व्यष्टि और समष्टि

आत्म का समुच्चय होने पर समष्टि दीखती है।और समष्टि का अनुभव होने पर व्यष्टि तिरोहित हो जाता है।

व्यष्टि और समष्टि मानवीय जीवन की विचित्र पहेली बनी हुई है। यह बड़ा अद्भुत द्वन्द्व है जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सतत अनुभूत हो रहा है। इसी के झंझावात में अनेक शरीरों का संचित संस्कार ,मानव मन को उड़ाये जा रहा है और खोज रहा है शान्ति , आनन्द के अविचल उत्स को जहाँ जाकर इन सबसे मुक्ति मिल सके।
पर विडम्बना क्या है कि आनन्द की खोज का पथिक मानव बार -बार जिसे पाकर विश्रांति चाहता है, वह उससे कहीं दूर होता चला जाता है।
लगता है उसका कुछ खो गया है, जिसे खोजने का प्रयास जारी है ।
वह है क्या जिसे पाने के लिये सतत संघर्ष हो रहा है ।
इसके मूल में जाने पर यह भी लगता है कि ,जो अभी उपयोगी है ,वही दूसरे क्षण अनुपयोगी हो जाता है।फिर नये की तलाश और उसे पाकर भी ठहराव नहीं होता । द्वन्द्वों को नियति मानता चलता जाता है, उसी सुख को खोजते लेकिन मिलता नहीं उसे मन माफिक जिसे पाकर, कुछ भी पाना शेष न रहे।
यही जीवन के अन्तर्जगत् की रहस्यमयी यात्रा है ,जिसका अन्तिम पड़ाव पाने में अनेक जन्म खोने पड़ते हैं।
आखिर वह रास्ता क्या है जिस पर चल कर हमारी यात्रा पूर्ण हो जाय , तो वैचारिक संघर्ष , स्वयं अपने में , अपने पर , आकर टिकता है , क्योंकि यही पूर्ण जो स्वयं में ठहरा।
सारी समस्या के जड़ में स्पष्ट रूप से व्यष्टि को समष्टि से अलग देखने की है।
यही द्वैत है , जिसने अद्वैत को उत्पन्न किया है ।और जब सबको अभिन्न, अखण्ड ,आत्मीय, अनन्त स्वरूप में देखने की दृष्टि दृढतर हो जाती है तभी आनन्द असीम की उपलब्धि स्वतः सिद्ध प्रतीत होती है।
सारा जगत् परिवार वत् दृष्टिगोचर होने लगता है , मैं मिट जाता है,सारभेद समाप्त होता है जहाँ से, अभेद प्रारम्भ होता है वहीं से।
सनातन देश की सनातन परंपरा के सनातन ऋषियों की सनातन वाणी प्रवहमान हो उठती है-

अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।

सारी धरती हमारे लिए कुटुम्ब दीखती है ,जब आनन्द का अविरल अविराम प्रवाह निष्यन्द बहने लगता है तब।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/11/10/व्यष्टि-और-समष्टि/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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