कर्मयोग से बन्धमुक्ति

श्रीमद्भगवद्गीता का ,आरंभ से लेकर छ:अध्याय तक का तत्व विवेचन “कर्मयोग” के नाम से व्याख्यायित है।
इममें भगवान् ने कर्मयोग की सम्यक् मीमांसा की है।दूसरे अध्याय के चालीसवें मन्त्र में इस कर्मयोग की विशेषता बताई गई है।

वे कहते हैं कि इस कर्मयोग में आरम्भ अर्थात् बीज का नाश नहीं होता-नेहाभिक्रमनाशोस्ति

अभिक्रम शब्द का अर्थ है -आरम्भ।आरम्भ के नाश न होने से तात्पर्य है, बीजारोपण किये गए कर्मों से।
कर्मयोग से तात्पर्य है निर्लिप्त भाव से ,फलाकांक्ष न होकर कर्मों का सम्पादन करना।कठिन तो बहुत है कि कर्म करें, और फल कामना ,न करें।किन्तु अभ्यास से ऐसा सम्भव है ,तब जब कि, हम निश्चित कर लें कि “मा फलेषु कदाचन” का अर्थ ही फलकामना से विरत करने वाला है।

अतः सुनिश्चित है कि हम आसानी से इस बात पर दृढ हो जायें कि, फल हमारे हाथ में नहीं, वह तो प्रारब्ध एवं ईश्वर के आधीन है। जब फलप्राप्ति में स्वाधीनता नहीं है, तब फलों की चाहत में पड़े रहकर, द्वन्द्वों और राग-द्वेष के कारण अन्य जन्मों /शरीरों को क्यों निमन्त्रित करें।

इस प्रकार भगवान ने कहा कि कर्मयोग(निष्काम कर्मयोग)के मार्ग पर एक बार चल पड़ने पर, आरम्भ का नाश नहीं होगा अर्थात् वह व्यर्थ नहीं जायेगा, बल्कि अगले जन्म में (प्रारब्ध शेष रहने पर )पुनः इस कर्मयोग की यात्रा आरम्भ हो जायेगी, जहाँ से यह टूटी थी।

इसके अलावा, कर्मयोग के क्षेत्र में-प्रत्यवायो न विद्यते-मतलब कि प्रयासों का उल्टा फल भी नहीं होगा, क्योंकि उल्टा -पुल्टा फल तो तब होगा, जब वह फलाकांक्ष कर्म करेगा।
स्वल्पमपि अस्य धर्मस्य,
त्रायते महतो भयात्।।2/40।।

दूसरी और तीसरी अर्धाली में भगवान् इस कर्मयोग के आचरण से स्वत:प्राप्तव्य फल का निर्देश करते हुए कहते हैं कि, इस योग की साधना का अल्प प्रयास ही महान् ” भय ” से रक्षा करेगा।
इसके पहले उन्तालीसवें मन्त्र में कह आए हैं कि, ” बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ, कर्मबन्धं प्रहास्यसि ”
अर्थात् इस कर्मयोग पर चल कर तुम कर्मबन्धन को काट डालोगे।मतलब कि जन्मबन्ध से विनिर्मुक्त हो जाओगे।
इस प्रकार गीता गीत यह कर्मयोग का मार्ग ,जन्म-मृत्यु रूपी महान् भय से छुटकारा दिला देगा,मोक्ष प्राप्त होगा अथवा जीवात्मा को परमात्मा से मिला देगा।भगवान् सहायता करें।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/09/10/कर्मयोग-से-बन्धमुक्ति/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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