सुन्दर अनघ।।
हरि गुन नाम अपार,
कथा रूप अगनित अमित।
मैं निज मति अनुसार,
कहहुँ उमा सादर सुनहु।।
बालकाण्ड दोहा,120,क-ख-ग

।। हरिश्शरणम् ।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/03/08/मायिक-भ्रान्ति-का-नाश-राम/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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