धैर्य से आत्मानुभूति

त्याज्यं न धैर्यं विधुरपि काले
धैर्यात् कदाचित् स्थितिमाप्नुयात् स:
जाते समुद्रेपि हि पोतभंगे
सांयांत्रिको वांछति तर्तुमेव

कठिन से भी कठिन परिस्थितियों में मनुष्य को अपना धैर्य (सम्बल)नहीं छोड़ना चाहिए।समुद्र में नौका टूट जाने पर भी जहाज का चालक साहस और हिम्मत से उसमें से तैर कर पार करने की हर सम्भव चेष्टा करता है और पार भी कर जाता है।अतः धैर्य नहीं खोयें।
मानव जीवन भी इसी नाविक की तरह है, जहाँ संसार-सागर को पार करने हेतु दृढ इच्छा शक्ति, आत्मसम्बल और अटूट विश्वास की आवश्यकता होती है।
और उपर्युक्त गुणों की अनुभूति मानवीय शरीर में /से ही सम्भव लगता है।
आखिर मानव जीवन ही संवेदनशीलता ,संभावना वलितता, पश्चात् ताप अनुतप्तता,सृष्टि के कण -कण की अभिज्ञान वेदनीयता से साक्षात् संयुक्त होता है।
यही आत्म(स्व ) और परात्म(परस्व) का आत्मालोचन ही तो है एक संवेदनशील मानव जीवन।
दूसरे शब्दों में अपनी और अन्यों की पहचान में जीवन के उत्स की उपासना का आजीवन तप:पूत जीवन ,मनुष्य का जीवन है।
और नहीं तो वैदिक ऋषियों का यह उद्घोष कैसे होता –

शतं पश्येम शरद: शतं जीवेम शरद:शतं शृणुयाम शरद: प्रब्रवाम शरद:शतम्।

सैकड़ों वर्षों तक बोलने सुनने समझने जानने और नीरोग जीवन जीने की आकांक्षा मानवीय वृत्ति-प्रवृत्ति में उसके अन्तस् में अनुभूयमान उसकी परमात्म शक्ति की आत्मवेदना द्वारा होता है, जिसके लिये धैर्य एक अनिवार्य गुण है।

यह धैर्य ही है, जिससे आत्मानुभूति का भी मार्ग प्रशस्त होता है, मानव शरीर का चरम और परम लक्ष्य है।क्योंकि लक्ष्य हीन जीवन(मानव जीवन) भटकाव और पुनः पुनः टूट-फूट अस्त-व्यस्त और अन्न की तरह पकने ,गिरने उदय-अस्त होने में चलता रहता है , पूर्णता प्राप्ति हेतु संघर्ष रह कर भी अपूर्ण ही रहता है, जिसके लिए शायद सत्य, प्रेम, करणा, दया और क्षमा अनिवार्य है।
सत्य, प्रेम, करुणा, दया और क्षमा की क्षमता का उदय होने पर नैतिक-मूल्यों के जीवन की दृढ आधार शिला नीचे बिछी दीखती है और हम ” मनुर्भव” के ऋषि सन्देश को अपनाते हुए मनुष्य तो बन पाने की और अग्रसर होते हैं, नहीं तो हम प्रोफेसर और न जाने क्या-क्या हैं, मनुष्य नहीं।

हमारी ऋषि-परम्परा हमें मानवीय मूल्यों गुणों से जोड़े इसी विश्वास के साथ विचार परम्परा का एक पड़ाव पूरा हुआ।

।।हरिश्शरणम्।।

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धर्मजीवन का सूत्र है शील

धर्म युक्त जीवन का मूल स्रोत , शील में दिखाई देता है या यों कहें कि शील ही धर्म है। दूसरे शब्दों में जिन्होंने “शील ” को अपना जीवन धर्म स्वीकार कर लिया ,वे ही मनुष्य कहलाने के सच्चे अधिकारी हैं।
इस शील शब्द के आत्मा में प्रवेश करके अर्थानुसन्धान करने पर , यह सत्य , ऋत , स्वभाव, चरित्र ,निष्ठा तथा
आचरण आदि अर्थों में प्रयुक्त दिखाई देता है।
” शीलं स्वभावे सद्वृत्ते ” कह कर अमर कोशकार अमरसिंह इसे पुष्ट करते दीखते हैं।और यही अर्थ सर्वत्र अप्रमाद रूप से प्रयुक्त दीखता है।
यह स्वभाव क्या है , अपना भाव या आत्मभाव। आत्मभाव या आत्मा का भाव और आत्मा तो गुणों से परे है।
किन्तु शरीर को अधिष्ठान बनाने वाला आत्मा जब , आत्मनिष्ठ होकर विचार करता है, तब धारण किये गये मनुष्य शरीर और की चरित्र की चरितार्थता समझ में आती है।
मनुष्य का चरित्र उसका सद्वृत्त है , जिसका साक्षात् सम्बन्ध उसके सत्य आचरण को परिलक्षित करता है।
” आचार: परमो धर्म: ” आचार: प्रथमो धर्म: ” नास्ति सत्यात् परो धर्म:” इत्यादि वचनों से आचरण को परम धर्म मानते हुए सत्य -शील -सदाचार ही मनुष्य को मनुष्य बनाने वाले गुण सिद्ध होते हैं।
और इसीलिए इण्टरमीडिएट में पढ़ी गई एक बात सत्य प्रतीत हुई थी, जो कि सरदार पूर्णसिंह के निबन्ध में मिली थी वह ये कि सभ्यता का आचरण ही ” आचरण की सभ्यता” है ।
जो लोग सदाचारनिष्ठ जीवन व्यतीत करते हैं , वही स्व स्वभाव में रहते हैं ,उन्हीं का जीवन धर्ममय है अथवा वे ही शीलवान् और चरित्रशाली हैं। शीलवान् व्यक्ति का जीवन ही वस्तुतः संयमित मनुष्य का जीवन हैऔर धन्यजीवन है ।

जिसके शरीर में सर्वप्रिय “शील ” की विद्यमानता है ,उसके लिए अग्नि भी शीतल जल के समान, समुद्र छोटे से स्रोत के समान, सुमेरु पर्वत भी तत्क्षण छोटी सी शिला के समान , मृगपति सिंह तो चंचल मृग के समान, सर्प मनोहर माला के समान और विषरस भी अमृतवर्षा के समान बन जाता है –

वह्नि: तस्य जलायते जलनिधि: कुल्यायते तत्क्षणात्।
मेरु: स्वल्पशिलायते मृगपति: सद्यः कुरंगायते।
व्यालो माल्यगुणायते विषरस: पीयूषवर्षायते।
यस्यांगेखिल- लोकवल्लभतमं शीलं समुन्मीलति।।
योगिराज और महाराज भर्तृहरि के इन्हीं जीवनमूल्य गत सुविचारों के साथ यह विचार परिचर्चा विराम लेती है।
भगवान् सहायक हों।

।।हरिश्शरणम्।।

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व्यष्टि और समष्टि

आत्म का समुच्चय होने पर समष्टि दीखती है।और समष्टि का अनुभव होने पर व्यष्टि तिरोहित हो जाता है।

व्यष्टि और समष्टि मानवीय जीवन की विचित्र पहेली बनी हुई है। यह बड़ा अद्भुत द्वन्द्व है जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सतत अनुभूत हो रहा है। इसी के झंझावात में अनेक शरीरों का संचित संस्कार ,मानव मन को उड़ाये जा रहा है और खोज रहा है शान्ति , आनन्द के अविचल उत्स को जहाँ जाकर इन सबसे मुक्ति मिल सके।
पर विडम्बना क्या है कि आनन्द की खोज का पथिक मानव बार -बार जिसे पाकर विश्रांति चाहता है, वह उससे कहीं दूर होता चला जाता है।
लगता है उसका कुछ खो गया है, जिसे खोजने का प्रयास जारी है ।
वह है क्या जिसे पाने के लिये सतत संघर्ष हो रहा है ।
इसके मूल में जाने पर यह भी लगता है कि ,जो अभी उपयोगी है ,वही दूसरे क्षण अनुपयोगी हो जाता है।फिर नये की तलाश और उसे पाकर भी ठहराव नहीं होता । द्वन्द्वों को नियति मानता चलता जाता है, उसी सुख को खोजते लेकिन मिलता नहीं उसे मन माफिक जिसे पाकर, कुछ भी पाना शेष न रहे।
यही जीवन के अन्तर्जगत् की रहस्यमयी यात्रा है ,जिसका अन्तिम पड़ाव पाने में अनेक जन्म खोने पड़ते हैं।
आखिर वह रास्ता क्या है जिस पर चल कर हमारी यात्रा पूर्ण हो जाय , तो वैचारिक संघर्ष , स्वयं अपने में , अपने पर , आकर टिकता है , क्योंकि यही पूर्ण जो स्वयं में ठहरा।
सारी समस्या के जड़ में स्पष्ट रूप से व्यष्टि को समष्टि से अलग देखने की है।
यही द्वैत है , जिसने अद्वैत को उत्पन्न किया है ।और जब सबको अभिन्न, अखण्ड ,आत्मीय, अनन्त स्वरूप में देखने की दृष्टि दृढतर हो जाती है तभी आनन्द असीम की उपलब्धि स्वतः सिद्ध प्रतीत होती है।
सारा जगत् परिवार वत् दृष्टिगोचर होने लगता है , मैं मिट जाता है,सारभेद समाप्त होता है जहाँ से, अभेद प्रारम्भ होता है वहीं से।
सनातन देश की सनातन परंपरा के सनातन ऋषियों की सनातन वाणी प्रवहमान हो उठती है-

अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।

सारी धरती हमारे लिए कुटुम्ब दीखती है ,जब आनन्द का अविरल अविराम प्रवाह निष्यन्द बहने लगता है तब।

।।हरिश्शरणम्।।

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भक्ति

भक्ति ईश्वर के प्रति परमप्रेमस्वरूप है।अमृतस्वरूप है।उसकी प्राप्ति से मनुष्य सिद्ध बनता है अमरत्व प्राप्त करता है और परम तृप्ति का अनुभव करता है।इसे पाकर मनुष्य और किसी की आकांक्षा नहीं करता।किसी के लिए शोक नहीं करता।किसी से द्वेष भी नहीं करता।अन्य विषयों में नहीं रमता तथा किसी सांसारिक विषय में उत्साहित नहीं होता।उसे जानने पर मस्त और स्तब्ध हो जाता है ।आत्माराम हो जाता है।
यह बात मैं नहीं कह रहा मैं तो अनुभोक्तामात्र हूँ। देवर्षिनारद अपने भक्तसूत्र में –

” सा तु अस्मिन् परमप्रेमस्वरूपा ।अमृतरूपा च।यत् लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति।यत् प्राप्य न किंचिद् वांछति , न शोचति न द्वेष्टि, न रमते, नोत्साही भवति।यज् ज्ञात्वा मत्तो भवति, स्तब्धो भवति।आत्मारामो भवति ।”
परमहंस रामकृष्ण देव कहते थे-
” यह जगत् एक विशाल पागलखाना है।यहाँ तो सभी पागल हैं- कोई रूपयों के लिए, कोई स्त्रियों के लिए, कोई नाम और यश के लिए।कुछ मनुष्य ऐसे हैं, जो ईश्वर के लिए पागल हैं।अन्यान्य वस्तुओं के लिए पागल न होकर ईश्वर के लिए पागल होना क्या अच्छा नहीं है? ”
ईश्वरीय अनुभूति होती ही है अपने स्वयं के स्वरूप को वस्तुतः जान लेने के बाद और यही भक्ति की परिभाषा है-
” स्वस्वरुपावगति: भक्ति : ”
इसको किसी कामना की की पूर्ति का साधन नहीं बनाया जा सकता।
यह भक्ति तो समस्त कामनाओं और वासनाओं के निरोध का कारणस्वरूप है।
” सा न कमयमाना निरोधरूपत्वात् ”

भक्तिसूत्र के तृतीय अनुवाक् में बात आती है – ” जब समस्त चिन्ताएँ ,इन्द्रियों की क्रियायें और समस्त कर्म उनके प्रति अर्पित हो जाते हैं और क्षणमात्र के लिए भी उनकी विस्मृति हृदय में परम व्याकुलता उत्पन्न कर देती है ,तभी यथार्थ भक्ति का उदय समझना चाहिये। ”
“नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारिता तद्विस्मरणे परमव्याकुलितेति। ”
-ना . भ . अनुवाक् 3 , सू. 19 ।

भक्ति का यह स्वरूप ही , प्रेम की सर्वोच्च अवस्था है ,क्योंकि अन्यान्य साधारण प्रेम में प्रेमी , अपने प्रेमास्पद से प्रेम का प्रतिदान चाहता है , किन्तु सच्चा भक्त अपने प्रेम में केवल उनके सुख से ही सुखी होता है।
मीरा और भगवदासक्ता गोपिकाएँ ,इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।
और जब सभी आश्रयों को छोड़कर चित्त उनके (ईश्वर के ) प्रति आसक्त होता है, तब उससे प्रतिकूल सभी विषयों से उदासीनता हो जाती है।और यही यथार्थत्वेन भक्ति का स्वरूप ठहरता है-

” निरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यास: ।
तस्मिन् अनन्यता तद् विरोधिषु च
उदासीनता । ” ना.भ.सू .2/8-9 ।

ऐसे भक्त जहाँ रहते हैं, वह स्थान तीर्थ बन जाता है।वे जो कहते हैं शास्त्र हो जाता है, वे जो कुछ कार्य करते हैं ,वही सत्कर्म समझा जाता है।
” तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि।सुकर्मीकुर्वन्ति कर्माणि।सत् शास्त्रीकुर्वन्ति शास्त्राणि।तन्मया : । ”
और ऐसे भक्तों में जाति, कुल, विद्या,रूप,धन आदि का भेद नहीं रहता ,क्योंकि वे उनके (ईश्वर के)हैं।
सूर-कबीर-तुलसी-मीरा-रैदास आदि के चरित्र इसके प्रबल मानदण्ड हैं।
भक्तिसूत्र के नवम अनुवाक् में इसकी चर्चा इस प्रकार आई है –
” नास्ति तेषु जाति – विद्या -रूप -कुल -धन – क्रियादि – भेद:

।।हरिश्शरणम् ।।

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सत्संग

सत् अर्थात् , जो अपरिवर्तनीय, नित्य, सदैव एक रूप और निरन्तर है, उसका संग , यानी कि उसके साथ सम्यक् गमन करना। यही सत्संग है।
कोई ऐसा तत्व, जो कभी भी नहीं बदलता ,नित्य निरन्तर और एक रूप है, वह ,केवल परमात्मा ही है।उसी का संग करना,यदि सत्संग है, तब वह तो चेतन रूप से सभी जीवों में विद्यमान ही है।
अब प्रश्न यह है कि, वह नित्य सत् परमात्मा यदि सभी में है और कभी किसी का साथ नहीं छोड़ता , तो हम जीव उसके संग की अनुभूति क्यों नहीं कर पाते।
तब इसका साधारण उत्तर यही मिलता है कि, परमात्मा का अधिष्ठान ,जो
शरीर है ,इसमें से उसकी स्वयं में अनुभूति का न होना ,और इसका कारण है, जन्म जन्म से शरीर-संसार के गुणों में सुखानुभूति( अनुकूलता) का निश्चय कर बैठना। यही निश्चय पुनः-पुनः शरीर धारण करने का कारण है।
वस्तुतः यदि विचारें तो यह बड़ी भूल है क्योंकि, जहाँ अनुकूलता यानि कि सुख है, वह , वही सत् तत्व ही है, जो आत्म या परमात्म तत्व है। तब बात मन , बुद्धि तथा चेतना पर टिकती है, जहाँ इन्द्रियाँ , इस सुखान्वेषी जीव को शब्द, स्पर्श, रूप, रस,गन्धादि विषयों की ओर बलात् खींच कर संसार संग में उलझाए रखती हैं। यही सत् अर्थात् सतत जीव का, असत् में अभिनिवेश है।
आत्मविस्मृत, संसार संगी जीव की अवस्था उस जल की तरह है, जो गर्म -गर्म तवे पर पड़कर, नष्ट होता रहता है और पुनः-पुनः शरीरान्तरगमन करता भटकता रहता है।
इसके विपरीत वही जल ,यदि देश काल और स्थान भेद से कमल या सीपी में पड़ जाय , तो मोती का स्वरूप या मोती ही बन जाता है।इस प्रकार एक ही जल अपने आधार या स्थान के भेद से उसका संग पाकर नष्ट अथवा सुरूपता को धारण कर लेता है-

संतप्तायसि संस्थितस्य पयसो
नामापि न ज्ञायते।
मुक्ताकारतया तदेव नलिनी-
पत्रस्थितं राजते।
स्वातौ सागरकुक्षि शुक्तिपतितं
तज्जायते मौक्तिकं।
प्रायेणाधममध्यमोत्तम-
गुणा संवासतो जायते।।

इस तरह जलबिन्दुवत् जीव का सद् असद् से संयोग या संग ही सारे सुख-दु:खों का मूल है।इसलिये मनुष्य मात्र का प्रयास इस बात के लिये होना चाहिये कि, वह सुखाभासी विषयों का ध्यान त्याग कर ,अविद्या माया के क्षेत्र से एक मात्र मुक्ति दिलाने वाले आत्मदेव-परमात्म देव का शरण ग्रहण करे।क्योंकि भैया, जल तो वही है लेकिन सूर्य की ऊष्मा ग्रहण करके,वाष्प संघात रूप से आकाश में जाकर , मेघ बन कर स्वच्छातिस्वच्छ होकर भी गंगाजल में गिरने के बाद उससे मिलकर वही गंगाजल बनकर हितकारी कल्याण कारी भी बन जाता है ,और जमीन पर गिर कर मिट्टी के सम्पर्क से गन्दा होकर ,किसी की पिपासा भी शान्त नहीं कर सकता –

भूमि परत भा ढाबर पानी।
जिमि जीवहिं माया लिपटानी।।

अतः असत् और क्षण -क्षण परिवर्तन शील
जगत् का संग त्याग प्रतिक्षण एक रूप निरन्तर विद्यमान आनन्द घन सद् रुप परमात्मा में संग ही श्रेष्ठ है, जिसके द्वारा जीव की आत्मविस्मृति का समापन और परम कल्याण होगा ।
यह सत्संग भगवान् और उनके अत्यंत प्रिय भक्तों के चरित्रों, गुणों का होना चाहिए, जिनके सत्संग का परिणाम आनन्द मात्र ही होता है।इसलिये परम भागवत ” भक्तमाल ” ग्रन्थ के कर्ता श्री नाभादास जी के कवित्त से वाणी विराम लेती है-

भक्ति तरु पौधा ताहि विघ्न डर छेरीहू कौ
वारिदै विचार वारि सींच्यो सत्संग सों।
लाग्योई बढ़न,गोंदा चहुँदिशि कढ़न सो
चढ़न अकाश ,यश फैल्यो बहुरंग सों।।
संत उर आलबाल शोभित विशाल छाया
किये जीव जाल ,ताप गये यों प्रसंग सों।
देखौ बढ़वारि जाहि अजाहू की शंका हुती,
ताहि पेड़ बाँधै झूमें हाथी जीते जंग सों।।

भक्ति वृक्ष जब साधक के हृदय में छोटे से पौधे के रूप में होता है, तब हानि का भय बकरी से भी होता है, अतः पौधे की रक्षा के लिए उसके चारों विचारों का आलबाल(थाला)लगाकर सत्संग रूपी जल से सींचा जाता है।तब उसमें चारों ओर से शाखा-प्रशाखाएँ निकाल आती हैं।
और वह आकाश की ओर चढ़ने बढ़ने लगता है। सरल साधुहृदय थाले में सुशोभित इस विशाल भक्तिवृक्ष की छाया अर्थात् सत्संग पाकर त्रिविध तापों से तपे जीवसमूह सन्तापरहित होकर परमानन्द पाते हैं।ऐसा कार्य करने पर इस भक्ति का बढ़ना भी दर्शनीय है और विचित्र होता है।क्योंकि जिसे छोटी बकरी का डर था, उसी में आज महासंग्राम विजयी काम, क्रोधादि जैसे बड़े-बड़े हाथी बँधे हुए झूम रहे हैं।और सत्संग जल से सिंचित भक्ति वृक्ष को ईषन्मात्र भी हानि नहीं पहुंचा सकते।

।।हरिश्शरणम् ।।

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