अजन्मा का जन्म

यो दुर्विमर्शपथया निजमाययेदं,
सृष्ट्वा गुणान् विभजते तदनुप्रविष्ट: ।
तस्मै नमो दुरवबोधविहारतन्त्र-
संसारचक्रगतये परमेश्वराय।।

जिन्होंने अपनी अचिन्त्यगति माया से इस संसार चक्र का निर्माण करके उसमें स्वयं प्रवेश कर लिया और गुणों के आधार पर, कर्म एवं कर्मफल का विभाजन भी कर दिया है, ऐसे दुरवबोध विहार लीला विस्तार करने वाले परमेश्वर को प्रणाम है।
स: अकामयत एकोहं बहु स्याम, की वैदिक अवधारणा , संसार के सृजन का मूलाधार है।उसकी कामना से आकाश बन गया और उसमें वायु चलने लगी,प्रकाश भी हो गया। गरमी की अनुभूति हुई तो जल भी बन गया। गीलेपन का अहसास हुआ और पृथ्वी भी बन गई।
यही तो उस अचिन्त्य की क्रीड़ा है।
इसी क्रीड़ा में सृष्टि प्रादुर्भूत हो जाती है।
भगवान् की क्रीड़ा का विस्तार समस्त ब्रह्माण्ड पर्यन्त है। सत् ,रज और तम के क्रमशः सुख,दुख मोहादि कार्यों का निरन्तर प्रवाह सृष्टि, स्थिति और विनाश में एक के बाद एक चलता रहता है।
काम ही सृष्टि का मूल है, जिसे रजोगुण से उद्भूत कहा गया है। इस काम पूर्ति की प्रक्रिया में सन्तोष और असन्तोष के बीच क्रोध भी जन्म ले लेता है, जिसका मूल तमोगुण है। और इस क्रोध और अहंकार की विनिवृत्ति के लिये अजन्मा को भी जन्म लेन की विवशता प्रतीत होती है।इस प्रकार अजन्मा के जन्म और उसकी क्रीड़ा का सातत्य सतत चलता है।
आज उसी क्रीड़ा के प्रादुर्भाव में बलवती प्रभु कामना को सत्य करनेवाला भारतीय नव वर्ष का प्रथम दिन है।
पौराणिक मान्यता में ब्रह्मा की सृष्टि का प्रथम दिन,चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रथमा तिथि है।अनेक महापुरुषों का जन्मदिवस यह दिन सृष्टि में यत्र तत्र सर्वत्र नवीनता का संचार करनेवाला है।
शक्ति की उपासना का महत्वपूर्ण काल नवरात्र भी आज के दिन से प्रारम्भ होकर नव दिन पर्यन्त चलता है। भारतीय जनमानस का उत्सव पर्व आज ही के दिन से प्रारम्भ हो जाता है।
एक और महत्वपूर्ण घटना सृष्टि में आज के नवम दिन अवतरित होती है जब प्रभु श्रीराम का अवतरण अहंकार रावण के विनाश हेतु होता है।

नवमी तिथि मधुमास पुनीता।
सुकल पक्ष अभिजित हरिप्रीता।।
मध्य दिवस अति शीत न घामा।
पावन काल लोक विश्रामा।।

चैत्र मास की नवमी तिथि को सृष्टि रचना या जगद्विस्तार के नवम दिन ,जो अंक की दृष्टि से सबसे बड़ा अंक और पूर्णता का प्रतीक भी है, भगवान् श्री राम अयोध्या में अवतरित होते हैं। यह पूरा नवरात्र काल प्रथम दिन से नव दिनों तक शक्ति उपासना के साथ ही साथ प्रभुश्रीराम के जन्मोत्सव का काल भी है, जहाँ तमस के पर्याय राक्षसों का विनाश प्रभु अपनी शक्ति के साथ स्वयं करते हैं।
उन्हीं अजन्मा के जन्म और विभिन्न देवों की शक्ति के समूहीभूत शक्ति से उत्पन्न भगवती की स्मृति में अनन्त प्रणिपात करते हुए यह विचारशृंखला उन्हीं को समर्पित करता हूँ।

।।हरिश्शरणम्।।

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मायिक भ्रान्ति का नाश रामनामद्वारा

माया , मा मतलब नहीं ,या मतलब जो,अर्थात् जो नहीं, वह दीखे और जो दिखे,वह वह नहीं ।
तुलसी कृत रामचरितमानस में एक साथ ,श्रीरामकथा के तीन वक्ता-श्रोता हैं-
भगवान् शिव-पार्वती, याज्ञवल्क्य-भरद्वाज
कागभुशुण्डि-गरुड़।इस गूढ कथा में –
गो गोचर जहँ लगि मन जाई।
सो सब जानेहु माया भाई।।

अरण्यकाण्ड के दोहा सं.14 के बाद उक्त चौपाई आई है। इसमें इस माया के अविद्या और विद्या माया रूप से दो भेद –
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ।विद्या अपर अविद्या दोऊ।। कहा गया है।
मूलतः उक्त राम-कथा -रचि महेश निज मानस राखा पाइ सुसमउ शिवा सन भाखा,की उक्ति से शिव-पार्वती संवाद ही है।
ऊपर कही चौपाई के अनुसार – मन तथा, गो=इन्द्रिय , से चर= गम्य, जो भी पदार्थ हैं, वे सभी माया (अविद्या माया) हैं।
इस सुन्दर संसार की समस्त रचना प्रपंच विस्तार के मूल में यही माया,अविद्या माया ही है ।आखिर इस अविद्या माया की विद्यमानता नहीं हो तो, संसार भी रचा कैसे जा सके?
अतः इसकी उपस्थिति और इससे जन्य भ्रमादि भी आवश्यक ही है ।लेकिन , केवल और केवल बात इतनी सी ही है, कि
हमें इसके एक और दूसरे भेद यानी कि –
विद्या माया का स्मरण भी नित्य बनाये रखना होगा।
यह विद्या माया भगवान् की चिर संगिनी, नित्य, शुद्ध,बुद्ध और स्वयं चैतन्य है।यह अनादि परम पुरुष की परमा चित् है सर्वकारण कारण है।इसीलिये लगता हमारे आर्ष ग्रन्थों में यहाँ तक आते-आते ,
एक ब्रह्म की दृष्टि दृष्ट है।
मानसकार की, वेद- ऋषि-संमत दृष्टि भी यही बात बोलती है- तुम्ह जो कहा राम कोउ आना ।जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना।। राम कोई अन्य नहीं , ये तो वही हैं, जो वेदवर्णित मुनियों के ध्यान के मूल हैं।
बालकाण्ड के दोहा 114 के पूर्व उक्त चौपाई के बाद दोहा 115 के पश्चात्-
राम ब्रह्म व्यापक जग जाना।
परपानन्द परेस पुराना।।
इस पंक्ति से भगवान् श्रीराम को ब्रह्म सिद्ध कर दिया।यही परमात्मा और परम आनन्द सर्वव्यापी हैं। निर्गुण रूप में नित्य और विद्यामाया से विहित यही ,सगुण रूप में भक्त-भक्ति, जीव-प्रेम निष्ठा से राम रूम में अयोध्या में अवतरित होते हैं।
हरष विषाद ज्ञान अज्ञाना।
जीव धर्म अहमिति अभिमाना।।

यह जीव का अविद्या माया रचित या प्रेरित
हर्ष-विषाद,अज्ञानावृत ज्ञान का अहं वश अभिमान है, कि हम उन्हे समझ नहीं पाते
निज भ्रम नहिं समुझहिं अज्ञानी।
प्रभु पर मोह धरहिं जड प्रानी।।
और एक बात और है कि जो निर्गुण है वह सगुण कैसे हुआ, यह भ्रम नहीं होना चाहिए ,क्योंकि जैसे जल और ओले में कोई भेद नहीं दोनों जल ही हैं, वैसे ही निर्गुण (ब्रह्म)और सगुण ब्रह्म रूप राम में
भी कोई भेद नहीं।
इसलिये सभी के प्रकाशक और स्वयं प्रकाश्य सूर्य की भाँति इन श्रीराम को मायाधीश ज्ञान गुन का धाम मानना चाहिए।और स्वाभाविक भी है कि इनकी भक्ति- यज्ञ( सेवन नाम स्मरण पूजन संगति करण दान) से अथवा विवश होकर(विना इच्छा के)भी नाम ले लेने से अनेक जन्मार्जित पाप जल जाते हैं-
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं।
जनम अनेक रचित अघ दहहीं।।

और बात, संसार के बने रहने और मोह के कारण निरानन्द को भ्रमवश आनन्द मानने की करें तो वही ऊपर कही गई अविद्या माया आ जाती है, जिसके कारण सीपी में चाँदी और सूर्य किरणों में पानी( बिना हुए भी ) प्रतीति होती रहती है।
रजत सीप महुँ भास जिमि,
जथा भानु कर वारि।
जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ,
भ्रम न सकै कोउ टारि।।
अतः इस अविद्या मायिक भ्रम को दूर करनेमें एकमात्र कारण और सभी के परम प्रकाशक स्वयं प्रकाश्य अनादि अवधपति विद्यामायाधीश को भजना ही श्रेषठतम है-
सब कर परम परम प्रकाशक जोई।
राम अनादि अवधपति सोई।।
जगत प्रकाश्य प्रकाशक रामू।
मायाधीश ज्ञान गुन धामू।।
और इनका सादर स्मरण मात्र तो ऐसा कि जैसे इस भवसागर रूप संसार सागर को कोई गाय द्वारा निर्मित छोटे से गड्ढे को बड़ी आसानी से पार कर ले-
इसलिए
उमा कहहुँ यह अनुभव अपना।
सत हरि भजन जगत सब सपना।।
और
सादर सुमिरन जे नर करहीं।
भव बारिधि गोपद इव तरहीं।।
और यही बात जैसा कि शिव-पार्वती संवाद है ,वही कागभुशुण्डि-गरुड संवाद भी है-
सुनु सुभ कथा भवानि,
रामचरितमानस बिमल।
कहा भुशुण्डि बखानि,
सुना बिहगनायक गरुड।।
सो संवाद उदार ,
जेहि बिधि भा आगे कसब।
सुनहु राम अवतार,
चरित परम सुन्दर अनघ।।
हरि गुन नाम अपार,
कथा रूप अगनित अमित।
मैं निज मति अनुसार,
कहहुँ उमा सादर सुनहु।।
बालकाण्ड दोहा,120,क-ख-ग

।। हरिश्शरणम् ।।

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” शब्दार्थौ तद् रसो वै स: “

शब्द ही समग्र का आधार है,क्योंकि सृष्टि का आदि अक्षर जो ओङ्कार है। यह शब्द अक्षर होने से अविनाशी भी है। उच्चरित होने पर यह ध्वनि रूप या नाद रूप है। सीमातीत आकाश में इस नादात्मक ध्वनि रूप शब्द का श्रवण होने पर इसका अनु श्रवण भी श्रवणेन्द्रिय द्वार द्वारा ही होता है।और विचार करने पर इस शब्द की प्राप्ति में कोई अर्थ तत्व दिखाई देता है।
अतः मूलतः अर्थ की अनुभूति कराने के लिये होने वाली किसी एक शब्द की अनुगूँज प्रायः अनेक अर्थों की प्रकाशिका बन जाती है।
शब्द एक अर्थ अनेक। किसी अर्थ या प्रयोजन विशेष हेतु जब तक शब्द का उच्चारण नहीं होगा सामान्यतः कोई अर्थ लोकग्राह्य नहीं होगा। अर्थ का नेत्र गोचर कोई रूप नहीं है, शब्द का भी नहीं,किन्तु शब्द लिपिबद्ध होकर ,चक्षु – श्रवणेन्द्रिय गत हो जाता है।
निष्कर्ष में अर्थ के कथन में शब्द के उच्चारण की अनिवार्यता दृष्ट होने से ,शब्द में कोई शक्ति या बल दिखाई देता है, जिससे अर्थोपलब्धि होती है।
औपनिषदीय एवं वैयाकरण अवधारणा में यह अर्थ और शब्द दोनों ” ब्रह्म ” हैं। जिसको धारण करने की क्षमता “आकाश” तत्व में है। और इसीलिये ब्रह्म को आकाश शरीर वाला कहा गया(आकाशशरीरं ब्रह्म)
“आकाश “तत्व किसी भी स्पर्श, रूप ,रस और गन्ध से विहीन ,केवल अर्थ एवं शब्द का अनुग्राहक मात्र है। इसमें किसी सद्रजस्तमो गुणादि का लेश नहीं।
आकाश में शब्दोच्चारण होने पर ,उक्त सत्वादि के न्यूनाधिक्य की मात्रा के कारण
प्रत्येक मनुष्य को पृथक्- पृथक् गुणों की अनुभूति होती है,क्योंकि शब्द में तो गुणों का आधान है ही।
यह वही आकाश तत्व है, जो प्राणिमात्र के समस्त कर्मों का साक्षी चिन्मात्र और स्वयं निर्गुण स्वरूप है। यह साक्षी इसलिये भी है, क्योंकि इसी में अन्य चारों महाभूतों – वायु,अग्नि, जल,पृथ्वी सहित समग्र स्थावर जंगम प्रकृति प्रतिबिंबित है।
सृजन की प्रक्रिया का प्रथमाधार यह आकाश, ब्रह्मवत् या आत्मवत् सारे जगत् की क्रिया-प्रतिक्रिया, घात-प्रतिघात और चेष्टा-प्रतिचेष्टा का अमूर्त द्रष्टा है।
वर्तमान में आत्मप्रवंचना के प्राकृत रूप में शिक्षामन्दिरों में “नकल “की प्रक्रिया ने आज जब भयावह रूप ग्रहण कर लिया है, तब विवश होकर यह वही आकाश तत्व है,जो भौतिक रूप में चलते फिरते “कैमरे” का रूप लेकर हमारे शब्द, अर्थ, स्वरूप, क्रियाओं और चेष्टाओं को कैद करके ,हमारी भर्त्सना के लिये उठ खड़ा हुआ है।
ऋषियों की मीमांसा में ,अर्थ तत्व ही शब्द के रूप में आकाश से जन्मा है।यही मानवीय चेतना के अर्थानुकूल सीमित मानव घटाकाश( मुखविवर ) से असीमित आकाश द्वारा सीमित हृदयाकाश में जाकर तदनन्तर बुद्धि का विषय बन जाता है।इसमें अविकल सहायता षष्ठेन्द्रिय ” मन ” द्वारा प्राप्त होती है, जिसके विना उच्चरित कोई भी ध्वनित शब्द अश्रुत ही रहेगा।क्योंकि यदि आकाश गत संचरित वायु से ,शब्द को मन नहीं ग्रहण करेगा तो वह वर्णात्मक ध्वन्यात्मक शब्द कर्णेन्द्रिय गत नहीं होने से कदापि आत्मप्रत्यक्ष नहीं होगा।लेकिन कर्णेन्द्रिय गत होते ही मन:प्रत्यक्ष होकर वही शब्द कोई न कोई अर्थ ले लेता है।
” आत्मा” बुद्धि के साथ अर्थों के प्रति गमन है।और तब ” मन ” बोलने की इच्छा से युक्त हो जाता है।यह मन ही, शरीर में विद्यमान जठराग्नि पर बलाघात करता है, जिससे यह अग्नि, वायु को प्रेरित करके गतिशील बना देता है।अनन्तर हृद्गताकाश के अन्दर से संचरणशील वायु मुखाकाश द्वारा बाहर मुक्ताकाश में बिखर कर शब्द बन जाता है।और इत्थंभूत शब्द से, अर्थ विनिश्चय होता है।
इस प्रकार अर्थ से शब्द और शब्द से अर्थ की प्रसूति बीज-वृक्षवत् सृष्टि प्रक्रिया का अंग बना रहता है।
हृदय देश को स्पर्श करनेवाला शब्द भी है और अर्थ भी। इस प्रक्रिया का अत्यन्त महत्वपूर्ण साधन माध्यम वायु है।जबकि अग्नि तत्व के विना ,शब्दोच्चारण और अर्थानुभूति दोनों असम्भव ही है।
कुल मिलाकर शब्द और अर्थ ग्रहण में आकाश और वायु अप्रत्यक्ष अथवा आत्म प्रत्यक्ष ही रहते हैं ,जबकि अग्नि प्रत्यक्ष साधन बनता है।
एक साथ राज , योग और कवि कर्मनिष्ठ
” भर्तृहरि ” ने जब – विद्या नाम नरस्य रूपमधिकम् – कहा ,तब विद् अर्थात् वह ज्ञान ( ब्रह्म) ही आकाश-वायु-अग्नि लक्षण लक्षित होकर आत्मप्रत्यक्ष बनता हुआ विशेष- प्रकाशात्मक रूप बन जाता है।और तब भोगायतन ,यह मानव तन ,केवल भोगरूप न होकर , कर्मविशेष रूप होता है, और स्व-स्वरूप को आत्म विशेष रूप भी बना देता है।
और कुल मिलाकर यह शब्द और अर्थ का आत्मप्रत्यक्ष, गुरु -भगवत्कृपा वशात् सद्यः मुक्तिप्रदायक सिद्ध हो जाता है।
ऋषियों की ” सर्वं खलु इदं ब्रह्म ”
” रसो वै स: ” और काव्यलक्षण कर्ता आचार्य ” मम्मट ” की ” शब्दार्थौ तद् ”
की व्याप्ति एक ही विराट् में आत्मानुभूत होकर चिरन्तन विश्रान्ति पूर्ण सत् चित् और आनन्द का कारण होती है।
यही शब्द- अर्थ -तत् सत् हरि: और ओम् का नादानुसन्धान रसमयं जगत् भी है। गुरुभगवान् की कृपा से अविद्या जनित संस्कार क्षय हो और हम ” शब्दार्थौ तत्” एवं ” रसो वै स: ” का अमृतरसपान करें।

।।हरिश्शरणम्।।

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