भक्ति

भक्ति ईश्वर के प्रति परमप्रेमस्वरूप है।अमृतस्वरूप है।उसकी प्राप्ति से मनुष्य सिद्ध बनता है अमरत्व प्राप्त करता है और परम तृप्ति का अनुभव करता है।इसे पाकर मनुष्य और किसी की आकांक्षा नहीं करता।किसी के लिए शोक नहीं करता।किसी से द्वेष भी नहीं करता।अन्य विषयों में नहीं रमता तथा किसी सांसारिक विषय में उत्साहित नहीं होता।उसे जानने पर मस्त और स्तब्ध हो जाता है ।आत्माराम हो जाता है।
यह बात मैं नहीं कह रहा मैं तो अनुभोक्तामात्र हूँ। देवर्षिनारद अपने भक्तसूत्र में –

” सा तु अस्मिन् परमप्रेमस्वरूपा ।अमृतरूपा च।यत् लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति।यत् प्राप्य न किंचिद् वांछति , न शोचति न द्वेष्टि, न रमते, नोत्साही भवति।यज् ज्ञात्वा मत्तो भवति, स्तब्धो भवति।आत्मारामो भवति ।”
परमहंस रामकृष्ण देव कहते थे-
” यह जगत् एक विशाल पागलखाना है।यहाँ तो सभी पागल हैं- कोई रूपयों के लिए, कोई स्त्रियों के लिए, कोई नाम और यश के लिए।कुछ मनुष्य ऐसे हैं, जो ईश्वर के लिए पागल हैं।अन्यान्य वस्तुओं के लिए पागल न होकर ईश्वर के लिए पागल होना क्या अच्छा नहीं है? ”
ईश्वरीय अनुभूति होती ही है अपने स्वयं के स्वरूप को वस्तुतः जान लेने के बाद और यही भक्ति की परिभाषा है-
” स्वस्वरुपावगति: भक्ति : ”
इसको किसी कामना की की पूर्ति का साधन नहीं बनाया जा सकता।
यह भक्ति तो समस्त कामनाओं और वासनाओं के निरोध का कारणस्वरूप है।
” सा न कमयमाना निरोधरूपत्वात् ”

भक्तिसूत्र के तृतीय अनुवाक् में बात आती है – ” जब समस्त चिन्ताएँ ,इन्द्रियों की क्रियायें और समस्त कर्म उनके प्रति अर्पित हो जाते हैं और क्षणमात्र के लिए भी उनकी विस्मृति हृदय में परम व्याकुलता उत्पन्न कर देती है ,तभी यथार्थ भक्ति का उदय समझना चाहिये। ”
“नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारिता तद्विस्मरणे परमव्याकुलितेति। ”
-ना . भ . अनुवाक् 3 , सू. 19 ।

भक्ति का यह स्वरूप ही , प्रेम की सर्वोच्च अवस्था है ,क्योंकि अन्यान्य साधारण प्रेम में प्रेमी , अपने प्रेमास्पद से प्रेम का प्रतिदान चाहता है , किन्तु सच्चा भक्त अपने प्रेम में केवल उनके सुख से ही सुखी होता है।
मीरा और भगवदासक्ता गोपिकाएँ ,इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।
और जब सभी आश्रयों को छोड़कर चित्त उनके (ईश्वर के ) प्रति आसक्त होता है, तब उससे प्रतिकूल सभी विषयों से उदासीनता हो जाती है।और यही यथार्थत्वेन भक्ति का स्वरूप ठहरता है-

” निरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यास: ।
तस्मिन् अनन्यता तद् विरोधिषु च
उदासीनता । ” ना.भ.सू .2/8-9 ।

ऐसे भक्त जहाँ रहते हैं, वह स्थान तीर्थ बन जाता है।वे जो कहते हैं शास्त्र हो जाता है, वे जो कुछ कार्य करते हैं ,वही सत्कर्म समझा जाता है।
” तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि।सुकर्मीकुर्वन्ति कर्माणि।सत् शास्त्रीकुर्वन्ति शास्त्राणि।तन्मया : । ”
और ऐसे भक्तों में जाति, कुल, विद्या,रूप,धन आदि का भेद नहीं रहता ,क्योंकि वे उनके (ईश्वर के)हैं।
सूर-कबीर-तुलसी-मीरा-रैदास आदि के चरित्र इसके प्रबल मानदण्ड हैं।
भक्तिसूत्र के नवम अनुवाक् में इसकी चर्चा इस प्रकार आई है –
” नास्ति तेषु जाति – विद्या -रूप -कुल -धन – क्रियादि – भेद:

।।हरिश्शरणम् ।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/11/06/भक्ति/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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