श्रद्धा से अमृतत्व प्राप्ति

संस्कृत भाषा का श्रद्धा शब्द बड़े आदर प्रीति पूर्वक व्यवहार में है।इसके अर्थ के विषय में विचार करने पर इसका सामान्य अर्थ सत्यनिष्ठा प्रतीत होता है।
आचार्य सायण (वेदभाष्यकार)ने इसका अर्थ आस्तिक्य बुद्धि किया है।अस्ति का भाव आस्तिक्य है।मतलब ,जगत् के समस्त प्रतिक्षण दृश्यमान परिवर्तन का प्रेरक एक अद्वितीय तत्व स्वीकारना ,ही आस्तिक्य बुद्धि है।
वेदान्त के प्रवेशिका ग्रन्थ “वेदान्तसार” के कर्ता सदानन्द योगीन्द्र ने गुरुओँ द्वारा उपदिष्ट वैदिक वाक्यों में विश्वास को श्रद्धा कहा है-
” गुरूपदिष्टवेदान्त-वाक्येषु विश्वास:एव श्रद्धा ”
अर्थात् गुरुओं के द्वारा बताए गये वैदिक वचनों में विश्वास रखना ही श्रद्धा है।
विश्वास ही श्रद्धा है।
“भवानी-शङ्करौ वन्दे श्रद्धा-विश्वास-
रूपिणौ”
बाबा तुलसी ने माँ को श्रद्धा और पिता को विश्वास कह डाला है।भगवती माँ है और भगवान् शिव पिता।एक स्थान पर दोनों एकाकार हैं। शिवाशिवयोरभेद: ।
अर्थात् जो शिव हैं वही शिवा हैं और जो शिवा हैं वही शिव हैं।
इस प्रकार मंथन से एक बात निकलती है कि श्रद्धा-विश्वास एक सिक्के के दो पहलू हैं।वस्तुतः श्रद्धा विश्वास ईश्वर के अस्तित्व और सर्वातिशायित्व का बोधक सिद्ध हुआ।
इसी बात की पुष्टि करते हुए “सर्व –
वेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह” मे आचार्य शङ्कर ने कहा-
गुरुवेदान्तवाक्येषु बुद्धिर्या निश्चयात्मिका।
सत्यमित्येव सा श्रद्धा निदानं मुक्तिसिद्धये।।210 ।।

गुरु और वेदान्त वाक्यों में जो निश्चयात्मिका सत्यस्वरूपिणी बुद्धि है,
वही श्रद्धा है।यह श्रद्धा ही मोक्षसिद्धि का मार्ग है।
आगे कहते हैं कि जैसे-जैसे देव ,गुरु,मन्त्र, तीर्थ, महात्मा और ओषधि आदि में श्रद्धा बलवती होती जाती है, वैसे-वैसे श्रद्धालु पुरुषों को सिद्धि प्राप्त होती जाती है।
दैवे च वेदे च गुरौ च मन्त्रे,
तीर्थे महात्मन्यपि भेषजे च।
श्रद्धा भवत्यस्य यथा यथान्त:
तथा तथा सिद्धिरुदेति पुंसाम्।।213।।

और श्रद्धा उत्पत्ति के विषय में कहते हैं कि यथार्थ बोलने वाले लोगों में श्रद्धा उपजती है-
यथार्थवादिनां पुंसां श्रद्धाजननकारणम्।
वेदेस्येश्वरवाक्यत्वाद् यथार्थत्वेन न संशय:।।213।।
गीता के चतुर्थ अध्याय में भगवान् ने श्रद्धावान् ,साधनपरायण ,जितेन्द्रिय को तत्वज्ञान प्राप्त करने वाला बताया है,जिसे पाकर मनुष्य अचिर ही परम शान्ति मुक्ति पा जाता है-
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं ,
तत्पर: संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां
शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।39।।

इस प्रकार ऐसे उद्धरणों से श्रद्धा युक्त व्यक्ति की शान्ति और मुक्ति सुविदित है।
भगवान् साहाय्य हों।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/09/22/श्रद्धा-से-अमृतत्व-प्राप/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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