नाम जप से भव बन्ध-मुक्ति

ईश्वर के स्त्री रूप अथवा पुरुष रुप में से किसी रूप का ध्यान और उनके नाम का स्मरण कलि काल में ,मुक्ति का साधन कहा गया है। निर्विवाद रूप से प्रमाणित है कि इस कलियुग में नर शरीर धारण का लक्ष्य ही भवबन्धन से मुक्ति है।इसके इतर धर्मार्थकाम की उपलब्धि पूर्वतः प्राप्त होने पर भी क्या विचित्रता है कि, मनुष्य मानव जीवन के चरम प्राप्तव्य मोक्ष को भूलकर कामादि के लिये ही सतत प्रयास रत रहता है।
बड़े-बड़े महापुरुषों ने बड़ी चतुराई से इस पर अपने विचार दिये हैं।देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र में शङ्कराचार्य ने कहा-
मुझे मोक्ष की आकांक्षा नहीं और न ही लोकवैभव अपेक्षित है।और किसी ज्ञान विज्ञान की आवश्यकता नहीं है, जिससे लेशमात्र सुख की कामना की जाये। अपेक्षित एकमात्र यही है कि, मेरा जन्म जब भी हो तो मृडानी -रुद्राणी -शिव-शिव भवानी नाम-जप होता रहे।
इस प्रकार की कामना में शुद्ध रूप से नामजप के फलस्वरूप पुनः जन्म को निवारित करने का भाव ही व्यक्त होता है।
बाबा तुलसी के शब्दों में तो इस भवबन्ध से मुक्ति का उपाय मात्र भगवन्नाम स्मरण ही है-

कलियुग केवल नाम अधारा।
सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।।
एक जगह कहते हैं-
नहिं कलि करम न भगति विवेकू।
राम नाम अवलम्बन एकू।।
अर्थात् कलिकाल में किसी अन्य धर्म-व्रत-कर्म की आवश्यकता नहीं है, मात्र नाम का आश्रय लेकर मुक्ति मिल सकती है।
भगवान् शिव ,पार्वती के साथ निरन्तर राम नाम जपते हैं।कृष्णं, जो मंगलकारी और अमंगलकारी है-
मंगल भवन अमंगल हारी।
उमा सहित जेहिं जपत पुरारी।।

कहाँ तक कहें, जिस नाम जप के कारण भगवान् गणेश को आदि पूज्यता प्राप्त हो गई-
महिमा जासु जानि गनराउ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।

एक बात सर्वविदित है कि, नाम और नामी में अभेद होता है।
ज्योंही नामस्मरण होता ,त्यों ही नामी के रूप,लीला, गुण,धाम की स्मृति उपस्थित हो जाती है और नामजापक अलौकिक रसमाधुरी में खोकर आत्म विस्मृति को प्राप्त हो जाता है।
यहाँ तक कि भगवत् स्मरण में निरत भक्त के कामक्रोधादि विनष्ट हो जाते हैं, और ऐसा व्यक्ति सभी में अपने प्रभु का दर्शन करने के कारण प्राणी मात्र से वैर-विरोध भूल जाता है-
उमा जे रामचरनरत,
विगत काममदक्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत,
केहिं सन करहिं विरोध।।

नाम जापक व्यक्ति की ,निरन्तर नामजप निरति के कारण,”सर्वं
खलु इदं ब्रह्म ” कीअवधारणा स्थिर होती जाती है।और लगता है भगवान् ने गीता में इसीलिए अनन्यभाव से स्मरण करनेवाले साधु को वचन भी दे डाला है कि, उसके अप्राप्त की प्राप्ति(योग)और प्राप्त वस्तुओं की सुरक्षा (क्षेम) की गारंटी मैं लेता हूँ-

अनन्या: चिन्तयन्तो मां,
ये जना: पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां,
योगक्षेमं वहाम्यहम्।।

अन्त में आदिकवि वाल्मीकि को सन्दर्भित कर गोस्वामी जी ने तो यहाँ तक कह डाला कि उलटा ही नाम का जप करके ,वे महाकवि ब्रह्मवत् पूजनीय हो गये-
उलटा नाम जपत जग जाना।
बालमीकि भये ब्रह्म समाना।।

तब इस कलिकाल में क्या कहें, नाम जप ही मुक्ति का उत्तम साधन सिद्ध होता है-

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव
नास्त्येव गतिरन्यथा।।

इत्यादि पुराणवचनों से इस नाम संकीर्तन प्रकरण को भगवदर्पण
किया जा रहा है। भगवान् साहाय्य हों।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/09/08/नाम-जप-से-भव-बन्ध-मुक्ति/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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