मानव शरीर संसार के सभी प्राणियों में श्रेष्ठतम है। यह शरीर पाकर स्वयं में यह अनुभव न हो कि जीवन का महत्तर कार्य तो सेवा कार्य है, तो भला इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा।
यह बात साधारण सी है कि, मनुष्य को ही,यह अनुभव में आ भी सकता है कि, सेवा सर्वोत्तम कार्य है।
अब सेवा को विभाजित करें तो, यह दो प्रकार की हो सकती है, एक स्वयं की सेवा और दूसरी संसार के अन्य प्राणियों की।
यह सम्पूर्णसेवा का कार्य काम्यादि कर्मों के रूप में मानवीय जीवन का अभिन्न करणीय ,सिद्ध होता है।
काम्य या कामना परक कार्य वे हैं, जो किसी फल के उद्देश्य से सम्पादित किए जाते हैं।इसी के साथ निषिद्ध कार्य भी जुड़े हैं, जिन्हें मानव शरीर के लिये अनाचरणीय कहा गया है।
इसके अतिरिक्त नित्य कर्म हैं, जो कि अवश्य करणीय हैं।इसमें अपने शरीर के स्नानादि से लेकर नित्य सम्पाद्य ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ और अतिथि चर्यादि मनुष्य यज्ञ भी अवश्य ही करणीय हैं। यह विवेक केवल सेवा भावना भावित व्यक्ति के जीवन में ही सम्भव है।
इसके अलावा किसी निमित्त को पाकर, जो अवश्य करणीयकार्य ,वेद विहित हैं,नैमित्तिक कर्म कहे जाते हैं।इन्हें भी सेवा के अंगभूत रूप में किया जाना चाहिए।
ज्ञानोपासना का कार्य भी मनुष्य द्वारा किया जा सकता है, जोकि उसके उसके मानसव्यापार से सम्बन्धित है।श्रुति ने इसे इस प्रकार अभिव्यक्ति दी है-
” जो सर्वकर्मा ,सर्वकाम,सर्वगन्ध,इस सब को सब ओर से व्याप्त करनेवाला, वाग्रहित और सम्भ्रम शून्य है, वह मेरा आत्मा हृदय कमल के मध्य में स्थित है।यही ब्रह्म है।इस शरीर से मरकर मैं इसी को प्राप्त होउँगा इस विषय में कोई भी सन्देह नहीं है, वही ब्रह्म भाव प्राप्त करनेवाला सच्चा सेवक है । ”
इस प्रकार स्वयं के सहित चराचर जगत् की सेवा का अमूल्य कार्य केवल और केवल विद्या विनय सम्पन्न मानव जीवन के सत्संगलाभ का विषय हो सकता है।
यह बातें लिखने का उपक्रम इसलिये हुआ कि ,एक आत्मीय ने एक दिन कह दिया कि, कुछ लोग सेवक के रूप में जन्मते हैं और कुछ लोग स्वामी के रूप में। मैंने कहा, भैया यह बात उस-उस व्यक्ति के पूर्व जीवन के ही सेवा कर्मों का प्रतिफल हो सकता है, जिसे प्रारब्ध अथवा भाग्य कहा जाता है।
किन्तु सूक्ष्म विचार करने पर यह बात विचार में आती है कि मनुष्य मात्र को ही ,यह अनुभव में आयेगा कि वह अपने को पर-सेवा-कार्य में किस-किस रूप में सन्निविष्ट करके जीवन की सफलता के धर्म का मर्म समझ सकता है।
अपने को सेवक रूप में माननेवाले और ,अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम के समक्ष अपनी अकिंचनता को स्थापित करने वाले महात्मा भरत का जीवन आदर्श श्रेष्ठ सेवक का जीवन धर्म है।
वे कहते हैं –
राम पयादेहिं पाँय सिधाए।
हम कहँ रथ गज बाजि बनाए।।
सिर भरि जाउँ उचित अस मोरा।
सबसे सेवक धरम कठोरा ।।
हमारे प्रभु पैदल चल कर गए हैं ,तो हम तो सिर के बल चलें, तभी ठीक होगा।क्योंकि सेवा का कार्य, बड़ा ही कठिन कार्य है।
महाराज भर्तृहरि भी सेवा कर्म को योगियों से भी श्रेष्ठ बतलाते हैं-
सेवा-धर्म: परमगहन:
योगिनामपि अगम्य: ।।
इसलिये भैया ,यह सेवा-सेवक-सेव्य का उच्चतम विचार करनेऔर करानेवाले अपने पूर्वाचार्यों और आत्मीय जनों का का मैं ऋणी हूँ ,जिन्होंने इस सनातन ऋषि-विचारगंगाधारा के पवित्र जल में मुझे स्नान करा दिया है।
।।हरिश्शरणम्।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/10/29/जीवन-का-श्रेष्ठतम-कार्य-ह/