अहंकार निवृत्ति द्वारा मोक्षसिद्धि

आदि शङ्कर ने अपने ” विवेकचूडामणि” में अहंकार को मुक्तिमार्ग का सबसे प्रबल प्रतिबन्धक बताया है।कलिकाल के साक्षात् शङ्करावतार आचार्य ,अहं पदार्थ को बारम्बार शरीर धारण का मूल कारण मानते हैं –

सन्त्यन्ये प्रतिबन्धा:
पुंस: संसारहेतवो दृष्टा:।
तेषामेकं मूलं प्रथम-
विकारो भवत्यहङ्कार:।।229।।

यह अहंकार क्या है ,यह भी विचारणीय है। प्रथमतया शरीर-संसार में आत्मबुद्धि या परिवर्तन शील शरीर संसार को अपना मानने लगना ही अहंकार है।
भगवद्गीता में आचार्य शङ्कर ने अहंकार का व्याख्यान किया है।तृतीयाध्याय के सत्ताइसवें मन्त्र में वर्णन है-

प्रकृतेः क्रियमाणानि
गुणैः कर्माणि सर्वश:।
अहङ्कारविमूढात्मा
कर्ता अहमिति मन्यते।।

सम्पूर्ण कर्म वस्तुतः प्रकृति के गुणों के द्वारा ही किए जाते हैं, किन्तु अहंकार से मोहित अन्त:करणवाला (मनुष्य)” मैं करने वाला हूँ ” ऐसा मानता है।
यही मैंपना इस जीव की बहुत बड़ी समस्या है। जो निरन्तर अभ्यास अनेक शरीरों में आत्मबुद्धि के कारण बनता गया है, उसका निराकरण गुरु-भगवान् के बिना सम्भव भी नहीं होता।
शाङ्कर भाष्य में अहंकार की परिभाषा है –
” कार्य-करण-सङ्घातात्म-प्रत्यय: अह-ङ्कार: ”

पंच महाभूत पृथ्वी इत्यादि और इनके विषय का नाम कार्य है। इसीप्रकार पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, पंच कर्मेन्द्रियाँ और मन बुद्धि तथा अहं को करण कहा गया है।
सृष्टि की प्रक्रिया के वर्णन क्रम में परमात्मा से आकाश-शब्दगुणात्मा की उत्पत्ति होती है, श्रोत्रेन्द्रिय ग्राह्य है।
आकाश से/में वायु जन्मता है, जो स्पर्श गुणात्मा और त्वचा से ग्राह्य है।इस वायु में अपने पूर्वज का शब्द गुण भी रहता है।
वायु से अग्नि का उद्भव है, जिसका मूल गुण रूप है, किन्तु इसमें भी अपने पूर्वज का स्पर्श-शब्द भी विद्यमान है।
अग्नि से जल की उत्पत्ति है, जिसका मौलिक गुण रस है।पूर्व की भाँति इसमें रूप-स्पर्श-शब्द भी रहता है।
जल से पृथ्वी का उद्भव है,जिसका अपना गुण गन्ध है।किन्तु इसमें भी अपने पूर्वजों का रस-रूप-स्पर्श-शब्द आदि भी रहता है।
इस प्रकार सम्पूर्ण चराचर जगत् की सृजनात्मक प्रक्रिया श्रुति-सम्मत कही गई। इस जड़चेतनगुण -दोष-मय संसार की संरचना में प्रकृति के त्रिविध गुणों का संचरण है।
मनुष्य जीव अपने पूर्व-पूर्व शरीरों में मन बुद्ध्यादि से अपने को आत्मारोपित करके जनन-मरण के चक्रव्यूह में पड़ा रहता है।
यही जीवात्मा का देहाध्यास या देहाभिमान कहा गया है।इस देह की कारा से मुक्त होकर अपनी आत्मा में ही आत्मदर्शन करना होगा
अहंकार आदि विकारी वस्तुओं के समस्त विकारों जाननेवाला नित्य और अविकारी ही होना चाहिये।मनोरथ, स्वप्न और सुषुप्ति काल में इन स्थूल-सूक्ष्म दोनों शरीरों का अभाव बार-बार स्पष्ट देखा जाता है। अतः अहं पदार्थ शरीर संसारादि आत्मा नहीं हो सकते।
आचार्य शङ्कर ने इसीलिए कहा-

अतोभिमानं त्यज मांसपिण्डे
पिण्डाभिमानिन्यपि बुद्धिकल्पिते।
कालत्रयाबाध्यमखण्डबोधं
ज्ञात्वा स्वमात्मानमुपैहि शान्तिम्।

इसलिए इस मांस-पिण्ड और इसके बुद्धिकल्पित अभिमानी जीव में अहंबुद्धि छोड़ो और अपने आत्मा को तीनों कालों में अबाधित और अखण्ड ज्ञान स्वरुप जानकार शान्तिलाभ करो।

आगे उपसंहारात्मक वचन में ,वे कहते हैं कि इस लिबलिबे मांस-पिण्ड के आश्रित रहने वाले कुल ,गोत्र , नाम ,रूप और आश्रम वाले शरीर में अभिमान त्यागो।
तथा कर्तापन, भोक्तापन आदि लिंग देह के धर्मों को भी त्यागकर अखण्ड आनन्द स्वरूप हो जाओ-

त्यजाभिमानं कुलगोत्रनाम-
रुपाश्रमेष्वार्द्रशवाश्रितेषु ।
लिङ्गस्य धर्मानपि कर्तृतादीन्
त्यक्त्वा भवाखण्डसुखस्वरुप:।।298।।

इस प्रकार आत्मा को देह से पृथक् देखने का अभ्यास करते-करते ,देहाभिमान छूटता है, और देहाभिमान त्याग से वैराग्य का उदय होता है, तथा वैराग्य परिपुष्ट होते-होते क्रमशः मोक्षसिद्धि होती है।
भगवान् मुक्ति में सहायक हों।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/10/18/अहंकार-निवृत्ति-द्वारा-म/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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