आज शारदीय नवरात्र विक्रम सं 2074 पंचमी तिथि सोमवार का दिन, जब रामकथा के अमर गायक सन्त मुरारी बापू की रामकथा-प्रवाह का पाँचवाँ दिवस देदीप्यमान है।यह बड़े आनंद का विषय और शक्तिपीठ विन्ध्याचल धाम की अपार पारमाण्विक ऊर्जा का विद्युत् चुम्बकीय तत्व है, जिसने श्रीरामकथामन्दाकिनी को विन्ध्यक्षेत्र में विन्ध्यपर्वतमाला से आलिंगित होकर बहने के लिये बाध्य कर दिया।
आरम्भ में ही “व्यासपीठ” ने नवमी पर्यन्त कथा को ” मानस-श्री-देवी ” शीर्षक से समाख्यात किया है। इसके बीज ,मानस के बालकाण्ड की भवानी-पूजन की पंक्ति ” देवि पूजि पद कमल तुम्हारे।सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।। तथा अयोध्याकाण्ड की भगवान् श्रीराम की वनगमन पंक्ति ” उभय बीच सिय(श्री) सोहति कैसे।
ब्रह्म जीव बिच माया जैसे।। में विकीर्ण हैं।
अब रामायण की पंक्तियों पर सबसे पहले विचार करें, तो वाल्मीकि के राम ऐसी परिस्थितियों में सबसे पीछे आयुधों से सज्जित होकर चलते हैं, जबकि श्रीसीताजी मध्य में तथा आगे-आगे लक्ष्मण जी ।इस वर्णन के स्वरुप की समीक्षा में श्रीराम परमात्म रूप,श्रीसीता मायारुप तथा लक्ष्मणजी जीवात्मरूप हैं।वाल्मीकि के राम राजा राम हैं ,जो सभी(प्रजा) जीवात्माओं के आधार भूत हैं।अतः सायुध पीछे चलते हैं।लक्ष्मण आगे चलकर जीव भाव में रहते हैं, जबकि माया रूपिणौ सीता अपनी छत्रछाया में उन्हें आवृत कर चलती है।
तुलसी के राम का स्वरुप ही भिन्न है।जहाँ तापसवेशधारी श्रीराम आगे चलते हैं और लक्ष्मण जी पीछे।मध्य में सीता जी चल रही हैं, जिससे ब्रह्म(राम)और जीव (लक्ष्मण) के मध्य माया( सीता) का स्वरूप बन गया है-
आगे राम लखन बन पाछे।
तापस वेश विराजत काछे।।
उभय बीच सिय(श्री) सोहति कैसे।
ब्रह्म जीव बिच माया जैसे।।
उक्त चौपाई में गोस्वामी जी ने अद्वैत वेदान्त का सूत्र रख दिया है जिसके बिम्ब में परब्रह्म के प्रतीक सर्वात्मा श्रीराम का आगे रहना समीचीन है, क्योंकि सर्वकारण कारण अग्रगण्य रहेगा ही ,जब वही समग्र ब्रह्माण्ड का सर्जक ” ब्रह्म ” है ,तब उसके आगे कौन हो सकता है? वही सर्वाधार, जगत् का नियन्ता, जगदात्मा होने से सबके आगे है।
शेषावतार लक्ष्मण जीवात्म प्रतिनिधि हैं, क्योंकि वे अपने निधि श्रीराम के प्रति आतुर, आकुल और विह्वल भाव से अभिभूत हैं।रामकार्य(सृष्टि विस्तार आधार) हेतु सारी धरती को अपने ऊपर धरते हैं।
इस सारी संरचना का प्रपंच विस्तार करनेवाली माया शक्ति श्री सीता महरानी हैं, जिनके भृकुटि विलास से सृजन पालन और संहार का सम्पूर्ण कार्य सम्पादित हो रहा है-भृकुटि विलास सृष्टि लय होई।
अद्वैत वेदान्त में माया को द्विधा- अविद्या और विद्या माया बताकर सृजन प्रक्रिया समझाई गई है।इसमें विद्या माया ईश्वर की संगिनी है, जबकि जगद्विस्तारिणी अविद्या माया है, जिसे आचार्य शङ्कर ने ‘ कार्यानुमेया ‘
‘ अनादि ‘ ‘अविद्या ‘ ‘ त्रिगणात्मिका’नाम दिया है। उक्त प्रसंग में भगवती सीता भगवान की चिरसंगिनी विद्यामाया हैं, जब कि उन्हीं का अपर रूप कारयित्री शक्ति अविद्या माया भी है।इस प्रकार यह स्वरुप से एक ही माया कार्य रूप में द्विधा विभक्त है।
मानसकार आगे इस दृष्टिकोण को विस्तार देते हुए कहते हैं कि, सीता माता प्रभु राम के पद चिह्नों के बीच में पैर रखती चलती हैं, जबकि लक्ष्मण जी उन पद चिह्नों के बगल दाहिने ओर पैर रखते हुए चल रहे हैं-
प्रभु पदरेख बीच बिच सीता।
धरति चरन मग चलत सभीता।।
सीय रामपद अंक बराएँ।
लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ।।
राम मायाधीश हैं, अतः उनकी माया सीता उनके प्रति पूर्ण आदरबद्ध होकर भयपूर्वक उनके पदचिन्हों के मध्य में पैर रखती हैं।उधर जीवप्रतीक लक्ष्मण जी सीताराम के पैरों को बचाकर उनके दक्षिण ओर खाली स्थान पर पैर रखते हुए चल रहे हैं। दक्षिण शब्द अनुकूलता को संकेतित करता है, जोकि ब्रह्म-जीव के अनुगमन और अनुकूलता को सार्थक बना रहा है।
अन्त में गोस्वामी जी ने इस प्रसंग की पूर्णता इस बात में की है, जिसमें जीव ब्रह्म का ऐक्य होकर जीवन की पूर्णता सिद्ध होती है।वे कहते हैं कि, जिन-जिन लोगों ने यह(ब्रह्म-माया-जीव) स्वरूप को निहारा, उन -उन लोगों ने सानन्द विना श्रम के भव सागर का दुस्तर मार्ग पार कर लिया-
जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय,
सिय समेत दोउ भाइ।
भव मगु अगम अनंद तेहि,
बीनु श्रम रहे सिराइ।।
इस प्रकार माया की पहचान करके मायाधीन जीवात्मा, मायाधीश की शरणागति से अपना आत्मस्वरूप प्राप्त कर सकता है।और इसके परिणाम स्वरूप देह बन्धन की ” कारा ” से मुक्त भी हो सकता है।
केन्द्रीभूत उक्त चौपाई- ब्रह्म जीव बिच माया जैसे – के आलोक में आलोचक समीक्षक विद्वज्जन काशी नगरी को ब्रह्मभूत, प्रयाग को जीवात्मभूत एवं विन्ध्याचल धाम को मायाभूत प्रतीकों से जोड़ने का सार्थक तर्क देते हैं। मेरी दृष्टि में ऐसी अन्त: दृष्टि हो पाने और इसे आचरण में उतार लेने पर हम अपने अहंभाव(जीवभाव) को काटकर अपने अज्ञत्व से जीवन्मुक्त हो सकते हैं।
भगवत्कृपा सहायिनी हो।
।।हरिश्शरणम्।।
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