स्त्री-सम्मान से मोक्षसिद्धि

शारद नवरात्र संवत् 2074 की अष्टमी से लेकर चतुर्दशी पर्यन्त सप्ताह व्यापी मार्कण्डेयपुराण की कथा ने पूर्णता प्राप्त की। कथा के वाचक(व्यास) थे ,वृन्दावन धाम के मलूकपीठाधिपति आचार्य राजेन्द्र दास जी महाराज।व्यास-समास क्रम से चलने वाली कथा का महत्वपूर्ण बिन्दु था ,मनुष्य के कामक्रोधादि षड् रिपुओं का मर्दन किया जाना, और जिसका मूल है भगवती की एकमात्र प्रसन्नता।
भगवती की प्रसन्नता किसे प्राप्त होती है, इस बात के भी मूल में उतरने पर ,यह तत्व उभर कर आया , नारी-मात्र का सम्मान।वह इसलिये कि समस्त नारियाँ जगदम्बा की ही स्वरूप हैं –
विद्या समस्ता:तव देवि भेदा:
स्त्रिय:समस्ता: सकला जगत्सु।
दुर्गा. स.11/06

त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतु: ।
दुर्गा. स 11/05

कहा भी गया है और कहने वाले स्मृतिकार मनु महाराज-
यत्र नार्य: तु पूज्यन्ते
रमन्ते तत्र देवता:
यत्र एता: तु न पूज्यन्ते
तत्र सर्वा: क्रिया : अफला:।।

अर्थ स्पष्ट ही है, जहाँ नारी सम्मानित होगी, वहीं देवता रमण करेंगे और इसलिये कि,वह नारी तो स्वयं देवी है। जहाँ ऐसा नहीं होगा, वहाँ किसी क्रिया का सुफल प्राप्त नहीं होगा।
अतः सभी से आग्रह है कि एकमात्र उक्त नारी-सम्मान को जीवन में आचरण में ढालें ,मुक्ति सुनिश्चित है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/10/05/स्त्री-सम्मान-से-मोक्षसि/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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