उपासक कौन है? जीवात्मा।
उपास्य कौन ? परमात्मा ।
उपासना क्या है? शरीर-संसार।
मतलब कि इस मनुष्य जीवात्मा का मनुष्यत्व इसमें है कि वह अपने उपास्य भगवान् की पूजा उसे प्राप्त शरीर-संसार के द्वारा करे।
शरीर के श्रवणेन्द्रिय से हरिकथा का श्रवण, त्वगिन्द्रिय से भगवत्-भागवत् मूर्तियों का स्पर्श, नेत्रेन्द्रिय से भगवद् रूपों का दर्शन, रसनेन्द्रिय(जिह्वा) द्वारा भगवन्
नाम कीर्तन का आस्वादन, और नासिका द्वारा समस्त सुगन्धित द्रव्यों में भगवद् गन्ध का आघ्राण ही इस मानव शरीर का अन्यतम ध्येय होना चाहिए। इस शरीर को संसार के विषयों के भोग में प्रयोग नहीं करना चाहिए।तात्पर्य ये कि संसार के समस्त शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादिकों को अपने अनन्य भगवान् में नियोजित करना चाहिए।
यह शरीर-संसार सब भगवत् प्रदत्त है, और हमेशा नित्य अपना भी नहीं है ,बल्कि यह कब किसका हुआ है कोई हमें बता दे? यह अस्थिर क्षणभंगुर अस्थाई नाशवान् और पराया है।
अतः शरीर संसार से प्रेम करने का मतलब है अनित्य से प्रेम करना जो हमारा न कभी रहा है और न कभी होगा अमृतवत् प्रतीयमान यह शरीर और संसार तो वस्तुतः विषतुल्य है जिसमें व्यर्थ ही कामिनी-कांचन में आसक्त हो हम मानव जीवन को औने-पौने में गवाँ देते हैं।
मन पछितैहैं अवसर बीते हरि पद भजु,
करम ,बचन अरु ही ते।सहसबाहु ,दसबदन आदि नृप बचे न काल बली ते।
हम हम करि धन धाम सँवारे, अन्त चले उठि रीते।
सुत बनितादि जानि स्वारथ रत ,न करु नेह सब ही ते।
अन्तहु तोहिं तजेगें पामर! तू न तजै अब ही ते ।
अब नाथहिं अनुरागु जागु जड़ ,त्यागु दुरासा जी ते।
बुझै न काम अगिनि तुलसी कहुँ बिषय भोग बहु घी ते।
इत्यादि बातें अपनी विनयपाती में भक्त ने कही हो या ” नर तन पाइ विषय मन देहीं।
पलटि सुधा ते शठ विष लेहीं।उनके मानस में आया हो ,सभी तो संसार की असारता को पुष्टि ही करते हैं।
मलूकपीठाधीश्वर सद्गुरु राजेन्द्रदास जी महाराज ने ऐसा ही संकेत करते हुए एक दिन, भगवत्प्राप्त सन्त मलूकदास जी का वचन उद्धृत किया जिसमें शरीर -संसार के प्रति वैषयिक अनुराग हेतु मनुष्य को सावधान रहने की चेतावनी दी गई है-
दर्पण आगे ठाढ़ि ह्वै,
नित्य सँवारै पाग।
ऐसी देहियाँ देखि कै
चोंच सँवारै काग ।।
सुन्दर देही देखि कै,
उपजत है अनुराग।
मढ़ी न होती चाम जों,
तो जीवत खाते काग।।
भैया शरीर संसार की दशा ही ऐसी है इसलिए जो आपका कभी नहीं रहा ऐसे के प्रति अनुराग त्याग कर सर्वदा हर लोक में हर देश में हर वेश में अपने साथ रहनेवाले और कभी अपना साथ न छोड़नेवाले एकमात्र भगवान् से प्रेम करना श्रेष्ठ है। देहाभिमान त्याग कर अनमोल मानव जीवन को इधर उधर में व्यर्थ नहीं गँवायें-
कबीवाणी है-
जब मैं था तब हरि नहीं,
अब हरि हैं मै नाहिं।
प्रेम गली अति साँकरी,
ता मैं दोउ न समाहिं।।
रात गँवाई सोइ के,
दिवस गँवाया खाय।
हीरा जनम अमोल सा,
कौड़ी बदले जाय ।।
इसलिए भगवन्नाम का जिह्वा पर और हृदय में आश्रयण संसार सागर से पार उतारने वाला है।यह भगवान् ही अपने हैं और उनकी भक्ति ही सार्वत्रिक सुख का आस्पद है, जो सद्गुरु की कृपा से प्राप्य है- भक्त की यही मान्यता है-
राम भगति मनि उर बस जाके।
दुख लवलेश न सपनेहुँ ताके।।
तात भगति अनुपम सुख मूला।
मिलहिं जो सन्त होहिं अनुकूला।।
और बात तो ये है कि अपने अनन्य और नित्य आश्रय भगवान् का भक्त उनसे बार बार यही माँगता है कि उसे चाहे अग्नि में जला दिया जाये ,जल में डुबा दिया जाये चाहे शूल पर चढ़ा दिया जाये विष ,बिच्छू, सर्प,हाथी, सिंह, शस्त्र से संत्रास दिया जाये,किन्तु उसे इन सभी का नाम मात्र भी कष्ट नहीं होगा, कष्ट तब होगाऔर भयंकर कष्ट होगा, जब किसी भक्त विमुख का मुख दीख जायेगा।
” भक्तमाल” की रसबोधिनी टीका के कर्ता परम भागवत प्रियादास जी कुछ ऐसा ही विचार है।उन्ही के शब्दों में-
अगिनि जरावो लैके जल में बुड़ावौ
भावै सूली पै चढावौ घोरि गरल पियायबी।
बीछू कटवावौ कोटि साँप लपटावौ,हाथी
आगे आगे डरवावौ ईति भीति उपजायबी।
सिंह पै खवावौ चाहे भूमि गड़वावौ तीखी,
अनी बिधवावौ मोहिं दुख नहीं पायबी ।
ब्रजजन प्रान कान्ह बात यह कान करौ
भक्त सों विमुख ताको मुख न दिखायबी।।
इसलिए मानव द्वारा सदा सर्वदा साथ नहीं त्यागने वाले भगवान् में आश्रयानुराग पूर्वक प्रेम और बारम्बार साथ छूटने वाले संसार का त्यागपू्र्वक विराग ही सार तत्व है। यही उपास्य -उपासक-उपासना का उपनिषद् है। भक्त की दृष्टि में निरन्तर भगवान् का स्मरण ही सम्पाद्य सम्पत्ति और सुख है, जबकि विस्मरण ही दुख है
” विपद् विस्मरणं विष्णोः सम्पन्नारायण-
स्मृति: ” इत्यादि भागवद् वचन से वाणी विराम लेती है।
।।हरिश्शरणम्।।
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