शब्द ही समग्र का आधार है,क्योंकि सृष्टि का आदि अक्षर जो ओङ्कार है। यह शब्द अक्षर होने से अविनाशी भी है। उच्चरित होने पर यह ध्वनि रूप या नाद रूप है। सीमातीत आकाश में इस नादात्मक ध्वनि रूप शब्द का श्रवण होने पर इसका अनु श्रवण भी श्रवणेन्द्रिय द्वार द्वारा ही होता है।और विचार करने पर इस शब्द की प्राप्ति में कोई अर्थ तत्व दिखाई देता है।
अतः मूलतः अर्थ की अनुभूति कराने के लिये होने वाली किसी एक शब्द की अनुगूँज प्रायः अनेक अर्थों की प्रकाशिका बन जाती है।
शब्द एक अर्थ अनेक। किसी अर्थ या प्रयोजन विशेष हेतु जब तक शब्द का उच्चारण नहीं होगा सामान्यतः कोई अर्थ लोकग्राह्य नहीं होगा। अर्थ का नेत्र गोचर कोई रूप नहीं है, शब्द का भी नहीं,किन्तु शब्द लिपिबद्ध होकर ,चक्षु – श्रवणेन्द्रिय गत हो जाता है।
निष्कर्ष में अर्थ के कथन में शब्द के उच्चारण की अनिवार्यता दृष्ट होने से ,शब्द में कोई शक्ति या बल दिखाई देता है, जिससे अर्थोपलब्धि होती है।
औपनिषदीय एवं वैयाकरण अवधारणा में यह अर्थ और शब्द दोनों ” ब्रह्म ” हैं। जिसको धारण करने की क्षमता “आकाश” तत्व में है। और इसीलिये ब्रह्म को आकाश शरीर वाला कहा गया(आकाशशरीरं ब्रह्म)
“आकाश “तत्व किसी भी स्पर्श, रूप ,रस और गन्ध से विहीन ,केवल अर्थ एवं शब्द का अनुग्राहक मात्र है। इसमें किसी सद्रजस्तमो गुणादि का लेश नहीं।
आकाश में शब्दोच्चारण होने पर ,उक्त सत्वादि के न्यूनाधिक्य की मात्रा के कारण
प्रत्येक मनुष्य को पृथक्- पृथक् गुणों की अनुभूति होती है,क्योंकि शब्द में तो गुणों का आधान है ही।
यह वही आकाश तत्व है, जो प्राणिमात्र के समस्त कर्मों का साक्षी चिन्मात्र और स्वयं निर्गुण स्वरूप है। यह साक्षी इसलिये भी है, क्योंकि इसी में अन्य चारों महाभूतों – वायु,अग्नि, जल,पृथ्वी सहित समग्र स्थावर जंगम प्रकृति प्रतिबिंबित है।
सृजन की प्रक्रिया का प्रथमाधार यह आकाश, ब्रह्मवत् या आत्मवत् सारे जगत् की क्रिया-प्रतिक्रिया, घात-प्रतिघात और चेष्टा-प्रतिचेष्टा का अमूर्त द्रष्टा है।
वर्तमान में आत्मप्रवंचना के प्राकृत रूप में शिक्षामन्दिरों में “नकल “की प्रक्रिया ने आज जब भयावह रूप ग्रहण कर लिया है, तब विवश होकर यह वही आकाश तत्व है,जो भौतिक रूप में चलते फिरते “कैमरे” का रूप लेकर हमारे शब्द, अर्थ, स्वरूप, क्रियाओं और चेष्टाओं को कैद करके ,हमारी भर्त्सना के लिये उठ खड़ा हुआ है।
ऋषियों की मीमांसा में ,अर्थ तत्व ही शब्द के रूप में आकाश से जन्मा है।यही मानवीय चेतना के अर्थानुकूल सीमित मानव घटाकाश( मुखविवर ) से असीमित आकाश द्वारा सीमित हृदयाकाश में जाकर तदनन्तर बुद्धि का विषय बन जाता है।इसमें अविकल सहायता षष्ठेन्द्रिय ” मन ” द्वारा प्राप्त होती है, जिसके विना उच्चरित कोई भी ध्वनित शब्द अश्रुत ही रहेगा।क्योंकि यदि आकाश गत संचरित वायु से ,शब्द को मन नहीं ग्रहण करेगा तो वह वर्णात्मक ध्वन्यात्मक शब्द कर्णेन्द्रिय गत नहीं होने से कदापि आत्मप्रत्यक्ष नहीं होगा।लेकिन कर्णेन्द्रिय गत होते ही मन:प्रत्यक्ष होकर वही शब्द कोई न कोई अर्थ ले लेता है।
” आत्मा” बुद्धि के साथ अर्थों के प्रति गमन है।और तब ” मन ” बोलने की इच्छा से युक्त हो जाता है।यह मन ही, शरीर में विद्यमान जठराग्नि पर बलाघात करता है, जिससे यह अग्नि, वायु को प्रेरित करके गतिशील बना देता है।अनन्तर हृद्गताकाश के अन्दर से संचरणशील वायु मुखाकाश द्वारा बाहर मुक्ताकाश में बिखर कर शब्द बन जाता है।और इत्थंभूत शब्द से, अर्थ विनिश्चय होता है।
इस प्रकार अर्थ से शब्द और शब्द से अर्थ की प्रसूति बीज-वृक्षवत् सृष्टि प्रक्रिया का अंग बना रहता है।
हृदय देश को स्पर्श करनेवाला शब्द भी है और अर्थ भी। इस प्रक्रिया का अत्यन्त महत्वपूर्ण साधन माध्यम वायु है।जबकि अग्नि तत्व के विना ,शब्दोच्चारण और अर्थानुभूति दोनों असम्भव ही है।
कुल मिलाकर शब्द और अर्थ ग्रहण में आकाश और वायु अप्रत्यक्ष अथवा आत्म प्रत्यक्ष ही रहते हैं ,जबकि अग्नि प्रत्यक्ष साधन बनता है।
एक साथ राज , योग और कवि कर्मनिष्ठ
” भर्तृहरि ” ने जब – विद्या नाम नरस्य रूपमधिकम् – कहा ,तब विद् अर्थात् वह ज्ञान ( ब्रह्म) ही आकाश-वायु-अग्नि लक्षण लक्षित होकर आत्मप्रत्यक्ष बनता हुआ विशेष- प्रकाशात्मक रूप बन जाता है।और तब भोगायतन ,यह मानव तन ,केवल भोगरूप न होकर , कर्मविशेष रूप होता है, और स्व-स्वरूप को आत्म विशेष रूप भी बना देता है।
और कुल मिलाकर यह शब्द और अर्थ का आत्मप्रत्यक्ष, गुरु -भगवत्कृपा वशात् सद्यः मुक्तिप्रदायक सिद्ध हो जाता है।
ऋषियों की ” सर्वं खलु इदं ब्रह्म ”
” रसो वै स: ” और काव्यलक्षण कर्ता आचार्य ” मम्मट ” की ” शब्दार्थौ तद् ”
की व्याप्ति एक ही विराट् में आत्मानुभूत होकर चिरन्तन विश्रान्ति पूर्ण सत् चित् और आनन्द का कारण होती है।
यही शब्द- अर्थ -तत् सत् हरि: और ओम् का नादानुसन्धान रसमयं जगत् भी है। गुरुभगवान् की कृपा से अविद्या जनित संस्कार क्षय हो और हम ” शब्दार्थौ तत्” एवं ” रसो वै स: ” का अमृतरसपान करें।
।।हरिश्शरणम्।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/03/02/शब्दार्थौ-तद्-रसो-वै-स/