मनुष्य शरीर के लिये धर्म, अर्थ, काम (भोग)और मोक्ष इन चारों को चार पुरुषार्थ माना गया है।ये चार अर्थ यानी कि चार प्रयोजनों के लिए मानव शरीर की प्राप्ति ,भगवत् कृपा और स्वयं के प्रारब्ध से हुई मानी गई है।
परन्तु यदि इन प्रयोजनों की गहराई में जायें, तो ऐसा लगता है कि प्रारंभ के तीन प्रयोजनों हेतु, मानव परतन्त्र है, जबकि अन्तिम और चरम प्रयोजन हेतु स्वतंत्र।
एक श्लोक पञ्चतन्त्र में आता है, जिसमें शिशु के गर्भस्थ होते ही पाँच चीजों को स्थिर या निश्चित कर दिया जाता है-
आयु:कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पञ्चैतान्यपि सृज्यन्ते
गर्भस्थस्यैव देहिनः।।
अर्थात् शरीरोत्पत्ति के पूर्व गर्भ में ही पाँच चीजें निश्चित हो जाती हैं-1-आयु,2-कर्म(पेशा)
3-वित्त (चलाचल संपत्ति),4-विद्या(अध्ययन)और 5-निधन।
इस प्रकार उक्त पद्य के आलोक में विचार करें तो चार पुरुषार्थों में ,आचारादि धर्मों का पालन,अर्थादि संपत्ति की प्राप्ति और इसके अनुसार कामोपभोग का निश्चयीकरण यदि पूर्व शरीर द्वारा गर्भ में ही तय हो जाते हैं, तब इनकी प्राप्ति में पूर्वत:परतंत्रता ही मानी जायेगी।
किन्तु मानवीय शरीर मुक्ति(मोक्ष) प्राप्ति में स्वतन्त्र प्रतीत होता है।उत्तर काण्ड में मानसकार ने भगवान् श्री राम के मुख से कहलवाया है-
साधन धाम मोक्ष करि द्वारा।पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।।
सो परत्र दुख पावै
सिर धुनि धुनि पछताइ।
कालहिं कर्महिं ईश्वरहिं
मिथ्या दोष लगाइ।।
एहि तन कर फल विषय न भाई
स्वर्ग-उ स्वल्प अंत दुखदाई।।
जो न तरै भवसागर।
नर समाज अस पाइ।
सो कृत निन्दक मन्दमति।
आत्माहन गति जाइ।।
बाबा तुलसीदास की उक्त पंक्तियों से साफ हो जाता है कि नर तन से ही चरमपुरुषार्थ मोक्ष साध्य है।और इसी अन्तिम पुरुषार्थ में पुरूष की अपनी स्वतंत्रता है कि वह जन्मादि बन्धनमुक्त होना चाहता है अथवा नहीं।
इस बात को गीताशास्त्र में भगवान भी बताते हैं, जब उन्होंने कहा-
कर्मणि एव अधिकार:ते
अर्थात् कर्मणि, इस एकवचन के प्रयोग से प्रतीत होता है कि एक मात्र कर्म, मुक्ति कर्म में ही मानव शरीर की स्वतंत्रता है।
दूसरे क्षण अगली पंक्ति है-
मा फलेषु कदाचन।
अर्थात् अन्य प्राप्तव्य परिणामों(फलों) की प्राप्ति पूर्व शरीर से सुनश्चित होने से उनके लिए परतंत्रता है।
अतः उक्त पर्यालोचन से यह बात उभर कर सामने आई कि मानव शरीर को अर्थ भोगादि ,शरीर संसारादि के लिए नियोजित नहीं करना चाहिए क्योंकि वह तो पूर्व कर्मों से, मिलना ही है।
इस शरीर का चरम फल तो मोक्ष है।भगवान् सहायता करें।
।।हरिश्शरणम्।।
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