सत् अर्थात् , जो अपरिवर्तनीय, नित्य, सदैव एक रूप और निरन्तर है, उसका संग , यानी कि उसके साथ सम्यक् गमन करना। यही सत्संग है।
कोई ऐसा तत्व, जो कभी भी नहीं बदलता ,नित्य निरन्तर और एक रूप है, वह ,केवल परमात्मा ही है।उसी का संग करना,यदि सत्संग है, तब वह तो चेतन रूप से सभी जीवों में विद्यमान ही है।
अब प्रश्न यह है कि, वह नित्य सत् परमात्मा यदि सभी में है और कभी किसी का साथ नहीं छोड़ता , तो हम जीव उसके संग की अनुभूति क्यों नहीं कर पाते।
तब इसका साधारण उत्तर यही मिलता है कि, परमात्मा का अधिष्ठान ,जो
शरीर है ,इसमें से उसकी स्वयं में अनुभूति का न होना ,और इसका कारण है, जन्म जन्म से शरीर-संसार के गुणों में सुखानुभूति( अनुकूलता) का निश्चय कर बैठना। यही निश्चय पुनः-पुनः शरीर धारण करने का कारण है।
वस्तुतः यदि विचारें तो यह बड़ी भूल है क्योंकि, जहाँ अनुकूलता यानि कि सुख है, वह , वही सत् तत्व ही है, जो आत्म या परमात्म तत्व है। तब बात मन , बुद्धि तथा चेतना पर टिकती है, जहाँ इन्द्रियाँ , इस सुखान्वेषी जीव को शब्द, स्पर्श, रूप, रस,गन्धादि विषयों की ओर बलात् खींच कर संसार संग में उलझाए रखती हैं। यही सत् अर्थात् सतत जीव का, असत् में अभिनिवेश है।
आत्मविस्मृत, संसार संगी जीव की अवस्था उस जल की तरह है, जो गर्म -गर्म तवे पर पड़कर, नष्ट होता रहता है और पुनः-पुनः शरीरान्तरगमन करता भटकता रहता है।
इसके विपरीत वही जल ,यदि देश काल और स्थान भेद से कमल या सीपी में पड़ जाय , तो मोती का स्वरूप या मोती ही बन जाता है।इस प्रकार एक ही जल अपने आधार या स्थान के भेद से उसका संग पाकर नष्ट अथवा सुरूपता को धारण कर लेता है-
संतप्तायसि संस्थितस्य पयसो
नामापि न ज्ञायते।
मुक्ताकारतया तदेव नलिनी-
पत्रस्थितं राजते।
स्वातौ सागरकुक्षि शुक्तिपतितं
तज्जायते मौक्तिकं।
प्रायेणाधममध्यमोत्तम-
गुणा संवासतो जायते।।
इस तरह जलबिन्दुवत् जीव का सद् असद् से संयोग या संग ही सारे सुख-दु:खों का मूल है।इसलिये मनुष्य मात्र का प्रयास इस बात के लिये होना चाहिये कि, वह सुखाभासी विषयों का ध्यान त्याग कर ,अविद्या माया के क्षेत्र से एक मात्र मुक्ति दिलाने वाले आत्मदेव-परमात्म देव का शरण ग्रहण करे।क्योंकि भैया, जल तो वही है लेकिन सूर्य की ऊष्मा ग्रहण करके,वाष्प संघात रूप से आकाश में जाकर , मेघ बन कर स्वच्छातिस्वच्छ होकर भी गंगाजल में गिरने के बाद उससे मिलकर वही गंगाजल बनकर हितकारी कल्याण कारी भी बन जाता है ,और जमीन पर गिर कर मिट्टी के सम्पर्क से गन्दा होकर ,किसी की पिपासा भी शान्त नहीं कर सकता –
भूमि परत भा ढाबर पानी।
जिमि जीवहिं माया लिपटानी।।
अतः असत् और क्षण -क्षण परिवर्तन शील
जगत् का संग त्याग प्रतिक्षण एक रूप निरन्तर विद्यमान आनन्द घन सद् रुप परमात्मा में संग ही श्रेष्ठ है, जिसके द्वारा जीव की आत्मविस्मृति का समापन और परम कल्याण होगा ।
यह सत्संग भगवान् और उनके अत्यंत प्रिय भक्तों के चरित्रों, गुणों का होना चाहिए, जिनके सत्संग का परिणाम आनन्द मात्र ही होता है।इसलिये परम भागवत ” भक्तमाल ” ग्रन्थ के कर्ता श्री नाभादास जी के कवित्त से वाणी विराम लेती है-
भक्ति तरु पौधा ताहि विघ्न डर छेरीहू कौ
वारिदै विचार वारि सींच्यो सत्संग सों।
लाग्योई बढ़न,गोंदा चहुँदिशि कढ़न सो
चढ़न अकाश ,यश फैल्यो बहुरंग सों।।
संत उर आलबाल शोभित विशाल छाया
किये जीव जाल ,ताप गये यों प्रसंग सों।
देखौ बढ़वारि जाहि अजाहू की शंका हुती,
ताहि पेड़ बाँधै झूमें हाथी जीते जंग सों।।
भक्ति वृक्ष जब साधक के हृदय में छोटे से पौधे के रूप में होता है, तब हानि का भय बकरी से भी होता है, अतः पौधे की रक्षा के लिए उसके चारों विचारों का आलबाल(थाला)लगाकर सत्संग रूपी जल से सींचा जाता है।तब उसमें चारों ओर से शाखा-प्रशाखाएँ निकाल आती हैं।
और वह आकाश की ओर चढ़ने बढ़ने लगता है। सरल साधुहृदय थाले में सुशोभित इस विशाल भक्तिवृक्ष की छाया अर्थात् सत्संग पाकर त्रिविध तापों से तपे जीवसमूह सन्तापरहित होकर परमानन्द पाते हैं।ऐसा कार्य करने पर इस भक्ति का बढ़ना भी दर्शनीय है और विचित्र होता है।क्योंकि जिसे छोटी बकरी का डर था, उसी में आज महासंग्राम विजयी काम, क्रोधादि जैसे बड़े-बड़े हाथी बँधे हुए झूम रहे हैं।और सत्संग जल से सिंचित भक्ति वृक्ष को ईषन्मात्र भी हानि नहीं पहुंचा सकते।
।।हरिश्शरणम् ।।