युंजान योगी और युक्त योगी ,ये दो प्रकार योगियों के हो सकते हैं। युंजान का तात्पर्य ऐसे साधक योगाभ्यासी से है, जो योग साधन -परायण है, अर्थात् योगक्रिया में विधिवत् लगे हुए हैं। इसी से आगे की अवस्था को प्राप्त करने वाला योगी ,सिद्ध योगी कहा जायेगा, जहाँ पहुंच कर अब उसे कुछ भी प्राप्तव्य नहीं रहता।मतलब कि भगवान् की भाषा में युक्त योगी।
ऐसे ही योगी को भगवान् ने छठें अध्याय के अन्त में युक्ततम योगी कह दिया है,जो अनन्यपरायण होकर एकमात्र भगवद् आसक्त होकर अन्तरात्मा से श्रद्धा पूर्वक भगवान् को भजते हैं-
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मत:
वहीं षष्ठाध्याय के अष्टम श्लोक में भगवान् ने युक्त योगी या पूर्वोक्त सिद्ध योगी का वर्णन किया है।इसमें उसके चार विशेषण दिये गए हैं-
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चन:
इसमें प्रथम विशेषण ज्ञान विज्ञान से तृप्त आत्मा वाला कहा गया।ज्ञान का अर्थ एक मत के अनुसार परोक्ष ज्ञान से है, अर्थात् जो प्रत्यक्ष न होकर आचार्य या शास्त्रों द्वारा उपदिष्ट हो।इसी प्रकार विज्ञान का तात्पर्य अपरोक्ष ज्ञान से है, जो दैनन्दिन जीवन में अनुभव एवं क्रियान्वयन के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से बिना सन्देह और भ्रम के प्राप्त हो।
अन्य विचारकों के अनुसार, परमात्मा के निर्गुण निराकार तत्व के प्रभाव तथा माहात्म्य आदि के रहस्य सहित यथार्थ बोध को ज्ञान और उनके सगुण साकार तत्व के महत्व तथा गुणादि के रहस्य सहित यथार्थ बोध को विज्ञान कहते हैं।
वस्तुतः ये दोनों बातें एक ही परिभाषा की दो भाषास्वरूप हैं।क्योंकि निर्गुण ब्रह्म तथा अदृश्य जगत् का ज्ञान परोक्ष ही तो है और अवतार रूप सगुण ब्रह्म एवं दृश्यमान जगत् की प्रकृतिलीला का ज्ञान प्रत्यक्ष।
अतः जिनको परमात्मा के साकार निराकार दोनों तत्वों का भलीभाँति ज्ञान हो गया है और उनका अन्त:करण उनके प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप यथार्थ ज्ञान से सम्यक् तृप्त हो गया है, जिसके कारण उसे अब कुछ भी जानना शेष नहीं रहा, वही तो
“ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा” है।
भगवत्प्राप्त योगी के लक्षणों में”कूटस्थ” का समावेश भी बड़ा सार्थक है।सुनारों या लोहारों के यहाँ प्रयुक्त होने वाले लोहे के”अहरन” या ” निहाई ” को कूट कहते हैं।उस पर सोना-चाँदी या लोहादि धातुएं रखकर हथौड़े से कूटी जाती हैं।और कूटते समय उस पर बार-बार करारी चोट पड़ती है, फिर भी वह हिलता डुलता नहीं और बराबर एक स्थान पर एकरूप व अचल बना रहता है।इस तरह, जो व्यक्ति नाना प्रकार के हर्ष-सुख तथा दारुणदु:ख एवं भीषण कष्टों आ जाने पर भी अपने अन्त:करण में तनिक भी विकार उत्पन्न नहीं होने देता और सदासर्वदा अचल भाव से परमात्मा में ही स्थित रहता है, वही कूटस्थ है।
संसार के समस्त पदार्थों को मायामय एवं क्षणिक समझ लेने के कारण , युक्तयोगी की दशा ही ऐसी हो सकती है।वह किसी भी वस्तु में अनासक्त होने से संसार के सभी भोग्य पदार्थों के प्रति एक भाव वाला हो जाता है ,चाहे वह मिट्टी हो या सोना या और कोई अन्य। इसीलिए ऐसे युक्ततम योगी को “समलोष्टाश्मकाञ्चन” कहा गया है।
भगवान् स्वात्म में चित्त स्थिर करने की कृपा करें। जन्मजन्मान्तर से निरंतर प्रवहमान हम सब की चित्तवृत्ति का प्रवाह रुक सके ,और ” योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: “की पातञ्जलिक अञ्जलि-जल का पान हो सके।
।।हरिश्शरणम्।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/01/27/युक्त-योगी/