गीता शास्त्र का आरम्भिक छ: अध्याय कर्मयोग के नाम से विख्यात है। इसके चतुर्थ अध्याय में भगवान् ने अपने अवतरित होने के रहस्य का वर्णन किया है।व्याख्या करनेवाले लोगों ने इस अध्याय को ज्ञान-कर्म-सन्यास-योग कहा है।
भगवान् कहते हैं कि मैंने इस अविनाशी योग को अपने पूर्व अवतार में,सूर्य के लिये प्रदान किया था।सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु को और मनु ने सूर्य वंश के प्रवर्तक अयोध्या नरेश इक्ष्वाकु से कहा। इस प्रकार परम्परा प्राप्त यह योग राजर्षियों ने जाना, किन्तु काल क्रम से पृथ्वी पर यह लुप्तप्राय हो गया-
इमं विवस्वते योगं
प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान् मनवे प्राह
मनुरिक्ष्वाकवेब्रवीत्।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं
राजर्षयो विदु:।
स कालेनेह महता
योगो नष्ट:परन्तप।।4/1,2।।
पतञ्जलि ने अपने योगसूत्र में कहा-तप:स्वाध्याय ईश्वरप्रणि-
धानानि क्रियायोग:।मतलब कि शारीरक तप ,मनोनिग्रह तथा ओम् का ध्यान सम्मिलित रूप में क्रियात्मक योग है(तस्य वाचक: प्रणव:)।
आचार्य ने आगे यह भी कहा कि ध्यान योग के क्रमिक उच्चतर अवस्था में योगी प्राण गति के श्वास-प्रश्वास में विच्छेद करके मुक्ति पा सकता है-
तस्मिन् सति श्वास-प्रश्वासयो:
गतिच्छेद: प्राणायाम:
योगसूत्र-2:9
योगी जनों ने ध्यान में अपनी प्राणशक्ति को षट्चक्रों में ऊर्ध्व-अध: प्रवाहित करते हुए
आधे मिनट के काल में ही , स्वाभाविक रूप से एक वर्ष की आध्यात्मिक उन्नति पाई है।
भगवान् ने गीता के चौथे अध्याय में कहा-
अपाने जुह्वति प्राणं
प्राणेपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुध्वा
प्राणायामपरायणाः।
अपरे नियताहाराः
प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।।29।।
अपान वायु में प्राण वायु के हवन द्वारा और प्राण वायु में अपानवायु के हवन द्वारा योगी प्राण और अपान दोनों की गति को रोक कर प्राणों पर नियंत्रण पा लेता है।
आगे पाँचवें अध्याय में श्लोक27एवं 28में इसका उपसंहार करते हुए कहते हैं कि वह ध्यान परायण योगी मुनिवत्
मुक्ति के चरम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपनी दृष्टि को भौहों के मध्य में स्थित करके नासिका तथा फेफड़ों में विचरने वाले प्राण और अपान को सम करते हुए वाह्यविषय भोगों से अपने ध्यान को हटाने में तथा इच्छा, भय,क्रोध को निकाल बाहर करने में समर्थ हो जाते हैं।ऐसे लोग सर्वदा बन्धनरहित हैं।
वाग्वैखरी -शब्दझरी …भुक्तये न तु मुक्तये- इत्यादि वचनों से आचार्य शंङ्कर ने सिद्ध किया है कि वाह्यकर्मकाण्ड अज्ञान का विनाश नहीं कर सकता।अपने
“अपरोक्षानुभूति” में वे कहते हैं एकमात्र अनुभूत ज्ञान ही अज्ञान को नष्ट करेगा।
इस प्रकार योग मार्गी अपने प्राणों की गति पर नियमन करके शब्द,स्पर्श, रूप,रस और गन्ध के पाँच वाह्यप्रवाहों को अन्त:प्रवाही बना कर इन्द्रियों से सम्बन्ध विच्छेद कर सकता है, जिससे इच्छानुकूल दिव्यपराचेतना से अपने मन को जोड़ लेता है।
ऐसी आत्मस्थ जीवन की श्रेष्ठ पद्धति योगी को अपने अहं की कारा से निकाल कर समष्टि और सर्व व्यापकता की गहनता में प्रविष्ट करा देती है और मुक्ति के समुन्नत विशालकाय प्रासाद में प्रवेश मिलता है।
यही मुक्ति की चरमावस्था है।
भगवान् सहायता करें।
।।हरिश्शरणम्।।
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