सन्त शिरोमणि तुलसीदास की हरिभक्ति का दर्शन दास्यभाव में ” मानस ” सहित उनकी सम्पूर्ण रचनाओं में मूर्तिमंत विराजित है, किन्तु दोहावली के स्फुट दोहों में दृश्यमान रामनामानुराग भी साधकों को जीवन्मुक्त करने में सर्वथा समर्थ है। जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना,
श्रवन रंध्र अहि भवन समाना का समर्थक दोहा द्रष्टव्य है-
रसना सापिन बदन बिल,जे न जपहिं हरिनाम।
तुलसी प्रेम न राम सों, नाहिं विधाता बाम ||
तात्पर्य यह कि ऐसे लोगों की जिह्वा सर्पिणी और मुख बिल के समान है जो हरिनाम नहीं जपतेऔर जिन्हें श्रीरामनाम से प्रेम नहीं हो उनका क्या भला होगा?
कदापि नहीं।उनके लिए तो ब्रह्मा भी वाम(प्रतिकूल) हो जाते हैं अर्थात् उनका बड़ा दुर्भाग्य है।
चित्रकूट सब दिन बसत,प्रभु सिय लखन समेत।
रामनाम जप जापकहिं,तुलसी अभिमत देत ।। दोहावली- 04 ।
वे भगवान् श्रीराम , चित्रकूट पर्वत पर श्रीजानकी जी तथा लक्ष्मण जी के साथ नित्य निवास करते हैं।वहाँ रहते हुए सभी नाम जापकों को अभीष्ट सिद्धि भी हो जाती है।इसमें यह भी संकेत है कि इस कराल कलिकाल में स्वामी जी को वहीं भगवान् का दर्शन लाभ हुआ था। एक दूसरे भाव के अनुसार जिन्हें अपने चित्त रुपी मकान में सदा अन्तर्यामी रूप से विद्यमान प्रभु श्रीराम, सीता रूपिणी बुद्धि और अहंकार रूपी श्रीलक्ष्मण जी का दर्शन होता है, उनकी अभिलाषपूर्ति तो स्वत:सिद्ध है।
एक छत्र इक मुकुट मनि,सब बरनन पर जोउ।तुलसी रघुवर नाम के, बरन विराजत दोउ।। दोहावली -09 ।
राम नाम के दोनों अक्षर सभी वर्णों के ऊपर होकर विराजते हैं। “र”अक्षर सभी वर्णों पर शुद्ध व्यंजन रूप में रेफ बनकर छत्र की तरह तथा “म” अक्षर अनुस्वार होकर मणिवत् विराजता है।इसलिए सम्पूर्ण वार्ता को शोभित करने के लिये रामनाम अवश्यंभावी है-श्वांस श्वांस में राम कहु श्वांस वृथा जनि होय,श्वांस बिचारी पाहुना आवन होय न होय ।
दूसरे भाव में यदि वर्ण शब्द से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्णों का बोध करें तो पहला वर्ण “र” छत्र रूप से सर्वरक्षक तथा” म” मणि रूप में समस्त सुखों का मूल मान्य होगा- असन बसन पशु वस्तु विविध विधि सब मणि मंह रह जैसे।इस प्रकार रामनाम के सब वर्णों के ऊपर रहने का अभिप्राय है कि इस पर सभी वर्णों का समान अधिकार है।
अतः- तुलसी प्रीति प्रतीति सों ,रामनाम जपु जाग।किये होय विधि दाहिनो, देइ अभागेहि भाग।। दोहावली-36
प्रेम और विश्वास पूर्वक रामनाम जपने से प्रतिकूल विधि या दैव अनुकूल(दाहिनो) हो जाता है और अभागे का भाग्य खुल जाता है।मानस में इसकी पुष्टि करते हुए-
मन्त्र महामनि विषय व्याल के।
मेटत कठिन कुअंक भाल के।।
तथा-
नाम जीह जपि जागहिं जोगी।
विरति विरंचि प्रपंच वियोगी।।
इसी का पोषण करते हैं।
मंगल भवन अमंगलकारी उमा सहित जेहि जपत पुरारी, की मानस अभिव्यक्ति का सुन्दर उदाहरण अध्यात्म रामायण में भी दीखता है, जहाँ शिवाशिव राम नाम को जपते हैं और मुक्ति कामियों को नामोपदेश
करते हुए निवास करते हैं-
अहं भवन् नाम गृणन् कृतार्थ:
वसामि काश्याम् अनिशं भवान्या।
मुमूर्षमाणस्य विमुक्तयेहं
दिशामि मन्त्रं तव राम नाम।।
इसीलिए दोहावली के सत्ताइसवें दोहे में नाम को कल्पवृक्ष बताया गया है।यह सारे सुमंगल की कंदली अर्थात् बीजवत् है जिसके विना किसी सुखद वृक्ष की कल्पना सम्भव नहीं।इस रामनाम के स्मरण मात्र से सारी सिद्धियाँ करतल गत होकर राजती हैं और पग -पग पर परम आनन्द की अनुभूति होती रहती है।
राम नाम कलि कल्पतरु, सकल सुमंगल कन्द।
सुमिरत करतल सिद्धि सब, पग पग परमानन्द ।।
।।हरिश्शरणम्।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/01/07/राम-नाम-सर्वस्वम्/