कामना भेद से ,विभिन्न इच्छाओं की पूर्णता के लिये सनातन धर्म की उपासना
पद्धति में अनेक देवी-देव मूर्तियाँ(स्वरूप)
हो सकते हैं, किन्तु कामनाओं के पार
निष्काम और मात्र प्रेमी-प्रेमास्पद ,
भक्त-भगवद् भाव में तो सभी भगवत्
तत्वों (स्वरूपों) में अभेद ही है।
भेदवादी अनुरक्त भक्त जन तो भगवती और भगवान् में भी भेद ही करते हैं ।यह भेदभाव उनकी अनुरक्ति का फल है अथवा अहंकार का यह वही जानें।लेकिन मेरी अपनी अन्तर्जगत् की यात्रा का दृष्टिकोण ये है कि कभी न कभी यदि अनुरागवश ऐसी भेददृष्टि है ,तो शीघ्र ही माँ उन्हें अभेद गति(ज्ञान)अवश्य ही देंगी।
लेकिन यदि अहं वशात् होगा तो जन्म
जन्मांतर में लम्बे अन्तराल के बाद भेददृष्टि समाप्त होगी।
त्रिदेवोपासना के क्रम में सृजन पालन और संहार हेतु तीन देवों और
देवियों की उपासना भक्त जगत् में प्रसिद्ध
ही है। किन्तु इनकी समूहालम्बनात्मक सृष्टि में ईश्वर का केवल दो ही स्वरूप एक
मातृरूप और दूसरा पितृरूप ही ठहरता है।
संस्कृत के सुकुमार महाकवि कालिदास ने अपने प्रसिद्ध महाकाव्य रघुवंश में भगवान् शिव और पार्वती के एकत्व रूप की स्थापना कर दी है, जिसमें वह इन्हें जगत् के पिता-माता मानते हैं।साथ ही वे यह भी कहते हैं कि ये जगन्माता और पिता शब्द और अर्थ की तरह परस्पर सम्पृक्त हैं-
वागर्थौ इव सम्पृक्तौ,
वागर्थप्रतिपत्तये।
जगत: पितरौ वन्दे,
पार्वतीपरमेश्वरौ।।
यही अन्तर्दृष्टि समेटे मानसकार ने
गिरा-अरथ जलबीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न की अवतारणा कर दी है।इस मान्यता में भी शब्दार्थ को सीताराम माना गया है।किन्तु विशेषता यह है कि ये दोनों जल और जल की लहर मात्र हैं ,जिनका
अभेद तो अन्धा भी जानता है।
अर्थ: शम्भु: शिवा वाणी ।माता शिवा
शब्द हैं तो पिता शिव अर्थ।ऐसा वचन
लिंग पुराण का है।शिव में भी उसका इकार मातृ तत्व है तो शकार शम् यानी कि मंगल।वकार से समूल ब्रहाण्ड में उसकी व्याप्ति प्रतीत होती है।और कुल मिलाकर ऐसी शिव मान्यता में शिवाशिवयो: अभेद:
अर्थात् शिव ही शिवा हैं और शिवा ही शिव।
उपरि उक्त व्याख्यान में शिव को अर्थ और शिवा को शब्द तत्व कहा है।विचारें तो बात यह है कि किसी अर्थ को लेकर सृजित शब्द जैसे कि” कमल ” कमल को ही बताता है , किन्तु शब्द अपना शब्दत्व खोकर श्रोता बोद्धा को अर्थ के रूप में ही अवभासित होता है।
यदि अर्थ से भिन्न शब्द होगा तब वह उस कथ्य अर्थ की प्रतीति नहीं करा सकता।
वस्तुतः अर्थ अदृश्य है तो शब्द दृश्य।
शब्द का चाक्षुष प्रत्यक्ष होता किन्तु अर्थ की आत्मिक अनुभूति मात्र।अतः यदि शब्द शरीर है, तब अर्थ उसकी आत्मा।
और लिपिगत होने पर ही शब्द दिखाई भी देता है, यदि यह शब्द लिपियों में न होकर केवल मात्र उच्चरित होता रहे तो यह भी अदृश्य ही रहेगा नेत्रेन्द्रिय द्वारा।और केवल और केवल आत्मा में ही अर्थ रूप में ही ग्राह्य होगा।
बद्धाकाश यानी कि शरीर के मुखेन्द्रिय द्वारा चला हुआ शब्द, मुक्ताकाश में चलते हुए पुनः बद्धाकाश श्रवणेन्द्रिय द्वारा अनन्त आत्माकाश द्वारा धारित और अनुभूत होता है। किन्तु यह तथ्य है कि अर्थ और शब्द अभिन्न ही हैं।
नाद, ध्वनि और शब्द की ओंकार से चली यह अनन्त महायात्रा निरन्तर अनुभूयमान है परमात्मा से आत्मा और आत्मा से परमात्मा की ओर ।कोई ओर छोर भी पता नहीं ,पता है तो केवल इस शब्दार्थ रूपी माता और पिता की और उनके अभेद रूप की।
जगद् व्यवहार में पिता-माता से उत्पन्न मूर्ति भी उससे अभिन्न ही होती है। और उत्पन्न सन्तानादि मूर्ति का सतत क्रम जागतिक परम्परा को अक्षुण्ण रखती है।
सामासिक रूप में शब्द रूप माँ और अर्थ रूप पिता के विना किसी कल्पना, भावना या ” भाव ” रूपी मूर्ति का सृजन एकदम असम्भव है। एकत्व से जन्मी यह भावमयी मूर्ति परमात्म तत्व या (महामाये
विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषी) परात्परा माँ
वस्तुतः एक और सर्वथा एक है। भाव की ऐसी शब्दार्थ धारा सर्वोच्च की सर्वोच्च साधना की सर्वोच्चता है।
न काष्ठे विद्यते देव:,
न पाषाणे न हिरण्मये।
भावे हि विद्यते देव:,
तस्माद् भावावलम्बनम्।।
और
भावेन लभते सर्वं,
भावेन देवदर्शनम्।
भावेन परमं ज्ञानं,
तस्माद् भावावलम्बनम्।।
इत्यादि रुद्रयामल तन्त्रोक्त वचनों का भाव साररूप में स्वीकारते हुए तथा वाह्यपूजाधमाधमा पर सम्यक् विधि निषेध
पालन का पारावार पार कर जाने वाले साधकों के लिए तो आत्म परमात्म तत्व अभिन्न रूप से एक ही है, चाहे वह मातृ शक्ति हो या पितृशक्ति ।
राम कृष्ण तू सीता व्रजरानी राधा इत्यादि वचनों का मर्म भी यही है।
अन्त में उस अनन्त सत्ता को
सर्वरुपमयी देवी सर्वं देवीमयं जगत् तथा
सियाराम मय सब जग जानी करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी ,नित्य सिद्ध स्वीकारते हुए सभी भगवद् भक्तों अभक्तों भी को प्रणाम निवेदित करते हुए वाणी लेती है।
।।हरिश्शरणम्।।
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