नाम-नामी में अभेद

सृष्टि के समस्त का एक नाम अवश्य ही है।क्योंकि नाम ही व्यवहार का समग्र आधार है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जहाँ-जहाँ व्यवहार-आचरण करना होता है, वहाँ-वहाँ नाम अनिवार्यतया आना चाहिए, जिसके विना ,विचारों की अभिव्यक्ति सम्भव नहीं।
नाम में चाहे राम हो या कृष्ण, चाहे सीता हो या राधा ,अयोध्या या मथुरा ,मधुर हो या लवण कोई भी हो सकता है, लेकिन बात केवल एक है कि,इनके बिना कौन क्या कर सकता है?
नाम शब्द, संस्कृत में अत्यधिक झुकने का अर्थ देता है, और यह झुकना हमेशा ही ,कुछ नहीं लेता सिवाय इसके कि कुछ अवश्य ही देता है। ” प्र ” उपसर्ग जोड़कर इसी नाम से प्रणाम हो जाता है, और यह प्रणाम असाधारण परिणाम दे जाता है
एक दूसरा विचार ये भी कि, नाम का अर्थ ” संज्ञा ” भी है। यह संज्ञा भी अद्वितीय और विचित्र है, क्योंकि अलग -अलग करके कहें, तो ” सम् ” माने सम्यक् ” ज्ञा ” माने ज्ञान ।इस प्रकार(संज्ञा) नाम के बिना(संज्ञान) ज्ञान होना सम्भव नहीं दीखता ।
” वाक्यपदीय” जैसे व्याकरण के दार्शनिक ग्रन्थ में ” भर्तृहरि ” ने इस असमंजस पर प्रकाश डाला है, कि कोई भी व्यक्ति शब्दों-नामों का कथन करके ही
अपने और दूसरों के आत्मिक विचारों का उद्घाटन और आदानप्रदान कर सकता है-
वे कहते हैं कि यह सारा संसार, अन्धकार के साम्राज्य में होता, यदि शब्दों के दीपक अपना प्रकाश न फैलाते-
इदमन्धन्तम: कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयम्।
यदि शब्दाह्वयं ज्योतिरासंसारं न दीप्यते।।
यह तो हुई महायोगी ब्रह्मवेत्ता भर्तृहरि की बात।अब आगे सम्पूर्ण पर दृष्टि डालें तो तो इन शब्दों और नामों में ही सारे वेदादि ग्रन्थ विरचित हैं।जिनका प्रतिपाद्य और लक्ष्य लोक और अलोक दोनों है।
इन वेदादिक शास्त्रों द्वारा हमें हमारे चरम की प्राप्ति होती दीखती है। इन सभी में लोकालोक कामनाओं की सिद्धि के मन्त्र , शब्दों-नामों के रूप में ही विद्यमान हैं।
दूसरे विचार की ओर चलें तो लगता है कि, जब हम कोई नाम पुकारते हैं, तब उस नाम के साथ उसका स्व स्वरूप प्रकट हो जाता है।क्योंकि वह नाम अपने गुण, लक्षण को लेकर उपस्थित होता है। इसका कारण है किसी भी नाम का अपने स्वरूप से अपृथक् होना।
वस्तुतः इसीलिए भैया, इस युग में नाम जप की महत्ता समझाई गई है।जब हम जिस किसी भगवत् ,भागवत् नाम का चिन्तन मनन करते हैं, तब वह नाम ही अभिन्न रूप से अपने गुणों ,कर्मों और समूल-प्रकृति के साथ अविकल रूप से उपस्थित होकर नाम-चिन्तक को सहयोग देता है।
अरे, लौकिक उदाहरण ही लें, तो स्मरण करें कि हमको जो कार्य पूर्ण करना होता है, हम तद्रूप तद्गुण नाम-वस्तु आदि का चिन्तन अन्वेषण करके अपना कार्य सिद्ध करते हैं।
तब , भगवत्-भागवत् स्वरूपों और नामों की बात ही और है।और एक बात और है कि, इस युग में जब प्रामाणिक वस्तु-व्यक्ति ,साधनादि पाना असंभव सा हो गया है, तब नाम-जप ही आत्मोद्धार का एकमात्र सबसे सबल परमोपाय है।
नाम-नामी और गुण-गुणी में तत्वतः अभेद तथा आधाराधेय सम्बन्ध सिद्धान्ततः और व्यवहारत: दोनों रूपों में समवायत्वेन है ।अतः-
कलियुग केवल नाम अधारा ।
महिमा जासु जानि गनराऊ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या
तपोयज्ञक्रियादिषु ।
न्यूनं सम्पूर्णतामेति
सद्यो वन्दे तमच्युतम्।।
जिस श्रीमन्नारायण के नामोच्चारण, स्मरणादि से सारे कामों की सिद्धि होती है, ऐसे ,अपने गुण-कर्म-स्वभाव से कभी भी च्युत नहीं होने वाले भगवान् को उनकी लीला उनके नाम-गुण-धाम को प्रणाम(प्र-नाम) है।
गीतोक्त गुर-वाणी – तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च , से वाणी विराम लेती है।

।।हरिश्शरणम्।।

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जीवन का श्रेष्ठतम कार्य है सेवा

मानव शरीर संसार के सभी प्राणियों में श्रेष्ठतम है। यह शरीर पाकर स्वयं में यह अनुभव न हो कि जीवन का महत्तर कार्य तो सेवा कार्य है, तो भला इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा।
यह बात साधारण सी है कि, मनुष्य को ही,यह अनुभव में आ भी सकता है कि, सेवा सर्वोत्तम कार्य है।
अब सेवा को विभाजित करें तो, यह दो प्रकार की हो सकती है, एक स्वयं की सेवा और दूसरी संसार के अन्य प्राणियों की।
यह सम्पूर्णसेवा का कार्य काम्यादि कर्मों के रूप में मानवीय जीवन का अभिन्न करणीय ,सिद्ध होता है।
काम्य या कामना परक कार्य वे हैं, जो किसी फल के उद्देश्य से सम्पादित किए जाते हैं।इसी के साथ निषिद्ध कार्य भी जुड़े हैं, जिन्हें मानव शरीर के लिये अनाचरणीय कहा गया है।
इसके अतिरिक्त नित्य कर्म हैं, जो कि अवश्य करणीय हैं।इसमें अपने शरीर के स्नानादि से लेकर नित्य सम्पाद्य ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ और अतिथि चर्यादि मनुष्य यज्ञ भी अवश्य ही करणीय हैं। यह विवेक केवल सेवा भावना भावित व्यक्ति के जीवन में ही सम्भव है।
इसके अलावा किसी निमित्त को पाकर, जो अवश्य करणीयकार्य ,वेद विहित हैं,नैमित्तिक कर्म कहे जाते हैं।इन्हें भी सेवा के अंगभूत रूप में किया जाना चाहिए।
ज्ञानोपासना का कार्य भी मनुष्य द्वारा किया जा सकता है, जोकि उसके उसके मानसव्यापार से सम्बन्धित है।श्रुति ने इसे इस प्रकार अभिव्यक्ति दी है-
” जो सर्वकर्मा ,सर्वकाम,सर्वगन्ध,इस सब को सब ओर से व्याप्त करनेवाला, वाग्रहित और सम्भ्रम शून्य है, वह मेरा आत्मा हृदय कमल के मध्य में स्थित है।यही ब्रह्म है।इस शरीर से मरकर मैं इसी को प्राप्त होउँगा इस विषय में कोई भी सन्देह नहीं है, वही ब्रह्म भाव प्राप्त करनेवाला सच्चा सेवक है । ”
इस प्रकार स्वयं के सहित चराचर जगत् की सेवा का अमूल्य कार्य केवल और केवल विद्या विनय सम्पन्न मानव जीवन के सत्संगलाभ का विषय हो सकता है।
यह बातें लिखने का उपक्रम इसलिये हुआ कि ,एक आत्मीय ने एक दिन कह दिया कि, कुछ लोग सेवक के रूप में जन्मते हैं और कुछ लोग स्वामी के रूप में। मैंने कहा, भैया यह बात उस-उस व्यक्ति के पूर्व जीवन के ही सेवा कर्मों का प्रतिफल हो सकता है, जिसे प्रारब्ध अथवा भाग्य कहा जाता है।
किन्तु सूक्ष्म विचार करने पर यह बात विचार में आती है कि मनुष्य मात्र को ही ,यह अनुभव में आयेगा कि वह अपने को पर-सेवा-कार्य में किस-किस रूप में सन्निविष्ट करके जीवन की सफलता के धर्म का मर्म समझ सकता है।
अपने को सेवक रूप में माननेवाले और ,अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम के समक्ष अपनी अकिंचनता को स्थापित करने वाले महात्मा भरत का जीवन आदर्श श्रेष्ठ सेवक का जीवन धर्म है।
वे कहते हैं –
राम पयादेहिं पाँय सिधाए।
हम कहँ रथ गज बाजि बनाए।।
सिर भरि जाउँ उचित अस मोरा।
सबसे सेवक धरम कठोरा ।।
हमारे प्रभु पैदल चल कर गए हैं ,तो हम तो सिर के बल चलें, तभी ठीक होगा।क्योंकि सेवा का कार्य, बड़ा ही कठिन कार्य है।
महाराज भर्तृहरि भी सेवा कर्म को योगियों से भी श्रेष्ठ बतलाते हैं-
सेवा-धर्म: परमगहन:
योगिनामपि अगम्य: ।।
इसलिये भैया ,यह सेवा-सेवक-सेव्य का उच्चतम विचार करनेऔर करानेवाले अपने पूर्वाचार्यों और आत्मीय जनों का का मैं ऋणी हूँ ,जिन्होंने इस सनातन ऋषि-विचारगंगाधारा के पवित्र जल में मुझे स्नान करा दिया है।

।।हरिश्शरणम्।।

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सबसे महत्वपूर्ण मन है

मनुष्य का मन बहुत महत्वपूर्ण है।मन को श्रोत्रेन्द्रिय आदि पञ्च ज्ञानेन्द्रियों सेअत्यंत अतिरिक्त बताया गया है।किन्तु यह मन सभी से अलग रहकर भी जिस-जिस इन्द्रिय के साथ संयोग करता है उसी-उसी को ग्रहण करता है। बिना मन के कोई भी इन्द्रिय किसी अन्य ज्ञानेन्द्रिय-संयोग को पाकर भी उनके विषयों को ग्रहण नहीं कर सकता है।
भगवान् ने गीताशास्त्र में जीवात्मा द्वारा ज्ञानेन्द्रियों श्रोत्र, चक्षु,त्वचा, रसना और नासिका के साथ ” मन ” को आश्रय बना कर क्रमशः शब्द, रूप, स्पर्श, रस,गन्धादि विषयों के सेवन की बात कही है-

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातन:।
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मन: चायं विषयानुपसेवते।।
15/7-9 ।
यह मन ,साधक की आत्म अनात्म सम्बन्धी विवेक ज्ञान को हर लेता है।तभी तो इसकी मनोनुकूल वस्तुएँ ” मनोहर ” कही जाती हैं।
वैशेषिक दर्शन 3/2/1 में मन का लक्षण किया गया है।ऋषि कहते हैं कि, आत्मा,इन्द्रिय और विषयों का मन से सम्पर्क होने पर ही विषयादि का ज्ञान होता हुआ दीखता है-

आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानस्य
भाव: अभावश्च मनस: लिङ्गम्।।

मूलतः विचार करें, तो यह तात्विक बात है कि, ज्ञान का होना और न होना ही मन का लक्षण है।
यह मन जो विषयों का ज्ञान कराता है, जब-जब इन्द्रियों में स्वच्छंद विचरता है, तब-तब बुद्धि को विचलित, अस्थिर करता है, और बुद्धि को मानो हर लेता है ,जैसे कि जलधारा में वायु ,नौका को गन्तव्य से भटका देती है-

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।।
गीता….-2/67 ।
मैत्रायणी उपनिषद् में इसीलिये मन को बन्धन और मुक्ति का कारण बताया गया है।जब उच्छृंखल होकर जब यह विषयों में
भटकाता है, तब अपने ” विकल्पात्मक ” स्वरूप के कारण यही संसार का कारण है।इसके विपरीत अपने ” संकल्पात्मक ” स्वस्वरूप में स्थित होकर जब यह,आत्मस्थ परमात्मस्थ होता है, तब स्वस्वरूप का ज्ञान करा कर नित्य ,शुद्ध बुद्ध आनन्द घन भगवत्प्राप्ति का कारण बन जाता है-

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं मतम्
– मैत्रायणी उपनिषद् 4/11
मन को निश्चल करने के लिये भगवान् ने गीताशास्त्र में अभ्यास और वैराग्य को साधन बताया-
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते
– गीता 6/35

यह मन कैसे संसारोपरति -वैराग्य ग्रहण करे,इसके लिये उन्होंने कहा कि, धीरे-धीरे अर्थात् सहसा नहीं, किन्तु धैर्य युक्त बुद्धि द्वारा यह सम्भव है।यह कार्य मन को आत्मा में संस्थित करके संभव है-

शनैः-शनैः उपरमेद् बुद्ध्या धृतिपरिगृहीतया
आत्मसंस्थं मन: कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्।। 6/25 ।

उपर्युक्त मन्त्र में एक विधि ,मनोनिग्रह का समझाने के बाद महागुरु एवं ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च शिक्षक आगे दशमाध्याय में स्वयं को इन्द्रियों में ” मन ” बता देते हैं-

इन्द्रियाणां मन चास्मि ।- 10/22

और नवमाध्याय में -मन्मना भव मद्भक्तो,
मद्याजी मां नमः कुरू(34) तथा अठारहवें अध्याय में पुनः –
मन्मना भव मद्याजी मद्भक्तो मां नमस्कुरु
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्यतिजाने प्रियोसि मे
-18/65
वही बात कह कर सरलता से समझा दिया है, कि वे भगवान् जब स्वयं मन ही हैं, तो अपने को अर्थात् स्वात्मा को, स्वयं को उन्हीं में लगा कर मन को निश्चलता और आत्यन्तिक शान्ति मिल पायेगी।
” मयि एव मन आधत्स्व ,मयि बुद्धिं निवेशय ” कहते हुए बारम्बार इस बात को दृढ कर देते हैं ,मन के प्रति सतत सावधानी बरतनी है।और अस्थिर मन को
एकमात्र मुझको ही सौंप कर स्थिर किया जा सकता है।
यजुर्वेद में ऋषिभी यही देखते हैं-
“तन् मे मन: शिवसङ्कल्पमस्तु ”

भगवान् , जो स्वयं मन: स्वरूप हैं, साधक, भक्तों पर कृपा करें ,तभी ,सद्गुरु-शरण सन्निधि द्वारा यह सम्भव है।
एक बड़ी बात उन्होने पूर्वोक्त मन्त्र की अन्तिम अर्धाली में कह दी है, कि मैं इस बार प्रतिज्ञा करता हूँ , इस बात को सत्य जान लो कि , निश्चित रूप से मत्परायण होने पर तुम्हें मेरी प्राप्ति होगी,क्योंकि तुम
मेरे प्रिय हो।
इस प्रकार इस अस्थिर मन की स्थिरता सद्गुरु-भगवत्परायता में ही सुनिश्चित है, जिससे सारे प्रतिबन्ध शून्य हो पायेंगे,और
यह महत्वपूर्ण मन केवल और केवल सङ्कल्पात्मक होकर शिव बन जायेगा।
भगवान् सहायक हों।

।। हरिश्शरणम् ।।

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सन्यास तथा योग द्वारा मोक्षसिद्धि

श्रीमद्भगवद्गीता का आरम्भ से लेकर छ: अध्याय पर्यन्त का अद्वितीय-गुरुशिष्योपदेश कर्मयोग नाम से प्रख्यात है।इसके उपसंहारात्मक षष्ठाध्याय को
आत्मसंयम योग एवं ध्यानयोग नाम दिया गया है।ध्यानयोग में शरीर, इन्द्रिय, मन तथा बुद्धि का संयम परमावश्यक है।
शरीरेन्द्रियमनबुद्धि – इन्हें आत्मा नाम से संयुक्त रूप से अभिहित किया गया है।इस अध्याय में इन्हीं के संयम का वर्णन होने से यह ” आत्मसंयमयोग ” भी है।
पहले मन्त्र में ही सन्यासी का निर्वचन करते हुए कहा गया है कि, जो मनुष्य कर्मफल का आश्रय न लेकर करनेयोग्य
(कार्य)शास्त्र विहित कर्म ही करता है, वह सन्यासी है और वही योगी भी। जो अग्नि होत्रादि अनुष्ठानों को त्यागने वाला(निरग्नि)तथा मात्र क्रियाओं का त्याग करनेवाला(अक्रिय)है ,वह सन्यासी-योगी नहीं –
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य:।
स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय:।। 6/1 ।।
तात्पर्य यह कि फलेच्छा के बिना कर्तव्य कर्म करनेवाला सन्यासी और योगी दोनों है।इसी भाव का प्रकटीकरण अग्रिम पंक्ति में है, जहाँ सन्यास और योग का एकत्व सिद्ध है-
यं सन्यासमिति प्राहु: योगं तं विद्धि पाण्डव
नह्यसन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन।।6/2।।
आगे चलकर भगवान् इसी भाव को प्राप्त महात्मा को सर्वसंकल्पसन्यासी “योगारूढ” कहते हैं,क्योंकि वह न तो इन्द्रिय विषयों में और न ही कर्मों में आसक्त है-
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्यते।
सर्वसंकल्पसन्यासी योगारूढस्तदोच्यते।।
इस प्रकार सन्यासी और योगी का ऐक्य बताने के बाद स्वयं अपने ही द्वारा अपने उद्धार या जीवन्मुक्ति का उद्धोष होता है-
जीवात्मा का स्वात्मा ही उसका मित्र और शत्रु दोनों है।अतः अपने आप ही अपना उद्धार करे,अधोगति में न डाले।
“अपने द्वारा अपना उद्धार” के उपदेश में जीवात्मा को आश्वस्त किया गया है कि उत्थान-पतन स्वयं जीव के हाथ में है।
जो आत्मोद्धार के लिए चेष्टारत है,वही स्वयं का मित्र है, क्योंकि वह अपने इष्ट और कल्याण हेतु प्रयत्नशील है।
दूसरी तरफ यदि वह ऐसा नहीं करता, तो वह अपना स्वयं शत्रु है, क्योंकि वह अपने को अधोगति के गड्ढे में ढकेल रहा है-
उदधरेद् आत्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैवात्मनो बन्धु:
आत्मैव रिपु: आतत्मन:।। 6/5 ।।
इसी बात की पुष्टि सातवें मन्त्र में करते हैं-
बन्धु: आत्मा आत्मन:तस्य
येनात्मैवात्मना जित:।
अनात्मन: तु शत्रुत्वे
वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।6/6।।
जिस जीवात्मा द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह अपने आप ही मित्र है।किन्तु जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए तो वह आप ही शत्रु की भाँति आचरण करता है।
इस प्रकार गीता का उक्त उपदेश मनुष्य मात्र के लिये है, जो मानवजीवन का चरम लक्ष्य(मोक्ष) को अपनाना चाहते हैं।
“बुद्ध” ने इसी मर्म को हृदयंगम करते हुए ” अप्पदीपो भव ” “अत्ता हि अत्तनो नाथ:”
तथा ” अत्ता हि अत्तनो गति: ” की बात कही थी।भगवान् मुक्तिमार्ग में सहायक हों।

।। हरिश्शरणम् ।।

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अहंकार निवृत्ति द्वारा मोक्षसिद्धि

आदि शङ्कर ने अपने ” विवेकचूडामणि” में अहंकार को मुक्तिमार्ग का सबसे प्रबल प्रतिबन्धक बताया है।कलिकाल के साक्षात् शङ्करावतार आचार्य ,अहं पदार्थ को बारम्बार शरीर धारण का मूल कारण मानते हैं –

सन्त्यन्ये प्रतिबन्धा:
पुंस: संसारहेतवो दृष्टा:।
तेषामेकं मूलं प्रथम-
विकारो भवत्यहङ्कार:।।229।।

यह अहंकार क्या है ,यह भी विचारणीय है। प्रथमतया शरीर-संसार में आत्मबुद्धि या परिवर्तन शील शरीर संसार को अपना मानने लगना ही अहंकार है।
भगवद्गीता में आचार्य शङ्कर ने अहंकार का व्याख्यान किया है।तृतीयाध्याय के सत्ताइसवें मन्त्र में वर्णन है-

प्रकृतेः क्रियमाणानि
गुणैः कर्माणि सर्वश:।
अहङ्कारविमूढात्मा
कर्ता अहमिति मन्यते।।

सम्पूर्ण कर्म वस्तुतः प्रकृति के गुणों के द्वारा ही किए जाते हैं, किन्तु अहंकार से मोहित अन्त:करणवाला (मनुष्य)” मैं करने वाला हूँ ” ऐसा मानता है।
यही मैंपना इस जीव की बहुत बड़ी समस्या है। जो निरन्तर अभ्यास अनेक शरीरों में आत्मबुद्धि के कारण बनता गया है, उसका निराकरण गुरु-भगवान् के बिना सम्भव भी नहीं होता।
शाङ्कर भाष्य में अहंकार की परिभाषा है –
” कार्य-करण-सङ्घातात्म-प्रत्यय: अह-ङ्कार: ”

पंच महाभूत पृथ्वी इत्यादि और इनके विषय का नाम कार्य है। इसीप्रकार पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, पंच कर्मेन्द्रियाँ और मन बुद्धि तथा अहं को करण कहा गया है।
सृष्टि की प्रक्रिया के वर्णन क्रम में परमात्मा से आकाश-शब्दगुणात्मा की उत्पत्ति होती है, श्रोत्रेन्द्रिय ग्राह्य है।
आकाश से/में वायु जन्मता है, जो स्पर्श गुणात्मा और त्वचा से ग्राह्य है।इस वायु में अपने पूर्वज का शब्द गुण भी रहता है।
वायु से अग्नि का उद्भव है, जिसका मूल गुण रूप है, किन्तु इसमें भी अपने पूर्वज का स्पर्श-शब्द भी विद्यमान है।
अग्नि से जल की उत्पत्ति है, जिसका मौलिक गुण रस है।पूर्व की भाँति इसमें रूप-स्पर्श-शब्द भी रहता है।
जल से पृथ्वी का उद्भव है,जिसका अपना गुण गन्ध है।किन्तु इसमें भी अपने पूर्वजों का रस-रूप-स्पर्श-शब्द आदि भी रहता है।
इस प्रकार सम्पूर्ण चराचर जगत् की सृजनात्मक प्रक्रिया श्रुति-सम्मत कही गई। इस जड़चेतनगुण -दोष-मय संसार की संरचना में प्रकृति के त्रिविध गुणों का संचरण है।
मनुष्य जीव अपने पूर्व-पूर्व शरीरों में मन बुद्ध्यादि से अपने को आत्मारोपित करके जनन-मरण के चक्रव्यूह में पड़ा रहता है।
यही जीवात्मा का देहाध्यास या देहाभिमान कहा गया है।इस देह की कारा से मुक्त होकर अपनी आत्मा में ही आत्मदर्शन करना होगा
अहंकार आदि विकारी वस्तुओं के समस्त विकारों जाननेवाला नित्य और अविकारी ही होना चाहिये।मनोरथ, स्वप्न और सुषुप्ति काल में इन स्थूल-सूक्ष्म दोनों शरीरों का अभाव बार-बार स्पष्ट देखा जाता है। अतः अहं पदार्थ शरीर संसारादि आत्मा नहीं हो सकते।
आचार्य शङ्कर ने इसीलिए कहा-

अतोभिमानं त्यज मांसपिण्डे
पिण्डाभिमानिन्यपि बुद्धिकल्पिते।
कालत्रयाबाध्यमखण्डबोधं
ज्ञात्वा स्वमात्मानमुपैहि शान्तिम्।

इसलिए इस मांस-पिण्ड और इसके बुद्धिकल्पित अभिमानी जीव में अहंबुद्धि छोड़ो और अपने आत्मा को तीनों कालों में अबाधित और अखण्ड ज्ञान स्वरुप जानकार शान्तिलाभ करो।

आगे उपसंहारात्मक वचन में ,वे कहते हैं कि इस लिबलिबे मांस-पिण्ड के आश्रित रहने वाले कुल ,गोत्र , नाम ,रूप और आश्रम वाले शरीर में अभिमान त्यागो।
तथा कर्तापन, भोक्तापन आदि लिंग देह के धर्मों को भी त्यागकर अखण्ड आनन्द स्वरूप हो जाओ-

त्यजाभिमानं कुलगोत्रनाम-
रुपाश्रमेष्वार्द्रशवाश्रितेषु ।
लिङ्गस्य धर्मानपि कर्तृतादीन्
त्यक्त्वा भवाखण्डसुखस्वरुप:।।298।।

इस प्रकार आत्मा को देह से पृथक् देखने का अभ्यास करते-करते ,देहाभिमान छूटता है, और देहाभिमान त्याग से वैराग्य का उदय होता है, तथा वैराग्य परिपुष्ट होते-होते क्रमशः मोक्षसिद्धि होती है।
भगवान् मुक्ति में सहायक हों।

।।हरिश्शरणम्।।

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वासना का त्याग ही मुक्ति है

वेदान्तादि शास्त्रों में वासना के त्याग को मुक्ति संज्ञा दी गई है। वासना का शाब्दिक अर्थ मन के बस जाने से प्रतीत होता है।
मन का शरीर-संसार में बस जाना ही वासना है वस्तुतः। यह वासना अनादि है।
अनादि से तात्पर्य ,निरन्तर अनेकानेक जन्मों से इसकी प्रबल प्रवहमानता है।
आदि शङ्कर ने इसे तीन रूपों में बाँट दिया है- 1.लोकवासना ,2.देहवासना तथा3.शास्त्रवासना।
ये तीनों वासनाएँ एक दूसरे से परस्पर संयुक्त हैं। लोक(संसार) वासना सीधे देह और तदिन्द्रियों से जुड़ी है ।यह देह ,मन के संयोग से लोक और लोकाधिष्ठित वस्तु,व्यक्ति-स्थान में बसा, रमा रहता है।
इस देहेन्द्रिय जन्य लोक में बसने में एक तत्व अत्यन्त सहायक सिद्ध होता है, जो शास्त्र है। इस शास्त्र के विहित, नियमों परिनियमों के द्वारा देह इन्द्रिय से लेकर समस्त दृशादृश्य (लोक) जगत् के अनात्म वस्तुओं में अहंता-ममता का बना रहना ही , परस्पर लोक-देह-शास्त्र की वासना है।विवेकचूडामणि में शङ्कराचार्य –
लोकानुवर्तनं त्यक्त्वा त्यक्त्वा देहानुवर्तनम्
शास्त्रानुवर्तनं त्यक्त्वा स्वाध्यासापनयं कुरु।।271।।
इन्हीं देहादिवासनाओं रहना देहाध्यास है।
इस देहाध्यास को अत्यन्त प्रयत्न पूर्वक दूर करना चाहिए, भक्तिमार्ग में इसके लिए भगवन्नाम-लीला-रुप-गुण-चिन्तन परम पाथेय है। जबकि उसी से जुड़े ज्ञान-मार्ग में देहाध्यास दूर करने के लिये चित्त-वृत्तियों को रोककर निरन्तर आत्मस्वरूप में लगाने का निर्देश है।इससे योगी का मन नष्ट हो जाता है।जिससे वासनाक्षय तथा अध्यास का निरास होता है-
स्वात्मन्येव सदा स्थित्या मनो नश्यति योगिनः।
वासनानां क्षयश्चात: स्वाध्यासापनयं कुरु।।278।।
इन्द्रियों से होने वाले कर्मयोग, मन से होनेवाले भक्तियोग तथा बुद्धि से होने वाले ज्ञान योग द्वारा क्रमशः इन्द्रिय-मन और बुद्धि के अन्तर्मुखी होते जाने पर वाह्य वासनाओं की क्षीणता और वहि:प्रज्ञतानिरास की सिद्धि होती है,जिससे आत्मा की प्रतिबन्धशून्यता अनुभूत होती है-
यथा यथा प्रत्यगवस्थितं मन:
तथा तथा मुञ्चति वाह्यवासना:।
नि:शेषमोक्षे सति वासनानाम्
आत्मानुभूति: प्रतिबन्धशून्या।।277।।
इसके पहले आचार्य ने बता दिया है कि इन्ही लोक-शास्त्र-देह वासनाओं से जीव को ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता-
लोकवासनया जन्तो:शास्त्रवासनयापि च।
देहवासनया ज्ञानं यथावन्नैव जायते।।272।।
कलिपावनावनावतार तुलसी ने जिन –
सुत वित लोक ईषणा तीनी।
केहि कर मति इन्ह कृत न मलीनी।।
कह कर जिन लोक -वित्त और सन्तानादि एषणाओं द्वारा मतिमलिनता की बात कही है, उनका संगमन आचार्य शङ्कर के उक्त प्रस्थान से किया जा सकता है।
शङ्कर की देहवासना ,तुलसी की सुतेषणा से,शास्त्रवासना वित्तेषणा से संगमित की जा सकती है और लोक तो लोक है ही।
इस प्रकार आत्म -वस्तु का ज्ञान हो जाने पर भी जो ‘मैं कर्ता और भोक्ता हूँ ‘ इस रूप से दृढ होकर जनन-मरणरूप संसार का कारण होती है, उस वेगवती अनादि वासना को प्रत्यक् (आन्तरिक)दृष्टि से आत्मस्वरूप में स्थित होकर सप्रयास त्यागना चाहिए।क्योंकि इस संसार में वासना की तनुता(क्षीणता)ही मुनियों द्वारा मुक्ति कही गई है-
ज्ञाते वस्तुन्यपि बलवती वासनानादिरेषा।
कर्ताभोक्ताप्यहमिति दृढा यास्य संसारहेतु:
प्रत्यग्दृष्ट्यात्मनि निवसता सापनेया प्रयत्नान्
मुक्ति:प्राहु:तदिह मुनयो वासनातानवं तत्।।268।।
अनात्मा में देहेन्द्रिय जन्य विषयादि वासनाओं से मन को हटाकर भगवान् परमात्मा स्वयं में मन को अधिष्ठित करायें ,यही चिराचिर प्रार्थना है।

।।हरिश्शरणम्।।

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स्त्री-सम्मान से मोक्षसिद्धि

शारद नवरात्र संवत् 2074 की अष्टमी से लेकर चतुर्दशी पर्यन्त सप्ताह व्यापी मार्कण्डेयपुराण की कथा ने पूर्णता प्राप्त की। कथा के वाचक(व्यास) थे ,वृन्दावन धाम के मलूकपीठाधिपति आचार्य राजेन्द्र दास जी महाराज।व्यास-समास क्रम से चलने वाली कथा का महत्वपूर्ण बिन्दु था ,मनुष्य के कामक्रोधादि षड् रिपुओं का मर्दन किया जाना, और जिसका मूल है भगवती की एकमात्र प्रसन्नता।
भगवती की प्रसन्नता किसे प्राप्त होती है, इस बात के भी मूल में उतरने पर ,यह तत्व उभर कर आया , नारी-मात्र का सम्मान।वह इसलिये कि समस्त नारियाँ जगदम्बा की ही स्वरूप हैं –
विद्या समस्ता:तव देवि भेदा:
स्त्रिय:समस्ता: सकला जगत्सु।
दुर्गा. स.11/06

त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतु: ।
दुर्गा. स 11/05

कहा भी गया है और कहने वाले स्मृतिकार मनु महाराज-
यत्र नार्य: तु पूज्यन्ते
रमन्ते तत्र देवता:
यत्र एता: तु न पूज्यन्ते
तत्र सर्वा: क्रिया : अफला:।।

अर्थ स्पष्ट ही है, जहाँ नारी सम्मानित होगी, वहीं देवता रमण करेंगे और इसलिये कि,वह नारी तो स्वयं देवी है। जहाँ ऐसा नहीं होगा, वहाँ किसी क्रिया का सुफल प्राप्त नहीं होगा।
अतः सभी से आग्रह है कि एकमात्र उक्त नारी-सम्मान को जीवन में आचरण में ढालें ,मुक्ति सुनिश्चित है।

।।हरिश्शरणम्।।

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