सन्यास तथा योग द्वारा मोक्षसिद्धि

श्रीमद्भगवद्गीता का आरम्भ से लेकर छ: अध्याय पर्यन्त का अद्वितीय-गुरुशिष्योपदेश कर्मयोग नाम से प्रख्यात है।इसके उपसंहारात्मक षष्ठाध्याय को
आत्मसंयम योग एवं ध्यानयोग नाम दिया गया है।ध्यानयोग में शरीर, इन्द्रिय, मन तथा बुद्धि का संयम परमावश्यक है।
शरीरेन्द्रियमनबुद्धि – इन्हें आत्मा नाम से संयुक्त रूप से अभिहित किया गया है।इस अध्याय में इन्हीं के संयम का वर्णन होने से यह ” आत्मसंयमयोग ” भी है।
पहले मन्त्र में ही सन्यासी का निर्वचन करते हुए कहा गया है कि, जो मनुष्य कर्मफल का आश्रय न लेकर करनेयोग्य
(कार्य)शास्त्र विहित कर्म ही करता है, वह सन्यासी है और वही योगी भी। जो अग्नि होत्रादि अनुष्ठानों को त्यागने वाला(निरग्नि)तथा मात्र क्रियाओं का त्याग करनेवाला(अक्रिय)है ,वह सन्यासी-योगी नहीं –
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य:।
स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय:।। 6/1 ।।
तात्पर्य यह कि फलेच्छा के बिना कर्तव्य कर्म करनेवाला सन्यासी और योगी दोनों है।इसी भाव का प्रकटीकरण अग्रिम पंक्ति में है, जहाँ सन्यास और योग का एकत्व सिद्ध है-
यं सन्यासमिति प्राहु: योगं तं विद्धि पाण्डव
नह्यसन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन।।6/2।।
आगे चलकर भगवान् इसी भाव को प्राप्त महात्मा को सर्वसंकल्पसन्यासी “योगारूढ” कहते हैं,क्योंकि वह न तो इन्द्रिय विषयों में और न ही कर्मों में आसक्त है-
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्यते।
सर्वसंकल्पसन्यासी योगारूढस्तदोच्यते।।
इस प्रकार सन्यासी और योगी का ऐक्य बताने के बाद स्वयं अपने ही द्वारा अपने उद्धार या जीवन्मुक्ति का उद्धोष होता है-
जीवात्मा का स्वात्मा ही उसका मित्र और शत्रु दोनों है।अतः अपने आप ही अपना उद्धार करे,अधोगति में न डाले।
“अपने द्वारा अपना उद्धार” के उपदेश में जीवात्मा को आश्वस्त किया गया है कि उत्थान-पतन स्वयं जीव के हाथ में है।
जो आत्मोद्धार के लिए चेष्टारत है,वही स्वयं का मित्र है, क्योंकि वह अपने इष्ट और कल्याण हेतु प्रयत्नशील है।
दूसरी तरफ यदि वह ऐसा नहीं करता, तो वह अपना स्वयं शत्रु है, क्योंकि वह अपने को अधोगति के गड्ढे में ढकेल रहा है-
उदधरेद् आत्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैवात्मनो बन्धु:
आत्मैव रिपु: आतत्मन:।। 6/5 ।।
इसी बात की पुष्टि सातवें मन्त्र में करते हैं-
बन्धु: आत्मा आत्मन:तस्य
येनात्मैवात्मना जित:।
अनात्मन: तु शत्रुत्वे
वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।6/6।।
जिस जीवात्मा द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह अपने आप ही मित्र है।किन्तु जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए तो वह आप ही शत्रु की भाँति आचरण करता है।
इस प्रकार गीता का उक्त उपदेश मनुष्य मात्र के लिये है, जो मानवजीवन का चरम लक्ष्य(मोक्ष) को अपनाना चाहते हैं।
“बुद्ध” ने इसी मर्म को हृदयंगम करते हुए ” अप्पदीपो भव ” “अत्ता हि अत्तनो नाथ:”
तथा ” अत्ता हि अत्तनो गति: ” की बात कही थी।भगवान् मुक्तिमार्ग में सहायक हों।

।। हरिश्शरणम् ।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/10/18/सन्यास-तथा-योग-द्वारा-मोक/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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