सभी भगवत् स्वरूप अभिन्न हैं

कामना भेद से ,विभिन्न इच्छाओं की पूर्णता के लिये सनातन धर्म की उपासना
पद्धति में अनेक देवी-देव मूर्तियाँ(स्वरूप)
हो सकते हैं, किन्तु कामनाओं के पार
निष्काम और मात्र प्रेमी-प्रेमास्पद ,
भक्त-भगवद् भाव में तो सभी भगवत्
तत्वों (स्वरूपों) में अभेद ही है।
भेदवादी अनुरक्त भक्त जन तो भगवती और भगवान् में भी भेद ही करते हैं ।यह भेदभाव उनकी अनुरक्ति का फल है अथवा अहंकार का यह वही जानें।लेकिन मेरी अपनी अन्तर्जगत् की यात्रा का दृष्टिकोण ये है कि कभी न कभी यदि अनुरागवश ऐसी भेददृष्टि है ,तो शीघ्र ही माँ उन्हें अभेद गति(ज्ञान)अवश्य ही देंगी।
लेकिन यदि अहं वशात् होगा तो जन्म
जन्मांतर में लम्बे अन्तराल के बाद भेददृष्टि समाप्त होगी।
त्रिदेवोपासना के क्रम में सृजन पालन और संहार हेतु तीन देवों और
देवियों की उपासना भक्त जगत् में प्रसिद्ध
ही है। किन्तु इनकी समूहालम्बनात्मक सृष्टि में ईश्वर का केवल दो ही स्वरूप एक
मातृरूप और दूसरा पितृरूप ही ठहरता है।
संस्कृत के सुकुमार महाकवि कालिदास ने अपने प्रसिद्ध महाकाव्य रघुवंश में भगवान् शिव और पार्वती के एकत्व रूप की स्थापना कर दी है, जिसमें वह इन्हें जगत् के पिता-माता मानते हैं।साथ ही वे यह भी कहते हैं कि ये जगन्माता और पिता शब्द और अर्थ की तरह परस्पर सम्पृक्त हैं-
वागर्थौ इव सम्पृक्तौ,
वागर्थप्रतिपत्तये।
जगत: पितरौ वन्दे,
पार्वतीपरमेश्वरौ।।

यही अन्तर्दृष्टि समेटे मानसकार ने
गिरा-अरथ जलबीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न की अवतारणा कर दी है।इस मान्यता में भी शब्दार्थ को सीताराम माना गया है।किन्तु विशेषता यह है कि ये दोनों जल और जल की लहर मात्र हैं ,जिनका
अभेद तो अन्धा भी जानता है।
अर्थ: शम्भु: शिवा वाणी ।माता शिवा
शब्द हैं तो पिता शिव अर्थ।ऐसा वचन
लिंग पुराण का है।शिव में भी उसका इकार मातृ तत्व है तो शकार शम् यानी कि मंगल।वकार से समूल ब्रहाण्ड में उसकी व्याप्ति प्रतीत होती है।और कुल मिलाकर ऐसी शिव मान्यता में शिवाशिवयो: अभेद:
अर्थात् शिव ही शिवा हैं और शिवा ही शिव।
उपरि उक्त व्याख्यान में शिव को अर्थ और शिवा को शब्द तत्व कहा है।विचारें तो बात यह है कि किसी अर्थ को लेकर सृजित शब्द जैसे कि” कमल ” कमल को ही बताता है , किन्तु शब्द अपना शब्दत्व खोकर श्रोता बोद्धा को अर्थ के रूप में ही अवभासित होता है।
यदि अर्थ से भिन्न शब्द होगा तब वह उस कथ्य अर्थ की प्रतीति नहीं करा सकता।
वस्तुतः अर्थ अदृश्य है तो शब्द दृश्य।
शब्द का चाक्षुष प्रत्यक्ष होता किन्तु अर्थ की आत्मिक अनुभूति मात्र।अतः यदि शब्द शरीर है, तब अर्थ उसकी आत्मा।
और लिपिगत होने पर ही शब्द दिखाई भी देता है, यदि यह शब्द लिपियों में न होकर केवल मात्र उच्चरित होता रहे तो यह भी अदृश्य ही रहेगा नेत्रेन्द्रिय द्वारा।और केवल और केवल आत्मा में ही अर्थ रूप में ही ग्राह्य होगा।
बद्धाकाश यानी कि शरीर के मुखेन्द्रिय द्वारा चला हुआ शब्द, मुक्ताकाश में चलते हुए पुनः बद्धाकाश श्रवणेन्द्रिय द्वारा अनन्त आत्माकाश द्वारा धारित और अनुभूत होता है। किन्तु यह तथ्य है कि अर्थ और शब्द अभिन्न ही हैं।
नाद, ध्वनि और शब्द की ओंकार से चली यह अनन्त महायात्रा निरन्तर अनुभूयमान है परमात्मा से आत्मा और आत्मा से परमात्मा की ओर ।कोई ओर छोर भी पता नहीं ,पता है तो केवल इस शब्दार्थ रूपी माता और पिता की और उनके अभेद रूप की।
जगद् व्यवहार में पिता-माता से उत्पन्न मूर्ति भी उससे अभिन्न ही होती है। और उत्पन्न सन्तानादि मूर्ति का सतत क्रम जागतिक परम्परा को अक्षुण्ण रखती है।
सामासिक रूप में शब्द रूप माँ और अर्थ रूप पिता के विना किसी कल्पना, भावना या ” भाव ” रूपी मूर्ति का सृजन एकदम असम्भव है। एकत्व से जन्मी यह भावमयी मूर्ति परमात्म तत्व या (महामाये
विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषी) परात्परा माँ
वस्तुतः एक और सर्वथा एक है। भाव की ऐसी शब्दार्थ धारा सर्वोच्च की सर्वोच्च साधना की सर्वोच्चता है।
न काष्ठे विद्यते देव:,
न पाषाणे न हिरण्मये।
भावे हि विद्यते देव:,
तस्माद् भावावलम्बनम्।।
और
भावेन लभते सर्वं,
भावेन देवदर्शनम्।
भावेन परमं ज्ञानं,
तस्माद् भावावलम्बनम्।।

इत्यादि रुद्रयामल तन्त्रोक्त वचनों का भाव साररूप में स्वीकारते हुए तथा वाह्यपूजाधमाधमा पर सम्यक् विधि निषेध
पालन का पारावार पार कर जाने वाले साधकों के लिए तो आत्म परमात्म तत्व अभिन्न रूप से एक ही है, चाहे वह मातृ शक्ति हो या पितृशक्ति ।
राम कृष्ण तू सीता व्रजरानी राधा इत्यादि वचनों का मर्म भी यही है।
अन्त में उस अनन्त सत्ता को
सर्वरुपमयी देवी सर्वं देवीमयं जगत् तथा
सियाराम मय सब जग जानी करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी ,नित्य सिद्ध स्वीकारते हुए सभी भगवद् भक्तों अभक्तों भी को प्रणाम निवेदित करते हुए वाणी लेती है।

।।हरिश्शरणम्।।

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विवेक से विरक्ति तक

कहत कठिन समझत कठिन
साधन कठिन विवेक ।
होइ घुनाक्षर न्याय ज्यों
पुनि प्रत्यूह अनेक ।।

गोस्वामी जी इस दोहे के द्वारा विवेक प्राप्ति की कठिनता की ओर संकेत करते हैं। सत्यासत्य का विचार ही विवेक है।
” ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या ” इसका दृढ विश्वास और अनुभव कि चराचर दृश्य जगत् स्वप्नवत् मिथ्या है।यह अव्यक्त उपासना के भाव से ही सिद्ध होता है।
वस्तुतः भक्तिभाव से ब्रह्मा शिव नारद सनकादि से निरन्तर सेव्यमान करुणानिधान भगवान साकेत लोकवासी
साकार निराकार पदवाच्य पूर्णकाम तारक- मन्त्र नाम श्री सीताराम जी को जानना ही विवेक है।
विवेक कहने में बहुत कठिन है।इस स्थूल जगत् में जिसमें कि चराचर मोहित है, मिथ्या कह कर समझा देना सरल कार्य नहीं है।और उसका समझना भी अत्यंत कठिन है। तब साधन की कठिनता का कहना ही क्या है।विरला ही पुरुष इसे पाता है। जैसे करोड़ों घुनों में कोई ही भाग्यशाली घुन होता है, जो लकड़ी को काटता हुआ ” राम ” नाम लिख कर मुक्ति पा जाता है ।
घुन लकड़ी के भीतर काट-काट कर भाँति-भाँति की चित्र विचित्र रचना करता है।यदि कभी ऐसा करते-करते उसके द्वारा
लकड़ी में रामनाम लिख जाता है तो वह
घुन सदा के लिये सांसारिक झंझटों से मुक्ति पा जाता है। यही घुणाक्षर न्याय है।
मनुष्य की दशा भी ऐसी ही है।
कोई -कोई विरले मनुष्य होते हैं ,जिन्हें
सन्त-भगवन्त कृपा से रामनाम अवलम्ब मिल जाता है, जिससे वह ब्रह्मज्ञान को पाकर नित्य मुक्त सिद्ध हो पाता है।
जगदम्बा पार्वती ने यह बात शिव के समक्ष रखी थी-

नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी।
कोउ एक होइ धरम व्रत धारी।।
धरमशील कोटिक महँ कोई।
विषय विमुख विरागरत होई।।
कोटि विरक्त मध्य श्रुति कहहीं।
सम्यक् ज्ञान सकृत कोइ लहहीं।।
ज्ञानवन्त कोटिक महँ कोई।
जीवन मुक्त सकृत जग होई।।
तिन सहस्र महँ सब सुख खानी।
दुर्लभ ब्रह्मलीन विज्ञानी ।।

इसलिये भगवत् शरणागति ही माया मुक्ति का एकमेव उपाय जानकर रामनमाश्रयी हो जाये-

सुर नर मुनि कोउ नाहिं ,
जेहि न मोह माया प्रबल
अस विचारि मन माहिं ,
भजिय सदा सीतारमन।।

।।हरिश्शरणम्।।

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भक्ति, सत्संग और सन्त

भक्ति ,सत्संग और सन्त शब्दों का अर्थ
क्रमशः सेवा, सत्य की संगति और सन्त महात्मा के रूप में ग्रहण किया जाता है।
किन्तु भक्ति को यदि भंग होने में ग्रहण करें तो उसका अर्थ होगा, शरीर संसार के मोह का भंग हो जाना।
और जब शरीर संसार से मोहभंग होगा तब सत् अर्थात् निरन्तर साथ रहने वाले
(परमात्मा) का संग स्वतः अनुभूयमान होने लगेगा।और भक्ति ,प्रीति और सेवा
परक होकर आत्मक्रीड आत्माराम बन कर सर्वानंद हो जाती है।
इसी तरह सन्त: पद संस्कृत भाषा में
” सत् ” (सत्य) शब्द का बहुवचन है।
और हिन्दी भाषा में सन्त रूप में व्यव-
हृत होता है, जिसका लोक सिद्ध अर्थ सरल साधु आदि ग्राह्य है। किन्तु मूल में जाने पर सत् को सतत या निरन्तर अर्थ में लेने पर ,निरन्तर सदा एक रूप रहनेवाला परमात्मा ही सिद्धार्थ निश्चित है।
कुल मिलाकर सभी एकार्थक निर्णीत हो जाते हैं।
वैसे भक्ति का पौराणिक नव स्वरूप भगवान् के गुणों का श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन,अर्चन ,वन्दन,दास्य और आत्मनिवेदन कहा गया है।
इनमें भगवन्नाम का संकीर्तन करने पर स्मरण तथा श्रवण भक्ति स्वत: बन पड़ती है।यह नाम कीर्तन कलिकाल में भव रोग का भेषज और तापत्रय हरने वाला है-

जासु नाम भव भेषज, हरन घोर त्रय शूल।
सो कृपालु मोहि तो पर सदा रहहु अनुकूल

भगवान् श्रीरामने श्रमणा शबरी को उपदेश करते समय नवधा भक्ति बखानी है-

इसमें सन्तों का संग, भगवत्कथा में रति,गुरु पदपंकज सेवा, हरि गुन गायन,
हरिनाम जप, इन्द्रिय निग्रह पूर्वक हरि स्मरण, प्रभुमय जगद्-दर्शन, परम सन्तोष पूर्वक परदोष अदर्शन, हरिविश्वास के कारण हर्ष-विषाद से दूरी को भक्ति का अलग-अलग सोपान बताया गया है।

सन्तों का संग सत्संग या भगवद्भक्त का संग प्राथमिक भक्ति है- प्रथम भगति सन्तन कर संगा ।और भगवान् की कथा को सुनने की वस्तुतः योग्यता ऐसे ही लोगों की है, जिन्हें सन्तसंग सोहता हो-

रामकथा के ते अधिकारी।
जिन्हके सतसंगति अति प्यारी।।
भगवान् शिव ने रामकथा को कलिमलमथनं स्वीकारा है और मन की मलिनता दूर करने का उपाय कहा है-

रामकथा गिरिजा मै बरनी।
कलिमल समनि मनोमल हरनी।।

सन्त महात्माओं ने गुरुभगवान् में ऐक्य स्वीकारते हुए गुरू पद पंकज सेवा को भक्ति माना ,जिसमें सेवक जीव की मुक्ति इसी भावना के अधीन है-

सेवक सेव्य भाव बिन
भव न तरिअ उरगारि।
भजहु राम पद पंकज
यह सिद्धांत बिचारि।।

इसी तरह एक भक्ति जो सर्वोच्च स्थान प्राप्त है,वह हरिनाम कीर्तन ही है और हो भी क्यों नहीं इस रसना(जिह्वा) की सार्थकता हरिभजन में जो है-

क्षणभंगुर जीवन की कलिका
कल प्रात को जाने खिली न खिली।
मलयाचल की शुचि शीतल मन्द
सुगन्ध समीर चली न चली।
कलि काल कुठार लिए फिरता
तन नम्र है चोट झिली न झिली।
भज ले हरिनाम अरी रसना
यह अन्त समय में हिली न हिली।

यह हरिनाम स्मरण भक्ति सत्संग प्रियता भी गुरुभगवान् की साक्षात् कृपा का ही परिणाम है ,किसी को भी रंच मात्र अहंकार नहीं करना चाहिए।और जिन्हें श्रीरामचरणों में रति हुई उनका काम मद क्रोधादि गल जाता है, वे सियाराम मय सब जग जानी हो जाते हैं, किसी से कोई विरोध भी नहीं करते-

उमा जे रामचरन रत
विगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत
केहि सन करहिं विरोध।।

भगवदुक्त सातवीं भक्ति में यही भाव भी है ,जिसमें भक्त को यत्र तत्र सर्वत्र अपने प्राणप्रिय भगवान ही दीखते हैं।
लेकिन भगवान अपने श्रीमुख से एक विशेष बात इस प्रसंग में कह जाते हैं वह ये है कि सन्त उनसे भी श्रेष्ठ हैं-

सातवँ सम मोहि मय जग देखा।
मो ते सन्त अधिकतर लेखा ।।

यह भाव भगवान् का वैसा ही प्रतीत होता है, जब भागवत्-पुराण प्रसंग में दुर्वासा से यहाँ तक कह देते हैं कि वे निरपेक्ष,शान्त,
निर्वैर,और समदर्शिता प्राप्त भक्तों के पीछ-पीछे चलते हैं, जिससे किसी तरह उन भक्त महात्माओं की चरण धूलि उन पर पड़े और वे पवित्र हो जायें।मतलब कि सन्त महात्मा उनसे बढ़कर हैं-

निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्।
अनूव्रजामि अहं नित्यं पूययेत्यंघ्रिरेणुभि:।।

सुखसन्तोष और जीवन में आनुकूल्य तभी प्राप्त है जब सत्संग सन्तसंग और सत्यस्वरूप भगवान् में रति हो जाये-

सत्संगति दुर्लभ संसारा।
निमिष दण्ड भरि एकौ बारा।।
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं।
सन्त मिलन सम सुख जग नाहीं।।
राम भगति मनि उर बस जाके।
दुख लवलेश न सपनेहुँ ताके।।

यही बात अन्यत्र स्वीकारते हुए सन्त शिरोमणि स्वामी तुलसीदास जी भक्ति को अनुपम सुख का मूल और सम्पूर्ण गुणों का आकर मानते हैं, जिसे बिना सत्संग के प्राप्त करना असंभव है-

भगति तात अनुपम सुखमूला।
मिलहिं जो सन्त होहिं अनुकूला।।
भक्ति स्वतंत्र सकल गुश खानी।
बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।।

अत: भक्त की प्रार्थना भगवान् से दैन्य ,दास्यभाव की प्राप्ति में पूर्ण होती है, क्योंकि ही दैन्य भाव के आचार्य एकमात्र भगवान् ही हैं और इस भाव से ही भवसिन्धु पार गमन संभव है- नाम लेत भव सिन्धु सुखाहीं। सुजन विचार करौं मन माहीं।
अन्त में मानसकार की दैन्य भक्ति से वाणी विराम लेती है ,भगवान् भक्ति का सातत्य बनाये रखें-

मो सम दीन न दीन हित ,
तुम्ह समान रघुवीर ।
अस विचारि रघुवंश मनि,
हरहु विषम भव- पीर।।

।।हरिश्शरणम्।।

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उपासक-उपास्य-उपासना

उपासक कौन है? जीवात्मा।
उपास्य कौन ? परमात्मा ।
उपासना क्या है? शरीर-संसार।
मतलब कि इस मनुष्य जीवात्मा का मनुष्यत्व इसमें है कि वह अपने उपास्य भगवान् की पूजा उसे प्राप्त शरीर-संसार के द्वारा करे।
शरीर के श्रवणेन्द्रिय से हरिकथा का श्रवण, त्वगिन्द्रिय से भगवत्-भागवत् मूर्तियों का स्पर्श, नेत्रेन्द्रिय से भगवद् रूपों का दर्शन, रसनेन्द्रिय(जिह्वा) द्वारा भगवन्
नाम कीर्तन का आस्वादन, और नासिका द्वारा समस्त सुगन्धित द्रव्यों में भगवद् गन्ध का आघ्राण ही इस मानव शरीर का अन्यतम ध्येय होना चाहिए। इस शरीर को संसार के विषयों के भोग में प्रयोग नहीं करना चाहिए।तात्पर्य ये कि संसार के समस्त शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादिकों को अपने अनन्य भगवान् में नियोजित करना चाहिए।
यह शरीर-संसार सब भगवत् प्रदत्त है, और हमेशा नित्य अपना भी नहीं है ,बल्कि यह कब किसका हुआ है कोई हमें बता दे? यह अस्थिर क्षणभंगुर अस्थाई नाशवान् और पराया है।
अतः शरीर संसार से प्रेम करने का मतलब है अनित्य से प्रेम करना जो हमारा न कभी रहा है और न कभी होगा अमृतवत् प्रतीयमान यह शरीर और संसार तो वस्तुतः विषतुल्य है जिसमें व्यर्थ ही कामिनी-कांचन में आसक्त हो हम मानव जीवन को औने-पौने में गवाँ देते हैं।

मन पछितैहैं अवसर बीते हरि पद भजु,
करम ,बचन अरु ही ते।सहसबाहु ,दसबदन आदि नृप बचे न काल बली ते।
हम हम करि धन धाम सँवारे, अन्त चले उठि रीते।
सुत बनितादि जानि स्वारथ रत ,न करु नेह सब ही ते।
अन्तहु तोहिं तजेगें पामर! तू न तजै अब ही ते ।
अब नाथहिं अनुरागु जागु जड़ ,त्यागु दुरासा जी ते।
बुझै न काम अगिनि तुलसी कहुँ बिषय भोग बहु घी ते।

इत्यादि बातें अपनी विनयपाती में भक्त ने कही हो या ” नर तन पाइ विषय मन देहीं।
पलटि सुधा ते शठ विष लेहीं।उनके मानस में आया हो ,सभी तो संसार की असारता को पुष्टि ही करते हैं।
मलूकपीठाधीश्वर सद्गुरु राजेन्द्रदास जी महाराज ने ऐसा ही संकेत करते हुए एक दिन, भगवत्प्राप्त सन्त मलूकदास जी का वचन उद्धृत किया जिसमें शरीर -संसार के प्रति वैषयिक अनुराग हेतु मनुष्य को सावधान रहने की चेतावनी दी गई है-

दर्पण आगे ठाढ़ि ह्वै,
नित्य सँवारै पाग।
ऐसी देहियाँ देखि कै
चोंच सँवारै काग ।।
सुन्दर देही देखि कै,
उपजत है अनुराग।
मढ़ी न होती चाम जों,
तो जीवत खाते काग।।

भैया शरीर संसार की दशा ही ऐसी है इसलिए जो आपका कभी नहीं रहा ऐसे के प्रति अनुराग त्याग कर सर्वदा हर लोक में हर देश में हर वेश में अपने साथ रहनेवाले और कभी अपना साथ न छोड़नेवाले एकमात्र भगवान् से प्रेम करना श्रेष्ठ है। देहाभिमान त्याग कर अनमोल मानव जीवन को इधर उधर में व्यर्थ नहीं गँवायें-

कबीवाणी है-
जब मैं था तब हरि नहीं,
अब हरि हैं मै नाहिं।
प्रेम गली अति साँकरी,
ता मैं दोउ न समाहिं।।
रात गँवाई सोइ के,
दिवस गँवाया खाय।
हीरा जनम अमोल सा,
कौड़ी बदले जाय ।।

इसलिए भगवन्नाम का जिह्वा पर और हृदय में आश्रयण संसार सागर से पार उतारने वाला है।यह भगवान् ही अपने हैं और उनकी भक्ति ही सार्वत्रिक सुख का आस्पद है, जो सद्गुरु की कृपा से प्राप्य है- भक्त की यही मान्यता है-

राम भगति मनि उर बस जाके।
दुख लवलेश न सपनेहुँ ताके।।
तात भगति अनुपम सुख मूला।
मिलहिं जो सन्त होहिं अनुकूला।।

और बात तो ये है कि अपने अनन्य और नित्य आश्रय भगवान् का भक्त उनसे बार बार यही माँगता है कि उसे चाहे अग्नि में जला दिया जाये ,जल में डुबा दिया जाये चाहे शूल पर चढ़ा दिया जाये विष ,बिच्छू, सर्प,हाथी, सिंह, शस्त्र से संत्रास दिया जाये,किन्तु उसे इन सभी का नाम मात्र भी कष्ट नहीं होगा, कष्ट तब होगाऔर भयंकर कष्ट होगा, जब किसी भक्त विमुख का मुख दीख जायेगा।
” भक्तमाल” की रसबोधिनी टीका के कर्ता परम भागवत प्रियादास जी कुछ ऐसा ही विचार है।उन्ही के शब्दों में-

अगिनि जरावो लैके जल में बुड़ावौ
भावै सूली पै चढावौ घोरि गरल पियायबी।
बीछू कटवावौ कोटि साँप लपटावौ,हाथी
आगे आगे डरवावौ ईति भीति उपजायबी।
सिंह पै खवावौ चाहे भूमि गड़वावौ तीखी,
अनी बिधवावौ मोहिं दुख नहीं पायबी ।
ब्रजजन प्रान कान्ह बात यह कान करौ
भक्त सों विमुख ताको मुख न दिखायबी।।

इसलिए मानव द्वारा सदा सर्वदा साथ नहीं त्यागने वाले भगवान् में आश्रयानुराग पूर्वक प्रेम और बारम्बार साथ छूटने वाले संसार का त्यागपू्र्वक विराग ही सार तत्व है। यही उपास्य -उपासक-उपासना का उपनिषद् है। भक्त की दृष्टि में निरन्तर भगवान् का स्मरण ही सम्पाद्य सम्पत्ति और सुख है, जबकि विस्मरण ही दुख है
” विपद् विस्मरणं विष्णोः सम्पन्नारायण-
स्मृति: ” इत्यादि भागवद् वचन से वाणी विराम लेती है।

।।हरिश्शरणम्।।

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द्वारिका पुरी गुजरात से श्रीमद्भागवत कथा

कल्याणानां निधानं कलिमलमथनं
पावनं पावनानाम् ।
पाथेयं यन् मुमुक्षो: सपदिपरपदप्राप्तये
प्रस्थितस्य।
विश्रामस्थानमेकं कविवरवचसां जीवनं
सज्जनानानाम्।
बीजं धर्मद्रुमस्य प्रभवतु भवतां
भूतये रामनाम।
-हनुमन्नाटक

द्वारिका पुरी गुजरात से श्रीमद्भागवत कथा
सत्संग कथामृत का पान कराते हुए श्रीमन् मलूक पीठ के अधिपति श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज ने उक्त सुन्दर सा श्लोक उद्धृत किया। पद्य में नाम महिमा का बड़ा हृदस्पर्शी चित्रण किया गया है।
कहते हैं इस नाट्य काव्य के कर्ता स्वयं हनुमानजी ही हैं। ग्रन्थ के प्रारम्भ में मंगल पद्य के रूप में यह उद्धृत है –

भगवान् श्री राम का नाम कल्याण का एकमात्र कोश(निधान) है। संसार के अन्य सभी साधन -सेवा कार्यों में यदि रामनाम का स्मरण उच्चारण होता रहे तो वह सभी साधन अवश्य ही सिद्धिदायक होंगे।अन्यथा की स्थिति में साधनसेवा में अहंभाव आ जाता है और यह बहुत बड़ा अपराध बनता है।अतः संसार के समस्त कार्यों को हरिनाम स्मरण पूर्वक करना चाहिए जिसमें देहाभिमान नहीं होगा और साथ ही कार्य भी सिद्ध होगा।
इसे कलिमलमथनं कहा गया ,मतलब कि यह कलिकाल के समस्त मालिन्य रूप पाप तापों को नष्ट करनेवाला है। कलियुग केवल नाम अधारा सुमिरि सुमिरि नर उतरैं पारा।
यह पावनं पावनानां है। पावनों को भी पावन पवित्र करनेवाला है। जो पावन है उसे भी पावन करनेवाला अर्थात् जप-तप पूजा-पाठादि शुभ कर्मों को कदाचित् सभी विघ्नों अन्तरायों से बचाने वाला है श्री राम का नाम।
पाथेयं यन् मुमुक्षो: अर्थात् मोक्ष पथ के अनुगामी लोगों के लिये यह पाथेय(रास्ते में लिया जानेवाला भोज्य) है।
कोई भी राहगीर जब चलता है तब रास्ते में शुद्ध पवित्र खाद्य रूप में पाथेय(अल्पाहार) अवश्य लेकर चलता है।
यह पाथेय जैसे मार्ग को सुगम और सिद्धि दायक बनाता उसी तरह मोक्ष मार्ग पर चलने वाले लोगों के लिए रामनाम पाथेय है जिससे लक्ष्य प्राप्ति अवश्य ही होती है।

यह सारे श्रेष्ठ कवियों का एकमात्र विश्रामस्थान है जहाँ आश्रय लेकर सभी कविजनों की वाणी पवित्र हो जाती है।
यह सज्जनों का जीवन भी है। सज्जन कौन हैं? जो रामनमाश्रयी है वही सज्जन कहलाने का अधिकारी भी है अन्यथा नहीं। सुन्दर काण्ड में सन्देह का निराकरण राम नाम से ही होता है।
लंका निशिचर निकर निवासा ।
इहाँ कहाँ सज्जन करि बासा।।

जब हनुमानजी महराज को सन्देह होता है कि यहाँ राक्षसों के बीच सज्जन कहाँ से आ गया, तब वह राम नाम ही जिसने सारे सन्देह का निराकरण कर दिया है।

राम नाम तेहिं सुमिरन कीन्हा ।
हृदय हरषि तेहिं सज्जन चीन्हा।।

जिसने रामनाम स्मरण किया है , वही सज्जन है, ऐसा हर्ष श्री हनुमानजी महाराज को होता है।अतः यह नाम स्मरण सज्जनों का प्राण(जीवन) होने से, सज्जन पुरुष का प्रमाणपत्र बन जाता है।इसलिए का कि- जीवनं सज्जनानाम् ।
यह धर्म रूपी वृक्ष का बीज है।मतलब कि जिस प्रकार बीज के बिना वृक्ष की उत्पत्ति, स्थिति और पोषण संवर्धन की कोई संभावना नहीं है ,उसी प्रकार राम नाथ के बिना धर्म की कल्पना नहीं की सकती।
अन्तिम कड़ी में कहते हैं कि-
प्रभवतु भवतां भूतये रामनाम
अर्थात् यह रामनाम आप सभी सज्जनों के अभूतपूर्व प्रभूत भूति-कल्याण की सिद्धि में सर्वथा समर्थ है।
इसलिये भैया ! राम नाम संकीर्तन सभी को, मानवमात्र को अवश्य कर्तव्य है ।इसी स्मरण के द्वारा हनुमानजी महाराज ने भगवान् को अपने वश में कर रखा था-

सुमिरि पवनसुत पावन नामू।
अपने बस करि राखे रामू।।

अन्त में हरि अनन्त हरिकथा अनन्ता का स्मरण करते हुए गुरु नानक देव की नाम निष्ठ वाणी से वाणी विराम लेती है-

नाम लिया सब कुछ लिया सकल शास्त्र का भेद।
बिना नाम नरके गया पढ़ि पढ़ि चारिउ वेद।

।।हरिश्शरणम्।।

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