विवेक से विरक्ति तक

कहत कठिन समझत कठिन
साधन कठिन विवेक ।
होइ घुनाक्षर न्याय ज्यों
पुनि प्रत्यूह अनेक ।।

गोस्वामी जी इस दोहे के द्वारा विवेक प्राप्ति की कठिनता की ओर संकेत करते हैं। सत्यासत्य का विचार ही विवेक है।
” ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या ” इसका दृढ विश्वास और अनुभव कि चराचर दृश्य जगत् स्वप्नवत् मिथ्या है।यह अव्यक्त उपासना के भाव से ही सिद्ध होता है।
वस्तुतः भक्तिभाव से ब्रह्मा शिव नारद सनकादि से निरन्तर सेव्यमान करुणानिधान भगवान साकेत लोकवासी
साकार निराकार पदवाच्य पूर्णकाम तारक- मन्त्र नाम श्री सीताराम जी को जानना ही विवेक है।
विवेक कहने में बहुत कठिन है।इस स्थूल जगत् में जिसमें कि चराचर मोहित है, मिथ्या कह कर समझा देना सरल कार्य नहीं है।और उसका समझना भी अत्यंत कठिन है। तब साधन की कठिनता का कहना ही क्या है।विरला ही पुरुष इसे पाता है। जैसे करोड़ों घुनों में कोई ही भाग्यशाली घुन होता है, जो लकड़ी को काटता हुआ ” राम ” नाम लिख कर मुक्ति पा जाता है ।
घुन लकड़ी के भीतर काट-काट कर भाँति-भाँति की चित्र विचित्र रचना करता है।यदि कभी ऐसा करते-करते उसके द्वारा
लकड़ी में रामनाम लिख जाता है तो वह
घुन सदा के लिये सांसारिक झंझटों से मुक्ति पा जाता है। यही घुणाक्षर न्याय है।
मनुष्य की दशा भी ऐसी ही है।
कोई -कोई विरले मनुष्य होते हैं ,जिन्हें
सन्त-भगवन्त कृपा से रामनाम अवलम्ब मिल जाता है, जिससे वह ब्रह्मज्ञान को पाकर नित्य मुक्त सिद्ध हो पाता है।
जगदम्बा पार्वती ने यह बात शिव के समक्ष रखी थी-

नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी।
कोउ एक होइ धरम व्रत धारी।।
धरमशील कोटिक महँ कोई।
विषय विमुख विरागरत होई।।
कोटि विरक्त मध्य श्रुति कहहीं।
सम्यक् ज्ञान सकृत कोइ लहहीं।।
ज्ञानवन्त कोटिक महँ कोई।
जीवन मुक्त सकृत जग होई।।
तिन सहस्र महँ सब सुख खानी।
दुर्लभ ब्रह्मलीन विज्ञानी ।।

इसलिये भगवत् शरणागति ही माया मुक्ति का एकमेव उपाय जानकर रामनमाश्रयी हो जाये-

सुर नर मुनि कोउ नाहिं ,
जेहि न मोह माया प्रबल
अस विचारि मन माहिं ,
भजिय सदा सीतारमन।।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/12/25/विवेक-से-विरक्ति-तक/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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