भक्ति, सत्संग और सन्त

भक्ति ,सत्संग और सन्त शब्दों का अर्थ
क्रमशः सेवा, सत्य की संगति और सन्त महात्मा के रूप में ग्रहण किया जाता है।
किन्तु भक्ति को यदि भंग होने में ग्रहण करें तो उसका अर्थ होगा, शरीर संसार के मोह का भंग हो जाना।
और जब शरीर संसार से मोहभंग होगा तब सत् अर्थात् निरन्तर साथ रहने वाले
(परमात्मा) का संग स्वतः अनुभूयमान होने लगेगा।और भक्ति ,प्रीति और सेवा
परक होकर आत्मक्रीड आत्माराम बन कर सर्वानंद हो जाती है।
इसी तरह सन्त: पद संस्कृत भाषा में
” सत् ” (सत्य) शब्द का बहुवचन है।
और हिन्दी भाषा में सन्त रूप में व्यव-
हृत होता है, जिसका लोक सिद्ध अर्थ सरल साधु आदि ग्राह्य है। किन्तु मूल में जाने पर सत् को सतत या निरन्तर अर्थ में लेने पर ,निरन्तर सदा एक रूप रहनेवाला परमात्मा ही सिद्धार्थ निश्चित है।
कुल मिलाकर सभी एकार्थक निर्णीत हो जाते हैं।
वैसे भक्ति का पौराणिक नव स्वरूप भगवान् के गुणों का श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन,अर्चन ,वन्दन,दास्य और आत्मनिवेदन कहा गया है।
इनमें भगवन्नाम का संकीर्तन करने पर स्मरण तथा श्रवण भक्ति स्वत: बन पड़ती है।यह नाम कीर्तन कलिकाल में भव रोग का भेषज और तापत्रय हरने वाला है-

जासु नाम भव भेषज, हरन घोर त्रय शूल।
सो कृपालु मोहि तो पर सदा रहहु अनुकूल

भगवान् श्रीरामने श्रमणा शबरी को उपदेश करते समय नवधा भक्ति बखानी है-

इसमें सन्तों का संग, भगवत्कथा में रति,गुरु पदपंकज सेवा, हरि गुन गायन,
हरिनाम जप, इन्द्रिय निग्रह पूर्वक हरि स्मरण, प्रभुमय जगद्-दर्शन, परम सन्तोष पूर्वक परदोष अदर्शन, हरिविश्वास के कारण हर्ष-विषाद से दूरी को भक्ति का अलग-अलग सोपान बताया गया है।

सन्तों का संग सत्संग या भगवद्भक्त का संग प्राथमिक भक्ति है- प्रथम भगति सन्तन कर संगा ।और भगवान् की कथा को सुनने की वस्तुतः योग्यता ऐसे ही लोगों की है, जिन्हें सन्तसंग सोहता हो-

रामकथा के ते अधिकारी।
जिन्हके सतसंगति अति प्यारी।।
भगवान् शिव ने रामकथा को कलिमलमथनं स्वीकारा है और मन की मलिनता दूर करने का उपाय कहा है-

रामकथा गिरिजा मै बरनी।
कलिमल समनि मनोमल हरनी।।

सन्त महात्माओं ने गुरुभगवान् में ऐक्य स्वीकारते हुए गुरू पद पंकज सेवा को भक्ति माना ,जिसमें सेवक जीव की मुक्ति इसी भावना के अधीन है-

सेवक सेव्य भाव बिन
भव न तरिअ उरगारि।
भजहु राम पद पंकज
यह सिद्धांत बिचारि।।

इसी तरह एक भक्ति जो सर्वोच्च स्थान प्राप्त है,वह हरिनाम कीर्तन ही है और हो भी क्यों नहीं इस रसना(जिह्वा) की सार्थकता हरिभजन में जो है-

क्षणभंगुर जीवन की कलिका
कल प्रात को जाने खिली न खिली।
मलयाचल की शुचि शीतल मन्द
सुगन्ध समीर चली न चली।
कलि काल कुठार लिए फिरता
तन नम्र है चोट झिली न झिली।
भज ले हरिनाम अरी रसना
यह अन्त समय में हिली न हिली।

यह हरिनाम स्मरण भक्ति सत्संग प्रियता भी गुरुभगवान् की साक्षात् कृपा का ही परिणाम है ,किसी को भी रंच मात्र अहंकार नहीं करना चाहिए।और जिन्हें श्रीरामचरणों में रति हुई उनका काम मद क्रोधादि गल जाता है, वे सियाराम मय सब जग जानी हो जाते हैं, किसी से कोई विरोध भी नहीं करते-

उमा जे रामचरन रत
विगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत
केहि सन करहिं विरोध।।

भगवदुक्त सातवीं भक्ति में यही भाव भी है ,जिसमें भक्त को यत्र तत्र सर्वत्र अपने प्राणप्रिय भगवान ही दीखते हैं।
लेकिन भगवान अपने श्रीमुख से एक विशेष बात इस प्रसंग में कह जाते हैं वह ये है कि सन्त उनसे भी श्रेष्ठ हैं-

सातवँ सम मोहि मय जग देखा।
मो ते सन्त अधिकतर लेखा ।।

यह भाव भगवान् का वैसा ही प्रतीत होता है, जब भागवत्-पुराण प्रसंग में दुर्वासा से यहाँ तक कह देते हैं कि वे निरपेक्ष,शान्त,
निर्वैर,और समदर्शिता प्राप्त भक्तों के पीछ-पीछे चलते हैं, जिससे किसी तरह उन भक्त महात्माओं की चरण धूलि उन पर पड़े और वे पवित्र हो जायें।मतलब कि सन्त महात्मा उनसे बढ़कर हैं-

निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्।
अनूव्रजामि अहं नित्यं पूययेत्यंघ्रिरेणुभि:।।

सुखसन्तोष और जीवन में आनुकूल्य तभी प्राप्त है जब सत्संग सन्तसंग और सत्यस्वरूप भगवान् में रति हो जाये-

सत्संगति दुर्लभ संसारा।
निमिष दण्ड भरि एकौ बारा।।
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं।
सन्त मिलन सम सुख जग नाहीं।।
राम भगति मनि उर बस जाके।
दुख लवलेश न सपनेहुँ ताके।।

यही बात अन्यत्र स्वीकारते हुए सन्त शिरोमणि स्वामी तुलसीदास जी भक्ति को अनुपम सुख का मूल और सम्पूर्ण गुणों का आकर मानते हैं, जिसे बिना सत्संग के प्राप्त करना असंभव है-

भगति तात अनुपम सुखमूला।
मिलहिं जो सन्त होहिं अनुकूला।।
भक्ति स्वतंत्र सकल गुश खानी।
बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।।

अत: भक्त की प्रार्थना भगवान् से दैन्य ,दास्यभाव की प्राप्ति में पूर्ण होती है, क्योंकि ही दैन्य भाव के आचार्य एकमात्र भगवान् ही हैं और इस भाव से ही भवसिन्धु पार गमन संभव है- नाम लेत भव सिन्धु सुखाहीं। सुजन विचार करौं मन माहीं।
अन्त में मानसकार की दैन्य भक्ति से वाणी विराम लेती है ,भगवान् भक्ति का सातत्य बनाये रखें-

मो सम दीन न दीन हित ,
तुम्ह समान रघुवीर ।
अस विचारि रघुवंश मनि,
हरहु विषम भव- पीर।।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/12/20/भक्ति-सत्संग-और-सन्त/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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