भक्त रैदास

आज माघमास की वैक्रमाब्द 2076 की पूर्णिमा तिथि को सन्त रविदास का अनुस्मरण हो रहा है,क्योंकि भक्त समाज ,आज ही के दिन आपका प्राकट्य मानता है। श्रीरामानन्दाचार्य जी के द्वादश प्रधान शिष्यों में आपकी ख्याति है।
“श्रीभक्तमाल ” ग्रन्थ के प्रसिद्ध टीकाकार प्रियादास जी ने अपनी कवित्तमयी टीका में भक्त रैदास के जन्म की कथा कही है। इसके अनुसार गुरु रामानन्दाचार्य जी ने प्रतिदिन भिक्षाटन का कार्य एक ब्राह्मण बालक को सौंपा था और वह भिक्षान्न ब्राह्मण गृहों से संग्रह होता था, जिससे बने भोग को प्रतिदिन भगवान् को अर्पित किया जाता था।
इस बात की मनाही थी कि, अन्य किसी घर से अन्न ग्रहण नहीं किया जायेगा।पर भिक्षाटन करते समय इन बालक से एक वणिक् प्रतिदिन भिक्षान्न ग्रहण की प्रार्थना करते थे।जिसे ये गुरु आज्ञा के विपरीत मान कर स्वीकारते नहीं थे।एक दिन खूब जोर की वर्षा हो रही थी, और बालक ने उन वणिक् का ही अन्न स्वीकार कर लिया और उसी से बने भोग को भगवान् को अर्पित किया गया।किन्तु भगवान् ने वह भोग जब स्वीकार नहीं किया, तब गुरु श्री रामानन्दाचार्य जी को ज्ञात हो गया कि, बालक ने आज्ञा के विपरीत भिक्षाटन किया है। और उधर उस वणिक् को किसी ने बताया था कि, यदि श्री रामानन्दाचार्य जी उसकी भिक्षा स्वीकारें, तो उसे पुत्र प्राप्ति हो सकेगी।अतः वह तो कृतकार्य हुआ , किन्तु गुरु रामानन्दाचार्य जी ने इस ब्राह्मण बालक को मलिन जाति में जन्म लेन के लिए शाप दे दिया। ब्राह्मण बालक ने काशी में ही ” रघु” नामक चर्मकार के यहाँ जन्म ग्रहण किया। और अपनी पूर्व जन्म की जानकारी रहने से उस घर में दुग्धादि तक खानपान नहीं स्वीकारा।तब श्री रामानन्दाचार्य जी प्रकट हुए और वहीं पुनः शिष्य स्वीकारने की कृपा की ।
इसी घर में गुरु कृपा से पुनः जन्म प्राप्त रैदास ने गुरुभगवान् की कृपा से अल्पायु में ही भगवद् दर्शन किया और उपनिषद्, वेदान्त मय सिद्धान्तों को अपनी टूटी फूटी भाषा में दोहों ,पदों के माध्यम से अभिव्यक्ति दी।
उनका प्रसिध्द पद्य –

प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी।
जाकी अंग अंग बास समानी।।
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा।
जैसे चितवत चन्द चकोरा।।
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती।
जाकी जोत बरै दिन राती।।
प्रभु जी तुम मोती हम धागा।
जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा।
ऐसी भगति करै रैदासा।।

प्रायः पद का आशय पूर्णतया स्पष्ट ही है, किन्तु प्रभु को दीपक और स्वयं को उसकी बाती का भाव तो कुछ और ही है।
वस्तुतः इस अर्थ में औपनिषदिक बात पिरोई लगती ,जहाँ जीव-परमात्म का अभेद ही परिलक्षित होता है ।

एक दोहे में अपने गुरुभाई सन्त कबीर के भावों का स्मरण करते दीखते हैं, जहाँ अभिमान को त्याग देने का सन्देश है।

कबीर ने कहा-
लघुता ते प्रभुता मिले ।प्रभुता ते प्रभु दूरि।
चींटी लै शक्कर चली।हाथी के सिर धूरि।।
यही भाव रैदास वाणी में-
कह रैदास तेरी भगति दूरि है,
भाग बड़ो सो पावै ।
तजि अभिमान मेटि आपा पर ,
पिपलिक हवै चुनि खावै।

कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य मात्र को भगवान् की प्राप्ति और मुक्ति का समान अधिकार प्राप्त है किन्तु इसमें सबसे बड़ी बाधा देहाभिमान ही है। स्वयं पर सब कुछ करने और कर लेने का अभिमान रहते ,कुछ भी मिलना संभव नहीं ,जबकि भगवत् शरणागति हो जाने और सभी सांसारिक कार्य को भगवत् प्रीत्यर्थ करने लगने पर कुछ भी मिलना शेष नहीं रहता, और सभी कुछ मिल जाता है।
अतः इस अवसर पर प्रभु स्मरण करते हुए, सन्त रैदास की वाणी से वाणी विरमती है,जहाँ शरणागत भक्त सभी कामनाओं की पूर्ति में प्रभु श्रीराम का ही भरोसा मानता है-

प्रतिज्ञा प्रतिपाल चहुँ जुग,
भगति पुरवन काम ।
आस तोर भरोस है,
रैदास जै जै राम ।।

।।हरिश्शरणम्।।

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युक्त योगी

युंजान योगी और युक्त योगी ,ये दो प्रकार योगियों के हो सकते हैं। युंजान का तात्पर्य ऐसे साधक योगाभ्यासी से है, जो योग साधन -परायण है, अर्थात् योगक्रिया में विधिवत् लगे हुए हैं। इसी से आगे की अवस्था को प्राप्त करने वाला योगी ,सिद्ध योगी कहा जायेगा, जहाँ पहुंच कर अब उसे कुछ भी प्राप्तव्य नहीं रहता।मतलब कि भगवान् की भाषा में युक्त योगी।
ऐसे ही योगी को भगवान् ने छठें अध्याय के अन्त में युक्ततम योगी कह दिया है,जो अनन्यपरायण होकर एकमात्र भगवद् आसक्त होकर अन्तरात्मा से श्रद्धा पूर्वक भगवान् को भजते हैं-

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मत:

वहीं षष्ठाध्याय के अष्टम श्लोक में भगवान् ने युक्त योगी या पूर्वोक्त सिद्ध योगी का वर्णन किया है।इसमें उसके चार विशेषण दिये गए हैं-

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चन:

इसमें प्रथम विशेषण ज्ञान विज्ञान से तृप्त आत्मा वाला कहा गया।ज्ञान का अर्थ एक मत के अनुसार परोक्ष ज्ञान से है, अर्थात् जो प्रत्यक्ष न होकर आचार्य या शास्त्रों द्वारा उपदिष्ट हो।इसी प्रकार विज्ञान का तात्पर्य अपरोक्ष ज्ञान से है, जो दैनन्दिन जीवन में अनुभव एवं क्रियान्वयन के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से बिना सन्देह और भ्रम के प्राप्त हो।
अन्य विचारकों के अनुसार, परमात्मा के निर्गुण निराकार तत्व के प्रभाव तथा माहात्म्य आदि के रहस्य सहित यथार्थ बोध को ज्ञान और उनके सगुण साकार तत्व के महत्व तथा गुणादि के रहस्य सहित यथार्थ बोध को विज्ञान कहते हैं।
वस्तुतः ये दोनों बातें एक ही परिभाषा की दो भाषास्वरूप हैं।क्योंकि निर्गुण ब्रह्म तथा अदृश्य जगत् का ज्ञान परोक्ष ही तो है और अवतार रूप सगुण ब्रह्म एवं दृश्यमान जगत् की प्रकृतिलीला का ज्ञान प्रत्यक्ष।
अतः जिनको परमात्मा के साकार निराकार दोनों तत्वों का भलीभाँति ज्ञान हो गया है और उनका अन्त:करण उनके प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप यथार्थ ज्ञान से सम्यक् तृप्त हो गया है, जिसके कारण उसे अब कुछ भी जानना शेष नहीं रहा, वही तो
“ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा” है।
भगवत्प्राप्त योगी के लक्षणों में”कूटस्थ” का समावेश भी बड़ा सार्थक है।सुनारों या लोहारों के यहाँ प्रयुक्त होने वाले लोहे के”अहरन” या ” निहाई ” को कूट कहते हैं।उस पर सोना-चाँदी या लोहादि धातुएं रखकर हथौड़े से कूटी जाती हैं।और कूटते समय उस पर बार-बार करारी चोट पड़ती है, फिर भी वह हिलता डुलता नहीं और बराबर एक स्थान पर एकरूप व अचल बना रहता है।इस तरह, जो व्यक्ति नाना प्रकार के हर्ष-सुख तथा दारुणदु:ख एवं भीषण कष्टों आ जाने पर भी अपने अन्त:करण में तनिक भी विकार उत्पन्न नहीं होने देता और सदासर्वदा अचल भाव से परमात्मा में ही स्थित रहता है, वही कूटस्थ है।
संसार के समस्त पदार्थों को मायामय एवं क्षणिक समझ लेने के कारण , युक्तयोगी की दशा ही ऐसी हो सकती है।वह किसी भी वस्तु में अनासक्त होने से संसार के सभी भोग्य पदार्थों के प्रति एक भाव वाला हो जाता है ,चाहे वह मिट्टी हो या सोना या और कोई अन्य। इसीलिए ऐसे युक्ततम योगी को “समलोष्टाश्मकाञ्चन” कहा गया है।

भगवान् स्वात्म में चित्त स्थिर करने की कृपा करें। जन्मजन्मान्तर से निरंतर प्रवहमान हम सब की चित्तवृत्ति का प्रवाह रुक सके ,और ” योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: “की पातञ्जलिक अञ्जलि-जल का पान हो सके।

।।हरिश्शरणम्।।

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कालेन आत्मनि विन्दति

श्रीमद्भगवद्गीता की उक्ति है, काल आ जाने पर स्वयं में आत्म लाभ हो जायेगा।
इन पंक्तियों को स्वामी विवेकानंद जी अपने अनेकानेक व्याख्यानों में बराबर दुहराते रहते थे। मकर सक्रांति, जो उनके जन्म के वर्षों में बारह जनवरी को पड़ती थी, उनका आविर्भाव काल था। और उनके शरीर धारण के अवसर ,वर्तमान मकर संक्रांति का काल जो 12 से 15 जनवरी पर खिसक कर आ चुका है,मन , उस आत्मज्ञ ,आत्मस्थ,सत्ता पर बारम्बार केन्द्रित हो जा रहा है।
वे कहते थे पाप और पुण्य का सारा द्वन्द्व ,अनेकत्व भावना के सृजन से है।अथवा बहुत्व के भाव से यह सब आ पहुंचा है।मनुष्य जितना एकत्व की ओर बढ़ता जाता है, उतना ही ” हम-तुम ” का भाव कम होता जाता है।हमसे यह पृथक् है, ऐसा भाव मन में उत्पन्न होने से ही अन्यान्य द्वन्द्वों का विकास होता है।परन्तु सम्पूर्ण एकत्व का अनुभव होते ही, मनुष्य का शोक या मोह नहीं रह जाता-

तत्र को मोह: को शोक: एकत्वम् अनुपश्यत:
सब प्रकार की दुर्बलता को ही पाप कहते हैं-Weakness is sin . इसीसे हिंसा एवं द्वेषादि जन्मते हैं ।हृदय में आत्मा सर्वदा प्रकाशमान है, किन्तु इस ओर कोई ध्यान नहीं देता।केवल इस जड़ शरीर, हड्डी तथा मांस के अद्भुत पिंजरे पर ही ध्यान रखकर ” मैं मैं ” करता है।यही देहाध्यास है, यही सारी दुर्बलताओं का मूल है, यही समस्त व्यवहार जगत् का मूल भी।इसके परे परमार्थ भाव है।
“जब तक “मै शरीर हूँ ” यह ज्ञान है तब तक ये सत्य हैं।परन्तु जब”मैं आत्मा हूँ ” यह अनुभव होता है, तब यह सब व्यवहार -सत्ता का मिथ्यात्व भान होता है।
लोक जिसे पाप कहता है, वह दुर्बलता का फल है।इस शरीर को”मैं” जानना-यह दुर्बलता का रूपान्तर है।जब “मैं आत्मा हूँ”इसी भाव पर मन स्थिर होगा,तब पाप और पुण्य ,धर्माधर्म के पार पहुंचा जा सकेगा। ” श्रीरामकृष्ण कहते थे, ” मैं ” के नाश में ही दु:ख का अन्त है।”
उन्होंने कहा -यह अहं या मिथ्या भाव कहाँ है ,कोई मुझे बताये? जो वस्तुतः स्वयं है ही नहीं उसका मरना और जीना कैसा?इस अहं रूप मिथ्या भाव से सभी मोहित- Hipnotised हैं।इस पिशाच से मुक्त होते ही,यह स्वप्नवद् दूर हो जाता है और दिखाई देता है कि आब्रह्मस्तम्ब सभी में एक ही आत्मा विराज रही है।इसीको जानना होगा, प्रत्यक्ष करना होगा।”
जितने भी साधन भजन हैं, वे सभी इस आवरण को दूर करने के निमित्त हैं।इसके हटने से ही ज्ञात होगा कि चित्सूर्य अपनी प्रभा से स्वयं ज्योतिमान् है।क्योंकि आत्मा ही एकमात्र स्वयं ज्योति है, स्वयं वेद्य है।
इसीलिये श्रुति कहती है-
” विज्ञातारम् अरे केन विजानीयात् ”
– बृहदारण्यक उपनिषद् 2/4/14

जो कुछ यह मनुष्य जानता है, वह मन की सहायता से, किन्तु मन तो जड़ वस्तु है।उसके पीछे शुद्ध आत्मा रहने के कारण मन का कार्य होता है।अतः मन के द्वारा उस आत्मा को कैसे जाना जा सकता है?
इससे तो लगता है कि मन या बुद्धि कोई भी शुद्धात्मा के पास नहीं पहुंच सकती।
ज्ञान की पहुंच यहीं तक है।परन्तु जब मन विकल्प रहित या वृत्तिहीन होता है, तभी मन का लोप होता है और तभी आत्मा प्रत्यक्ष होती है।इसी को श्रीमदाद्य शङ्कर ने ” अपरोक्षानुभूति” कहा है।

फिर प्रश्न ये उठा कि यदि मन ही अहं है, तो मन का लोप तो ” मैं ” कहाँ रहा?
इस पर स्वामी जी का उत्तर था-वह जो अवस्था है, यथार्थ में वही अहं का स्वरूप है।उस समय का जो ” अहं ” रहेगा वह सर्वभूतस्थ ,सर्वगत,सर्वान्तरात्मा होता है।घटाकाश टूटकर महाकाश का प्रकाश होता है।क्या घट टूटने पर उसके अन्दर के आकाश का विनाश होता है? नहीं।
इसी प्रकार छोटा “अहं” ,जिसे शरीर में बन्द समझा जाता है, फैल कर सर्वगत अहं या आत्मा रूप से प्रत्यक्ष हो जाता है।अतः मन मरा या रहा, इससे यथार्थ अहं या आत्मा का क्या।
इन्ही बातों को सहजता से समझाने के लिए अनेक शास्त्र लिखे गये हैं। ये सभी साधनमात्र हैं, साध्य तो वही आत्मा है।हम आपातमधुर स्वर्ण रजत और स्त्रियों के क्षणभंगुर सौन्दर्य से मोहित होकर इस देव दुर्लभ मनुष्य जन्म को कैसे खो रहे हैं।जबकि यह शरीर ही आत्मज्ञान का अद्वितीय साधन है-साधन धाम मोक्ष करि द्वारा। पाइ न जे परलोक सँवारा ।हे! महामाया यह भी आपका ही आश्चर्य जनक प्रभाव है ,कि आपने बड़े बड़े ज्ञानियों के भी चित्त को भ्रमित कर रखा है।अस्तु-
जब तुम्हारी कृपा करुणा का प्रसाद मिलेगा, तब हे महामाये विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषी , वह काल अवश्य ही आ जायेगा और कर्म-ज्ञान-भक्ति की योग संसिद्धि अवश्य ही हो जायेगी-

न हि ज्ञानेन सदृशं
पवित्रमिह विद्यते।
तत् स्वयं योगसंसिद्ध:
कालेनात्मनि विन्दति।।गीता-4/38।

।।हरिश्शरणम्।।

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राम नाम सर्वस्वम्

सन्त शिरोमणि तुलसीदास की हरिभक्ति का दर्शन दास्यभाव में ” मानस ” सहित उनकी सम्पूर्ण रचनाओं में मूर्तिमंत विराजित है, किन्तु दोहावली के स्फुट दोहों में दृश्यमान रामनामानुराग भी साधकों को जीवन्मुक्त करने में सर्वथा समर्थ है। जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना,
श्रवन रंध्र अहि भवन समाना का समर्थक दोहा द्रष्टव्य है-

रसना सापिन बदन बिल,जे न जपहिं हरिनाम।
तुलसी प्रेम न राम सों, नाहिं विधाता बाम ||

तात्पर्य यह कि ऐसे लोगों की जिह्वा सर्पिणी और मुख बिल के समान है जो हरिनाम नहीं जपतेऔर जिन्हें श्रीरामनाम से प्रेम नहीं हो उनका क्या भला होगा?
कदापि नहीं।उनके लिए तो ब्रह्मा भी वाम(प्रतिकूल) हो जाते हैं अर्थात् उनका बड़ा दुर्भाग्य है।

चित्रकूट सब दिन बसत,प्रभु सिय लखन समेत।
रामनाम जप जापकहिं,तुलसी अभिमत देत ।। दोहावली- 04 ।

वे भगवान् श्रीराम , चित्रकूट पर्वत पर श्रीजानकी जी तथा लक्ष्मण जी के साथ नित्य निवास करते हैं।वहाँ रहते हुए सभी नाम जापकों को अभीष्ट सिद्धि भी हो जाती है।इसमें यह भी संकेत है कि इस कराल कलिकाल में स्वामी जी को वहीं भगवान् का दर्शन लाभ हुआ था। एक दूसरे भाव के अनुसार जिन्हें अपने चित्त रुपी मकान में सदा अन्तर्यामी रूप से विद्यमान प्रभु श्रीराम, सीता रूपिणी बुद्धि और अहंकार रूपी श्रीलक्ष्मण जी का दर्शन होता है, उनकी अभिलाषपूर्ति तो स्वत:सिद्ध है।

एक छत्र इक मुकुट मनि,सब बरनन पर जोउ।तुलसी रघुवर नाम के, बरन विराजत दोउ।। दोहावली -09 ।

राम नाम के दोनों अक्षर सभी वर्णों के ऊपर होकर विराजते हैं। “र”अक्षर सभी वर्णों पर शुद्ध व्यंजन रूप में रेफ बनकर छत्र की तरह तथा “म” अक्षर अनुस्वार होकर मणिवत् विराजता है।इसलिए सम्पूर्ण वार्ता को शोभित करने के लिये रामनाम अवश्यंभावी है-श्वांस श्वांस में राम कहु श्वांस वृथा जनि होय,श्वांस बिचारी पाहुना आवन होय न होय ।
दूसरे भाव में यदि वर्ण शब्द से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्णों का बोध करें तो पहला वर्ण “र” छत्र रूप से सर्वरक्षक तथा” म” मणि रूप में समस्त सुखों का मूल मान्य होगा- असन बसन पशु वस्तु विविध विधि सब मणि मंह रह जैसे।इस प्रकार रामनाम के सब वर्णों के ऊपर रहने का अभिप्राय है कि इस पर सभी वर्णों का समान अधिकार है।

अतः- तुलसी प्रीति प्रतीति सों ,रामनाम जपु जाग।किये होय विधि दाहिनो, देइ अभागेहि भाग।। दोहावली-36

प्रेम और विश्वास पूर्वक रामनाम जपने से प्रतिकूल विधि या दैव अनुकूल(दाहिनो) हो जाता है और अभागे का भाग्य खुल जाता है।मानस में इसकी पुष्टि करते हुए-

मन्त्र महामनि विषय व्याल के।
मेटत कठिन कुअंक भाल के।।
तथा-
नाम जीह जपि जागहिं जोगी।
विरति विरंचि प्रपंच वियोगी।।

इसी का पोषण करते हैं।

मंगल भवन अमंगलकारी उमा सहित जेहि जपत पुरारी, की मानस अभिव्यक्ति का सुन्दर उदाहरण अध्यात्म रामायण में भी दीखता है, जहाँ शिवाशिव राम नाम को जपते हैं और मुक्ति कामियों को नामोपदेश
करते हुए निवास करते हैं-

अहं भवन् नाम गृणन् कृतार्थ:
वसामि काश्याम् अनिशं भवान्या।
मुमूर्षमाणस्य विमुक्तयेहं
दिशामि मन्त्रं तव राम नाम।।

इसीलिए दोहावली के सत्ताइसवें दोहे में नाम को कल्पवृक्ष बताया गया है।यह सारे सुमंगल की कंदली अर्थात् बीजवत् है जिसके विना किसी सुखद वृक्ष की कल्पना सम्भव नहीं।इस रामनाम के स्मरण मात्र से सारी सिद्धियाँ करतल गत होकर राजती हैं और पग -पग पर परम आनन्द की अनुभूति होती रहती है।

राम नाम कलि कल्पतरु, सकल सुमंगल कन्द।
सुमिरत करतल सिद्धि सब, पग पग परमानन्द ।।

।।हरिश्शरणम्।।

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