द्वारिका पुरी गुजरात से श्रीमद्भागवत कथा

कल्याणानां निधानं कलिमलमथनं
पावनं पावनानाम् ।
पाथेयं यन् मुमुक्षो: सपदिपरपदप्राप्तये
प्रस्थितस्य।
विश्रामस्थानमेकं कविवरवचसां जीवनं
सज्जनानानाम्।
बीजं धर्मद्रुमस्य प्रभवतु भवतां
भूतये रामनाम।
-हनुमन्नाटक

द्वारिका पुरी गुजरात से श्रीमद्भागवत कथा
सत्संग कथामृत का पान कराते हुए श्रीमन् मलूक पीठ के अधिपति श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज ने उक्त सुन्दर सा श्लोक उद्धृत किया। पद्य में नाम महिमा का बड़ा हृदस्पर्शी चित्रण किया गया है।
कहते हैं इस नाट्य काव्य के कर्ता स्वयं हनुमानजी ही हैं। ग्रन्थ के प्रारम्भ में मंगल पद्य के रूप में यह उद्धृत है –

भगवान् श्री राम का नाम कल्याण का एकमात्र कोश(निधान) है। संसार के अन्य सभी साधन -सेवा कार्यों में यदि रामनाम का स्मरण उच्चारण होता रहे तो वह सभी साधन अवश्य ही सिद्धिदायक होंगे।अन्यथा की स्थिति में साधनसेवा में अहंभाव आ जाता है और यह बहुत बड़ा अपराध बनता है।अतः संसार के समस्त कार्यों को हरिनाम स्मरण पूर्वक करना चाहिए जिसमें देहाभिमान नहीं होगा और साथ ही कार्य भी सिद्ध होगा।
इसे कलिमलमथनं कहा गया ,मतलब कि यह कलिकाल के समस्त मालिन्य रूप पाप तापों को नष्ट करनेवाला है। कलियुग केवल नाम अधारा सुमिरि सुमिरि नर उतरैं पारा।
यह पावनं पावनानां है। पावनों को भी पावन पवित्र करनेवाला है। जो पावन है उसे भी पावन करनेवाला अर्थात् जप-तप पूजा-पाठादि शुभ कर्मों को कदाचित् सभी विघ्नों अन्तरायों से बचाने वाला है श्री राम का नाम।
पाथेयं यन् मुमुक्षो: अर्थात् मोक्ष पथ के अनुगामी लोगों के लिये यह पाथेय(रास्ते में लिया जानेवाला भोज्य) है।
कोई भी राहगीर जब चलता है तब रास्ते में शुद्ध पवित्र खाद्य रूप में पाथेय(अल्पाहार) अवश्य लेकर चलता है।
यह पाथेय जैसे मार्ग को सुगम और सिद्धि दायक बनाता उसी तरह मोक्ष मार्ग पर चलने वाले लोगों के लिए रामनाम पाथेय है जिससे लक्ष्य प्राप्ति अवश्य ही होती है।

यह सारे श्रेष्ठ कवियों का एकमात्र विश्रामस्थान है जहाँ आश्रय लेकर सभी कविजनों की वाणी पवित्र हो जाती है।
यह सज्जनों का जीवन भी है। सज्जन कौन हैं? जो रामनमाश्रयी है वही सज्जन कहलाने का अधिकारी भी है अन्यथा नहीं। सुन्दर काण्ड में सन्देह का निराकरण राम नाम से ही होता है।
लंका निशिचर निकर निवासा ।
इहाँ कहाँ सज्जन करि बासा।।

जब हनुमानजी महराज को सन्देह होता है कि यहाँ राक्षसों के बीच सज्जन कहाँ से आ गया, तब वह राम नाम ही जिसने सारे सन्देह का निराकरण कर दिया है।

राम नाम तेहिं सुमिरन कीन्हा ।
हृदय हरषि तेहिं सज्जन चीन्हा।।

जिसने रामनाम स्मरण किया है , वही सज्जन है, ऐसा हर्ष श्री हनुमानजी महाराज को होता है।अतः यह नाम स्मरण सज्जनों का प्राण(जीवन) होने से, सज्जन पुरुष का प्रमाणपत्र बन जाता है।इसलिए का कि- जीवनं सज्जनानाम् ।
यह धर्म रूपी वृक्ष का बीज है।मतलब कि जिस प्रकार बीज के बिना वृक्ष की उत्पत्ति, स्थिति और पोषण संवर्धन की कोई संभावना नहीं है ,उसी प्रकार राम नाथ के बिना धर्म की कल्पना नहीं की सकती।
अन्तिम कड़ी में कहते हैं कि-
प्रभवतु भवतां भूतये रामनाम
अर्थात् यह रामनाम आप सभी सज्जनों के अभूतपूर्व प्रभूत भूति-कल्याण की सिद्धि में सर्वथा समर्थ है।
इसलिये भैया ! राम नाम संकीर्तन सभी को, मानवमात्र को अवश्य कर्तव्य है ।इसी स्मरण के द्वारा हनुमानजी महाराज ने भगवान् को अपने वश में कर रखा था-

सुमिरि पवनसुत पावन नामू।
अपने बस करि राखे रामू।।

अन्त में हरि अनन्त हरिकथा अनन्ता का स्मरण करते हुए गुरु नानक देव की नाम निष्ठ वाणी से वाणी विराम लेती है-

नाम लिया सब कुछ लिया सकल शास्त्र का भेद।
बिना नाम नरके गया पढ़ि पढ़ि चारिउ वेद।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/12/05/द्वारिका-पुरी-गुजरात-से-श/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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