मनुष्य का मन बहुत महत्वपूर्ण है।मन को श्रोत्रेन्द्रिय आदि पञ्च ज्ञानेन्द्रियों सेअत्यंत अतिरिक्त बताया गया है।किन्तु यह मन सभी से अलग रहकर भी जिस-जिस इन्द्रिय के साथ संयोग करता है उसी-उसी को ग्रहण करता है। बिना मन के कोई भी इन्द्रिय किसी अन्य ज्ञानेन्द्रिय-संयोग को पाकर भी उनके विषयों को ग्रहण नहीं कर सकता है।
भगवान् ने गीताशास्त्र में जीवात्मा द्वारा ज्ञानेन्द्रियों श्रोत्र, चक्षु,त्वचा, रसना और नासिका के साथ ” मन ” को आश्रय बना कर क्रमशः शब्द, रूप, स्पर्श, रस,गन्धादि विषयों के सेवन की बात कही है-
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातन:।
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मन: चायं विषयानुपसेवते।।
15/7-9 ।
यह मन ,साधक की आत्म अनात्म सम्बन्धी विवेक ज्ञान को हर लेता है।तभी तो इसकी मनोनुकूल वस्तुएँ ” मनोहर ” कही जाती हैं।
वैशेषिक दर्शन 3/2/1 में मन का लक्षण किया गया है।ऋषि कहते हैं कि, आत्मा,इन्द्रिय और विषयों का मन से सम्पर्क होने पर ही विषयादि का ज्ञान होता हुआ दीखता है-
आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानस्य
भाव: अभावश्च मनस: लिङ्गम्।।
मूलतः विचार करें, तो यह तात्विक बात है कि, ज्ञान का होना और न होना ही मन का लक्षण है।
यह मन जो विषयों का ज्ञान कराता है, जब-जब इन्द्रियों में स्वच्छंद विचरता है, तब-तब बुद्धि को विचलित, अस्थिर करता है, और बुद्धि को मानो हर लेता है ,जैसे कि जलधारा में वायु ,नौका को गन्तव्य से भटका देती है-
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।।
गीता….-2/67 ।
मैत्रायणी उपनिषद् में इसीलिये मन को बन्धन और मुक्ति का कारण बताया गया है।जब उच्छृंखल होकर जब यह विषयों में
भटकाता है, तब अपने ” विकल्पात्मक ” स्वरूप के कारण यही संसार का कारण है।इसके विपरीत अपने ” संकल्पात्मक ” स्वस्वरूप में स्थित होकर जब यह,आत्मस्थ परमात्मस्थ होता है, तब स्वस्वरूप का ज्ञान करा कर नित्य ,शुद्ध बुद्ध आनन्द घन भगवत्प्राप्ति का कारण बन जाता है-
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं मतम्
– मैत्रायणी उपनिषद् 4/11
मन को निश्चल करने के लिये भगवान् ने गीताशास्त्र में अभ्यास और वैराग्य को साधन बताया-
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते
– गीता 6/35
यह मन कैसे संसारोपरति -वैराग्य ग्रहण करे,इसके लिये उन्होंने कहा कि, धीरे-धीरे अर्थात् सहसा नहीं, किन्तु धैर्य युक्त बुद्धि द्वारा यह सम्भव है।यह कार्य मन को आत्मा में संस्थित करके संभव है-
शनैः-शनैः उपरमेद् बुद्ध्या धृतिपरिगृहीतया
आत्मसंस्थं मन: कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्।। 6/25 ।
उपर्युक्त मन्त्र में एक विधि ,मनोनिग्रह का समझाने के बाद महागुरु एवं ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च शिक्षक आगे दशमाध्याय में स्वयं को इन्द्रियों में ” मन ” बता देते हैं-
इन्द्रियाणां मन चास्मि ।- 10/22
और नवमाध्याय में -मन्मना भव मद्भक्तो,
मद्याजी मां नमः कुरू(34) तथा अठारहवें अध्याय में पुनः –
मन्मना भव मद्याजी मद्भक्तो मां नमस्कुरु
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्यतिजाने प्रियोसि मे
-18/65
वही बात कह कर सरलता से समझा दिया है, कि वे भगवान् जब स्वयं मन ही हैं, तो अपने को अर्थात् स्वात्मा को, स्वयं को उन्हीं में लगा कर मन को निश्चलता और आत्यन्तिक शान्ति मिल पायेगी।
” मयि एव मन आधत्स्व ,मयि बुद्धिं निवेशय ” कहते हुए बारम्बार इस बात को दृढ कर देते हैं ,मन के प्रति सतत सावधानी बरतनी है।और अस्थिर मन को
एकमात्र मुझको ही सौंप कर स्थिर किया जा सकता है।
यजुर्वेद में ऋषिभी यही देखते हैं-
“तन् मे मन: शिवसङ्कल्पमस्तु ”
भगवान् , जो स्वयं मन: स्वरूप हैं, साधक, भक्तों पर कृपा करें ,तभी ,सद्गुरु-शरण सन्निधि द्वारा यह सम्भव है।
एक बड़ी बात उन्होने पूर्वोक्त मन्त्र की अन्तिम अर्धाली में कह दी है, कि मैं इस बार प्रतिज्ञा करता हूँ , इस बात को सत्य जान लो कि , निश्चित रूप से मत्परायण होने पर तुम्हें मेरी प्राप्ति होगी,क्योंकि तुम
मेरे प्रिय हो।
इस प्रकार इस अस्थिर मन की स्थिरता सद्गुरु-भगवत्परायता में ही सुनिश्चित है, जिससे सारे प्रतिबन्ध शून्य हो पायेंगे,और
यह महत्वपूर्ण मन केवल और केवल सङ्कल्पात्मक होकर शिव बन जायेगा।
भगवान् सहायक हों।
।। हरिश्शरणम् ।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/10/20/सबसे-महत्वपूर्ण-मन-है/