सृष्टि के समस्त का एक नाम अवश्य ही है।क्योंकि नाम ही व्यवहार का समग्र आधार है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जहाँ-जहाँ व्यवहार-आचरण करना होता है, वहाँ-वहाँ नाम अनिवार्यतया आना चाहिए, जिसके विना ,विचारों की अभिव्यक्ति सम्भव नहीं।
नाम में चाहे राम हो या कृष्ण, चाहे सीता हो या राधा ,अयोध्या या मथुरा ,मधुर हो या लवण कोई भी हो सकता है, लेकिन बात केवल एक है कि,इनके बिना कौन क्या कर सकता है?
नाम शब्द, संस्कृत में अत्यधिक झुकने का अर्थ देता है, और यह झुकना हमेशा ही ,कुछ नहीं लेता सिवाय इसके कि कुछ अवश्य ही देता है। ” प्र ” उपसर्ग जोड़कर इसी नाम से प्रणाम हो जाता है, और यह प्रणाम असाधारण परिणाम दे जाता है
एक दूसरा विचार ये भी कि, नाम का अर्थ ” संज्ञा ” भी है। यह संज्ञा भी अद्वितीय और विचित्र है, क्योंकि अलग -अलग करके कहें, तो ” सम् ” माने सम्यक् ” ज्ञा ” माने ज्ञान ।इस प्रकार(संज्ञा) नाम के बिना(संज्ञान) ज्ञान होना सम्भव नहीं दीखता ।
” वाक्यपदीय” जैसे व्याकरण के दार्शनिक ग्रन्थ में ” भर्तृहरि ” ने इस असमंजस पर प्रकाश डाला है, कि कोई भी व्यक्ति शब्दों-नामों का कथन करके ही
अपने और दूसरों के आत्मिक विचारों का उद्घाटन और आदानप्रदान कर सकता है-
वे कहते हैं कि यह सारा संसार, अन्धकार के साम्राज्य में होता, यदि शब्दों के दीपक अपना प्रकाश न फैलाते-
इदमन्धन्तम: कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयम्।
यदि शब्दाह्वयं ज्योतिरासंसारं न दीप्यते।।
यह तो हुई महायोगी ब्रह्मवेत्ता भर्तृहरि की बात।अब आगे सम्पूर्ण पर दृष्टि डालें तो तो इन शब्दों और नामों में ही सारे वेदादि ग्रन्थ विरचित हैं।जिनका प्रतिपाद्य और लक्ष्य लोक और अलोक दोनों है।
इन वेदादिक शास्त्रों द्वारा हमें हमारे चरम की प्राप्ति होती दीखती है। इन सभी में लोकालोक कामनाओं की सिद्धि के मन्त्र , शब्दों-नामों के रूप में ही विद्यमान हैं।
दूसरे विचार की ओर चलें तो लगता है कि, जब हम कोई नाम पुकारते हैं, तब उस नाम के साथ उसका स्व स्वरूप प्रकट हो जाता है।क्योंकि वह नाम अपने गुण, लक्षण को लेकर उपस्थित होता है। इसका कारण है किसी भी नाम का अपने स्वरूप से अपृथक् होना।
वस्तुतः इसीलिए भैया, इस युग में नाम जप की महत्ता समझाई गई है।जब हम जिस किसी भगवत् ,भागवत् नाम का चिन्तन मनन करते हैं, तब वह नाम ही अभिन्न रूप से अपने गुणों ,कर्मों और समूल-प्रकृति के साथ अविकल रूप से उपस्थित होकर नाम-चिन्तक को सहयोग देता है।
अरे, लौकिक उदाहरण ही लें, तो स्मरण करें कि हमको जो कार्य पूर्ण करना होता है, हम तद्रूप तद्गुण नाम-वस्तु आदि का चिन्तन अन्वेषण करके अपना कार्य सिद्ध करते हैं।
तब , भगवत्-भागवत् स्वरूपों और नामों की बात ही और है।और एक बात और है कि, इस युग में जब प्रामाणिक वस्तु-व्यक्ति ,साधनादि पाना असंभव सा हो गया है, तब नाम-जप ही आत्मोद्धार का एकमात्र सबसे सबल परमोपाय है।
नाम-नामी और गुण-गुणी में तत्वतः अभेद तथा आधाराधेय सम्बन्ध सिद्धान्ततः और व्यवहारत: दोनों रूपों में समवायत्वेन है ।अतः-
कलियुग केवल नाम अधारा ।
महिमा जासु जानि गनराऊ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या
तपोयज्ञक्रियादिषु ।
न्यूनं सम्पूर्णतामेति
सद्यो वन्दे तमच्युतम्।।
जिस श्रीमन्नारायण के नामोच्चारण, स्मरणादि से सारे कामों की सिद्धि होती है, ऐसे ,अपने गुण-कर्म-स्वभाव से कभी भी च्युत नहीं होने वाले भगवान् को उनकी लीला उनके नाम-गुण-धाम को प्रणाम(प्र-नाम) है।
गीतोक्त गुर-वाणी – तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च , से वाणी विराम लेती है।
।।हरिश्शरणम्।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/10/30/नाम-नामी-में-अभेद/