भगवद्भजन से ही अन्त:करणशुद्धि

सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्त:-

करणप्रवृत्तय: ” सज्जनों के अन्त:करण की वृत्तियाँ सन्देह का निराकरण कराती हैं।” कविकुलगुरु कालिदास की अमरवाणी का यह अमर सन्देश अमर- वाणी उपासकों के लिये अत्यन्त आदरणीय है। वैचारिक परिणति में यह- मन-बुद्धि-चित्ताहंकार रूप में चार हैं।

इन सभी में मन अद्वितीय है, जो शरीर के भीतर और बाहर सभी जगह तादात्म्य बनाये रखता है।शरीर में विद्यमान पंच ज्ञानेन्द्रियों-कान,त्वचा,आँख, जिह्वा और नासिका से यदि मन का तादात्म्यीकरण नहीं होगा तो ये पाँचों अपने-अपने विषयों –शब्द,स्पर्श, रूप,रस,गन्ध का भान नहीं कर पायेंगे।क्योंकि व्यवहार जगत् में इसका जिसके साथ योग-संयोग पूर्णतया होगा, उसी का पूर्ण ज्ञान संभव है।

मानसकार ने ” शिव संकल्प कीन मन माहीं।यह तन सती भेंट अब नाहीं।। ” में जिस शिव के संकल्प का शिवयोग दर्शाया है, वह संकल्पात्मक मन का ही स्वरूप है। और शिव की ही लीलाविग्रह शिवा के लीला संशय का उच्छेदन उनकी नित्यसंगिनी दक्षसुता सती के योगाग्निध्वंस में परिणमित हो जाता है।इस घटना में दक्ष का अहंकार नाश भी हेतु बनता है और जन्मान्तर में पुनः शिव की लीलासंगिनी हिमालय -पुत्री रूप में आकर शिव-पाणि-गृहीता हो जाती है।
सती का भावचांचल्य सदाशिव के सदा मन:स्थैर्य को व्यक्त करके ,मानवीय मन को विकल्पों को छोड़ कर संकल्प पर ही टिकने का अमिट आदेश दे देता है।
चञ्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्। वाला अर्जुन का मन- अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते। का निर्देश पाकर एकमात्र संसाररागनिवृत्तिऔर नाम -अभ्यास-जपादि द्वारा ही वश में आ पाता है। यही मार्कण्डेय ऋषि का ” निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ समाहितौ “ और हमारे वैदिक ऋषियों का ” तन्मे मन: शिव-संकल्पमस्तु ।” भाव है।इसी अनुशीलन और इसी अनुशासन में ही जन्म जन्मान्तर के ग्राहक-अनुग्राहक मन की शुद्धि निहित है, जो सर्वानन्दावाप्ति करा देगा।
पंच ज्ञानेन्द्रियों , तद्विषयों ,मन ,बुद्धि और आत्मा की उत्तरोत्तर श्रेष्ठता शास्त्रों द्वारा सिद्ध है-

इन्द्रियेभ्य:परा ह्यर्था: ,
अर्थेभ्य: परं मन: ।
मनसस्तु परा बुद्धि: ,
बुद्धेरात्मा महान् पर:।।

ऊपर उक्त चारों अन्त:करणों में एक चित्त भी है, जिसे चेतना के रूप में शरीर के सभी अंगोपांगों में अनुभव किया जाता है।
इसी से सभी शरीरांगों में सर्वत: समग्र स्फुरण,स्फूर्ति,चेष्टागति हो रही है।
ऋषि मार्कण्डेय ने इसीलिये ” चेतना ” के रूप में भगवती का स्मरण-दर्शन किया है-

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

और ऊपर की मन:शुद्धि की तरह यहाँ भी चेतना या चित्शक्ति का शुद्धीकरण देवी के रूप में अवधारित करके सम्भव है।

तृतीय अन्तकरण ” अहंकार” है। इसमें सन्धि करने पर अहम् और कार दो पृथक् शब्द हो जाते हैं। अहं पद से” मैं “और कार से तद्भाव समझ में आता है।मतलब कि संसार एवं तद्विषयों में मैंपना या स्वयं कर्तृतादि का चिन्तन ही अहंकार है।
अहंता से अस्मिता, इदन्ता ,ममता आदि अपृथक् रूप से संयुक्त हैं।जिससे पुनः पुनःशरीर धारण करना पड़ता है।
” सोहमस्मि इति वृत्ति अखण्डा ” की गोस्वामी जी की अवधारणा का ध्रुवीकरण ही, जो चाहे अष्टांग योगादि जन्य हो अथवा भगवान् की भक्तिज्ञानश्रद्धालभ्य, इस अहंकार से मुक्ति दिला सकती है।
एक अन्तिम अन्तरिन्द्रिय ” बुद्धि ” है।
यह मन से श्रेष्ठतर और आत्मा से कमतर है। यह आत्मा के और मन के भी अत्यन्त निकट होने है। इसलिए इसी बुद्धि के नैर्मल्य द्वारा विवेकपूर्वक संपादित कार्य कार्यसिद्धि का कारण बनता है ,मन के मनमानी- पने से नहीं।
बुद्धिशुद्धि भी इसे गायत्री माँ मानने पर है,क्योंकि गायत्री का मनन चिन्तन इसी को गायत्रीमन्त्र रूप में मन्त्र मुग्ध भाव से जप कर बुद्धनैर्मल्य रूप में परिणमित देता है।और इसीलिये मार्कण्डेय ऋषि ने इस बुद्धि को नमन किया दैवी रुप में-

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

यह देवी गायत्री हो ,दुर्गा हो अथवा सीता ,यदि समाहित समर्पित बुद्धि से इसका मनन चिन्तन होगा, तो निश्चय ही यह बुद्धिनैर्मल्य देगीं ही।
सर्वसुरासुरमुनिमनुजदनुज-वृन्द-वन्दनीया सकलब्रह्माण्डजननी करुणानिधान श्रीराम की अतिशयप्रिया विदेहतनया श्रीजानकी जी के युगलपादपद्मों की वन्दना से गोस्वामी जी के शब्दोंमें निर्मलमतित्व की प्राप्ति वर्णित है-

जनकसुता जग जननि जानकी।
अतिशय प्रिय करुणानिधान की।।
ताके युग पदकमल मनावौं।
जासु कृपा निर्मल मति पावौं।।

नारायण यही रामगायत्री है ,जिसे उन्मुक्त भाव से किसी विधिविधान के विना भी स्मरण मनन चिन्तन करके मनुष्य मात्र की बुद्धि निर्मल हो जाती है।
सम्यक् आधीयते चित्तं यस्मिन्(यस्याम्) समाधि: की समाधि दशा इन्हीं भगवान् की अचिन्त्य शक्ति में ध्यान करके पाई जा सकती है, जिसका फल अविद्या, अस्मिता,राग,द्वेष,अभिनिवेश आदि पंच क्लेशों का शमन भी है।
इस प्रकार उक्त चतुर्धा विभक्त अन्तरिन्द्रियों का परिशुद्धीकरण इन सभी में भगवत्ता की अनुभूति से हो सकती है।और इसका भी एकमेव उपाय भगवद् भजन ही सत्य सिद्ध है-

उमा राम सुभाव जेहि जाना।
ताहि भजन तजि भाव न आना।।
तथा
कह हनुमन्त विपति प्रभु सोई।
जब तब सुमिरन भजन न होई।।
और
उमा कहहुँ यह अनुभव अपना।
सत हरि भजन जगत सब सपना।।

इत्यादि मानसकार की वाणी मानस में धरती हुई विरमती है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/02/18/भगवद्भजन-से-ही-अन्त:करणशु/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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