मानव शरीर -प्राप्ति

मानव शरीर की उपलब्धि कैसै और किन कारणों से हुई, यह विचारणीय विषय है ।
सर्वप्रथम कैसे पर विचार करें तो मानसकार गोस्वामी तुलसीदास जी के उत्तर काण्ड में दृष्टिपात करने पर दो अलग अलग पंक्तियां आती हैं-
बड़े भाग मानुष तन पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन गावा।।

कबहुँक करि करुना नर देही।
देत ईश बिनु हेतु सनेही।।

भाग्य कर्मों के कारण देव दुर्लभ मानव देह मिला है। भाग्य को प्रारब्ध भी कहते हैं। यह प्रारब्ध कर्म , पूर्व शरीर से किया गया कर्म होता है।इसी को अदृष्ट या दूसरे शब्दों में ” दैव ” भी कहा गया है। इस प्रकार मानव शरीर का यह एक कारण हुआ।

दूसरी पंक्ति के अनुसार अकारण करुणावरुणालय भगवान् स्वयं ,अंशी होने के नाते अंश भूत जीव को स्नेहपूर्वक, बिना हेतु मानव शरीर दे देते हैं।

इस प्रकार मानसकार की उक्त पंक्तियों में विरोध सा दीखता है।
एक जगह , मानव शरीर का कारण प्रारब्ध है तो दूसरी जगह ईश्वर।परन्तु ऐसा है,नहीं।इन बातों विरोध नहीं, बल्कि विरोधाभास मात्र है।
क्योंकि विरोध एवं विरोधाभास दोनों पृथक्-पृथक् अर्थ वाले हैं।
इस सन्दर्भ में आचार्य शंङ्कर ने विवेकचूडामणि के प्रारंभ में ही एक बात कही है, जिसका उल्लेख आवश्यक हो जाता है-
दुर्लभं त्रयमेवैतद् देवानुग्रहहेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं
महापुरुषसंश्रय:।।

अर्थात् इस जगत् में तीन चीजें दुर्लभ हैं ,और उनका कारण देव का अनुग्रह(कृपा)मात्र है।वे हैं- मानव शरीर, मोक्षेच्छा और सत्संग ।
इन शांकरी पंक्तियों से भी मनुष्य देह प्राप्ति में ईश्वर का अनुग्रह ही कारणरुप में परिलक्षित होता है।

इस समग्र विरोधाभास का शमन ,गीताशास्त्र की ईश्वरीय वैखरी वाणी से होता है, जब अठारहवें अध्याय में यह बात आई है-

पञ्चैतानि महाबाहो
कारणानि निबोध मे।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि
सिद्धये सर्वकर्मणाम्।।18/13।।

मतलब कि सांख्य शास्त्र में कर्मों का अन्त करने के लिए, सभी कर्मों की सिद्धि(पूर्णता)
हेतु पाँच कारण समूहालम्बीकृत रूप से जानना चाहिए।वे क्या हैं-

अधिष्ठानं तथा कर्ता
करणं च पृथग् विधम्।
विविधाश्च पृथक् चेष्टा:
दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।18/14।।

अधिष्ठान(ईश्वर)एक
कर्ता(स्वयं व्यक्ति)दो
करण(भिन्न उपकरण इन्द्रियादि)तीन
चेष्टाएँ(गमन अंगसंचालनादि)चार
तथा
दैव(प्रारब्ध कर्म) पाँच
इस प्रकार भगवान् ने कर्म की सिद्धि(पूर्णता)में सर्वप्रथम ईश्वर और सबसे अन्त में पाँचवें कारण दैव (भाग्य)को रखा है।
गीतोक्त वाणी के आलोक में मनुष्य शरीर की प्राप्ति के कारणों की मीमांसा करें तो महात्मा तुलसी दास द्वारा परिगणित कारणद्वय में कोई विरोध नहीं दिखाई देता।
विरोध का आभास या प्रतीति होना विरोधाभास है यानी कि विरोध जैसा दीखना, जबकि विरोध कथंचित् नहीं नहीं होता है।
वस्तुत: ईश्वर और भाग्य दोनों ही मानवीय शरीर के कारक सिद्ध होते हैं, क्योंकि मुक्ति की बात इसी शरीर से सोची जा सकती है।
अतः चाहे मानसकार हों ,आचार्य शङ्कर हों अथवा
” गीता माँ ” सभी के कथनों में
मानवीय शरीर मिलने के कारणों में कोई विरोध नहीं है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/09/02/मानव-शरीर-प्राप्ति/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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