वेदान्तादि शास्त्रों में वासना के त्याग को मुक्ति संज्ञा दी गई है। वासना का शाब्दिक अर्थ मन के बस जाने से प्रतीत होता है।
मन का शरीर-संसार में बस जाना ही वासना है वस्तुतः। यह वासना अनादि है।
अनादि से तात्पर्य ,निरन्तर अनेकानेक जन्मों से इसकी प्रबल प्रवहमानता है।
आदि शङ्कर ने इसे तीन रूपों में बाँट दिया है- 1.लोकवासना ,2.देहवासना तथा3.शास्त्रवासना।
ये तीनों वासनाएँ एक दूसरे से परस्पर संयुक्त हैं। लोक(संसार) वासना सीधे देह और तदिन्द्रियों से जुड़ी है ।यह देह ,मन के संयोग से लोक और लोकाधिष्ठित वस्तु,व्यक्ति-स्थान में बसा, रमा रहता है।
इस देहेन्द्रिय जन्य लोक में बसने में एक तत्व अत्यन्त सहायक सिद्ध होता है, जो शास्त्र है। इस शास्त्र के विहित, नियमों परिनियमों के द्वारा देह इन्द्रिय से लेकर समस्त दृशादृश्य (लोक) जगत् के अनात्म वस्तुओं में अहंता-ममता का बना रहना ही , परस्पर लोक-देह-शास्त्र की वासना है।विवेकचूडामणि में शङ्कराचार्य –
लोकानुवर्तनं त्यक्त्वा त्यक्त्वा देहानुवर्तनम्
शास्त्रानुवर्तनं त्यक्त्वा स्वाध्यासापनयं कुरु।।271।।
इन्हीं देहादिवासनाओं रहना देहाध्यास है।
इस देहाध्यास को अत्यन्त प्रयत्न पूर्वक दूर करना चाहिए, भक्तिमार्ग में इसके लिए भगवन्नाम-लीला-रुप-गुण-चिन्तन परम पाथेय है। जबकि उसी से जुड़े ज्ञान-मार्ग में देहाध्यास दूर करने के लिये चित्त-वृत्तियों को रोककर निरन्तर आत्मस्वरूप में लगाने का निर्देश है।इससे योगी का मन नष्ट हो जाता है।जिससे वासनाक्षय तथा अध्यास का निरास होता है-
स्वात्मन्येव सदा स्थित्या मनो नश्यति योगिनः।
वासनानां क्षयश्चात: स्वाध्यासापनयं कुरु।।278।।
इन्द्रियों से होने वाले कर्मयोग, मन से होनेवाले भक्तियोग तथा बुद्धि से होने वाले ज्ञान योग द्वारा क्रमशः इन्द्रिय-मन और बुद्धि के अन्तर्मुखी होते जाने पर वाह्य वासनाओं की क्षीणता और वहि:प्रज्ञतानिरास की सिद्धि होती है,जिससे आत्मा की प्रतिबन्धशून्यता अनुभूत होती है-
यथा यथा प्रत्यगवस्थितं मन:
तथा तथा मुञ्चति वाह्यवासना:।
नि:शेषमोक्षे सति वासनानाम्
आत्मानुभूति: प्रतिबन्धशून्या।।277।।
इसके पहले आचार्य ने बता दिया है कि इन्ही लोक-शास्त्र-देह वासनाओं से जीव को ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता-
लोकवासनया जन्तो:शास्त्रवासनयापि च।
देहवासनया ज्ञानं यथावन्नैव जायते।।272।।
कलिपावनावनावतार तुलसी ने जिन –
सुत वित लोक ईषणा तीनी।
केहि कर मति इन्ह कृत न मलीनी।।
कह कर जिन लोक -वित्त और सन्तानादि एषणाओं द्वारा मतिमलिनता की बात कही है, उनका संगमन आचार्य शङ्कर के उक्त प्रस्थान से किया जा सकता है।
शङ्कर की देहवासना ,तुलसी की सुतेषणा से,शास्त्रवासना वित्तेषणा से संगमित की जा सकती है और लोक तो लोक है ही।
इस प्रकार आत्म -वस्तु का ज्ञान हो जाने पर भी जो ‘मैं कर्ता और भोक्ता हूँ ‘ इस रूप से दृढ होकर जनन-मरणरूप संसार का कारण होती है, उस वेगवती अनादि वासना को प्रत्यक् (आन्तरिक)दृष्टि से आत्मस्वरूप में स्थित होकर सप्रयास त्यागना चाहिए।क्योंकि इस संसार में वासना की तनुता(क्षीणता)ही मुनियों द्वारा मुक्ति कही गई है-
ज्ञाते वस्तुन्यपि बलवती वासनानादिरेषा।
कर्ताभोक्ताप्यहमिति दृढा यास्य संसारहेतु:
प्रत्यग्दृष्ट्यात्मनि निवसता सापनेया प्रयत्नान्
मुक्ति:प्राहु:तदिह मुनयो वासनातानवं तत्।।268।।
अनात्मा में देहेन्द्रिय जन्य विषयादि वासनाओं से मन को हटाकर भगवान् परमात्मा स्वयं में मन को अधिष्ठित करायें ,यही चिराचिर प्रार्थना है।
।।हरिश्शरणम्।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/10/12/वासना-का-त्याग-ही-मुक्ति-ह/