श्रीमद्भगवद्गीता की उक्ति है, काल आ जाने पर स्वयं में आत्म लाभ हो जायेगा।
इन पंक्तियों को स्वामी विवेकानंद जी अपने अनेकानेक व्याख्यानों में बराबर दुहराते रहते थे। मकर सक्रांति, जो उनके जन्म के वर्षों में बारह जनवरी को पड़ती थी, उनका आविर्भाव काल था। और उनके शरीर धारण के अवसर ,वर्तमान मकर संक्रांति का काल जो 12 से 15 जनवरी पर खिसक कर आ चुका है,मन , उस आत्मज्ञ ,आत्मस्थ,सत्ता पर बारम्बार केन्द्रित हो जा रहा है।
वे कहते थे पाप और पुण्य का सारा द्वन्द्व ,अनेकत्व भावना के सृजन से है।अथवा बहुत्व के भाव से यह सब आ पहुंचा है।मनुष्य जितना एकत्व की ओर बढ़ता जाता है, उतना ही ” हम-तुम ” का भाव कम होता जाता है।हमसे यह पृथक् है, ऐसा भाव मन में उत्पन्न होने से ही अन्यान्य द्वन्द्वों का विकास होता है।परन्तु सम्पूर्ण एकत्व का अनुभव होते ही, मनुष्य का शोक या मोह नहीं रह जाता-
तत्र को मोह: को शोक: एकत्वम् अनुपश्यत:
सब प्रकार की दुर्बलता को ही पाप कहते हैं-Weakness is sin . इसीसे हिंसा एवं द्वेषादि जन्मते हैं ।हृदय में आत्मा सर्वदा प्रकाशमान है, किन्तु इस ओर कोई ध्यान नहीं देता।केवल इस जड़ शरीर, हड्डी तथा मांस के अद्भुत पिंजरे पर ही ध्यान रखकर ” मैं मैं ” करता है।यही देहाध्यास है, यही सारी दुर्बलताओं का मूल है, यही समस्त व्यवहार जगत् का मूल भी।इसके परे परमार्थ भाव है।
“जब तक “मै शरीर हूँ ” यह ज्ञान है तब तक ये सत्य हैं।परन्तु जब”मैं आत्मा हूँ ” यह अनुभव होता है, तब यह सब व्यवहार -सत्ता का मिथ्यात्व भान होता है।
लोक जिसे पाप कहता है, वह दुर्बलता का फल है।इस शरीर को”मैं” जानना-यह दुर्बलता का रूपान्तर है।जब “मैं आत्मा हूँ”इसी भाव पर मन स्थिर होगा,तब पाप और पुण्य ,धर्माधर्म के पार पहुंचा जा सकेगा। ” श्रीरामकृष्ण कहते थे, ” मैं ” के नाश में ही दु:ख का अन्त है।”
उन्होंने कहा -यह अहं या मिथ्या भाव कहाँ है ,कोई मुझे बताये? जो वस्तुतः स्वयं है ही नहीं उसका मरना और जीना कैसा?इस अहं रूप मिथ्या भाव से सभी मोहित- Hipnotised हैं।इस पिशाच से मुक्त होते ही,यह स्वप्नवद् दूर हो जाता है और दिखाई देता है कि आब्रह्मस्तम्ब सभी में एक ही आत्मा विराज रही है।इसीको जानना होगा, प्रत्यक्ष करना होगा।”
जितने भी साधन भजन हैं, वे सभी इस आवरण को दूर करने के निमित्त हैं।इसके हटने से ही ज्ञात होगा कि चित्सूर्य अपनी प्रभा से स्वयं ज्योतिमान् है।क्योंकि आत्मा ही एकमात्र स्वयं ज्योति है, स्वयं वेद्य है।
इसीलिये श्रुति कहती है-
” विज्ञातारम् अरे केन विजानीयात् ”
– बृहदारण्यक उपनिषद् 2/4/14
जो कुछ यह मनुष्य जानता है, वह मन की सहायता से, किन्तु मन तो जड़ वस्तु है।उसके पीछे शुद्ध आत्मा रहने के कारण मन का कार्य होता है।अतः मन के द्वारा उस आत्मा को कैसे जाना जा सकता है?
इससे तो लगता है कि मन या बुद्धि कोई भी शुद्धात्मा के पास नहीं पहुंच सकती।
ज्ञान की पहुंच यहीं तक है।परन्तु जब मन विकल्प रहित या वृत्तिहीन होता है, तभी मन का लोप होता है और तभी आत्मा प्रत्यक्ष होती है।इसी को श्रीमदाद्य शङ्कर ने ” अपरोक्षानुभूति” कहा है।
फिर प्रश्न ये उठा कि यदि मन ही अहं है, तो मन का लोप तो ” मैं ” कहाँ रहा?
इस पर स्वामी जी का उत्तर था-वह जो अवस्था है, यथार्थ में वही अहं का स्वरूप है।उस समय का जो ” अहं ” रहेगा वह सर्वभूतस्थ ,सर्वगत,सर्वान्तरात्मा होता है।घटाकाश टूटकर महाकाश का प्रकाश होता है।क्या घट टूटने पर उसके अन्दर के आकाश का विनाश होता है? नहीं।
इसी प्रकार छोटा “अहं” ,जिसे शरीर में बन्द समझा जाता है, फैल कर सर्वगत अहं या आत्मा रूप से प्रत्यक्ष हो जाता है।अतः मन मरा या रहा, इससे यथार्थ अहं या आत्मा का क्या।
इन्ही बातों को सहजता से समझाने के लिए अनेक शास्त्र लिखे गये हैं। ये सभी साधनमात्र हैं, साध्य तो वही आत्मा है।हम आपातमधुर स्वर्ण रजत और स्त्रियों के क्षणभंगुर सौन्दर्य से मोहित होकर इस देव दुर्लभ मनुष्य जन्म को कैसे खो रहे हैं।जबकि यह शरीर ही आत्मज्ञान का अद्वितीय साधन है-साधन धाम मोक्ष करि द्वारा। पाइ न जे परलोक सँवारा ।हे! महामाया यह भी आपका ही आश्चर्य जनक प्रभाव है ,कि आपने बड़े बड़े ज्ञानियों के भी चित्त को भ्रमित कर रखा है।अस्तु-
जब तुम्हारी कृपा करुणा का प्रसाद मिलेगा, तब हे महामाये विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषी , वह काल अवश्य ही आ जायेगा और कर्म-ज्ञान-भक्ति की योग संसिद्धि अवश्य ही हो जायेगी-
न हि ज्ञानेन सदृशं
पवित्रमिह विद्यते।
तत् स्वयं योगसंसिद्ध:
कालेनात्मनि विन्दति।।गीता-4/38।
।।हरिश्शरणम्।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/01/16/कालेन-आत्मनि-विन्दति/