धर्मजीवन का सूत्र है शील

धर्म युक्त जीवन का मूल स्रोत , शील में दिखाई देता है या यों कहें कि शील ही धर्म है। दूसरे शब्दों में जिन्होंने “शील ” को अपना जीवन धर्म स्वीकार कर लिया ,वे ही मनुष्य कहलाने के सच्चे अधिकारी हैं।
इस शील शब्द के आत्मा में प्रवेश करके अर्थानुसन्धान करने पर , यह सत्य , ऋत , स्वभाव, चरित्र ,निष्ठा तथा
आचरण आदि अर्थों में प्रयुक्त दिखाई देता है।
” शीलं स्वभावे सद्वृत्ते ” कह कर अमर कोशकार अमरसिंह इसे पुष्ट करते दीखते हैं।और यही अर्थ सर्वत्र अप्रमाद रूप से प्रयुक्त दीखता है।
यह स्वभाव क्या है , अपना भाव या आत्मभाव। आत्मभाव या आत्मा का भाव और आत्मा तो गुणों से परे है।
किन्तु शरीर को अधिष्ठान बनाने वाला आत्मा जब , आत्मनिष्ठ होकर विचार करता है, तब धारण किये गये मनुष्य शरीर और की चरित्र की चरितार्थता समझ में आती है।
मनुष्य का चरित्र उसका सद्वृत्त है , जिसका साक्षात् सम्बन्ध उसके सत्य आचरण को परिलक्षित करता है।
” आचार: परमो धर्म: ” आचार: प्रथमो धर्म: ” नास्ति सत्यात् परो धर्म:” इत्यादि वचनों से आचरण को परम धर्म मानते हुए सत्य -शील -सदाचार ही मनुष्य को मनुष्य बनाने वाले गुण सिद्ध होते हैं।
और इसीलिए इण्टरमीडिएट में पढ़ी गई एक बात सत्य प्रतीत हुई थी, जो कि सरदार पूर्णसिंह के निबन्ध में मिली थी वह ये कि सभ्यता का आचरण ही ” आचरण की सभ्यता” है ।
जो लोग सदाचारनिष्ठ जीवन व्यतीत करते हैं , वही स्व स्वभाव में रहते हैं ,उन्हीं का जीवन धर्ममय है अथवा वे ही शीलवान् और चरित्रशाली हैं। शीलवान् व्यक्ति का जीवन ही वस्तुतः संयमित मनुष्य का जीवन हैऔर धन्यजीवन है ।

जिसके शरीर में सर्वप्रिय “शील ” की विद्यमानता है ,उसके लिए अग्नि भी शीतल जल के समान, समुद्र छोटे से स्रोत के समान, सुमेरु पर्वत भी तत्क्षण छोटी सी शिला के समान , मृगपति सिंह तो चंचल मृग के समान, सर्प मनोहर माला के समान और विषरस भी अमृतवर्षा के समान बन जाता है –

वह्नि: तस्य जलायते जलनिधि: कुल्यायते तत्क्षणात्।
मेरु: स्वल्पशिलायते मृगपति: सद्यः कुरंगायते।
व्यालो माल्यगुणायते विषरस: पीयूषवर्षायते।
यस्यांगेखिल- लोकवल्लभतमं शीलं समुन्मीलति।।
योगिराज और महाराज भर्तृहरि के इन्हीं जीवनमूल्य गत सुविचारों के साथ यह विचार परिचर्चा विराम लेती है।
भगवान् सहायक हों।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/11/17/धर्मजीवन-का-सूत्र-है-शील/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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