माया का अभिज्ञान होने पर मुक्ति

आज शारदीय नवरात्र विक्रम सं 2074 पंचमी तिथि सोमवार का दिन, जब रामकथा के अमर गायक सन्त मुरारी बापू की रामकथा-प्रवाह का पाँचवाँ दिवस देदीप्यमान है।यह बड़े आनंद का विषय और शक्तिपीठ विन्ध्याचल धाम की अपार पारमाण्विक ऊर्जा का विद्युत् चुम्बकीय तत्व है, जिसने श्रीरामकथामन्दाकिनी को विन्ध्यक्षेत्र में विन्ध्यपर्वतमाला से आलिंगित होकर बहने के लिये बाध्य कर दिया।
आरम्भ में ही “व्यासपीठ” ने नवमी पर्यन्त कथा को ” मानस-श्री-देवी ” शीर्षक से समाख्यात किया है। इसके बीज ,मानस के बालकाण्ड की भवानी-पूजन की पंक्ति ” देवि पूजि पद कमल तुम्हारे।सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।। तथा अयोध्याकाण्ड की भगवान् श्रीराम की वनगमन पंक्ति ” उभय बीच सिय(श्री) सोहति कैसे।
ब्रह्म जीव बिच माया जैसे।। में विकीर्ण हैं।
अब रामायण की पंक्तियों पर सबसे पहले विचार करें, तो वाल्मीकि के राम ऐसी परिस्थितियों में सबसे पीछे आयुधों से सज्जित होकर चलते हैं, जबकि श्रीसीताजी मध्य में तथा आगे-आगे लक्ष्मण जी ।इस वर्णन के स्वरुप की समीक्षा में श्रीराम परमात्म रूप,श्रीसीता मायारुप तथा लक्ष्मणजी जीवात्मरूप हैं।वाल्मीकि के राम राजा राम हैं ,जो सभी(प्रजा) जीवात्माओं के आधार भूत हैं।अतः सायुध पीछे चलते हैं।लक्ष्मण आगे चलकर जीव भाव में रहते हैं, जबकि माया रूपिणौ सीता अपनी छत्रछाया में उन्हें आवृत कर चलती है।
तुलसी के राम का स्वरुप ही भिन्न है।जहाँ तापसवेशधारी श्रीराम आगे चलते हैं और लक्ष्मण जी पीछे।मध्य में सीता जी चल रही हैं, जिससे ब्रह्म(राम)और जीव (लक्ष्मण) के मध्य माया( सीता) का स्वरूप बन गया है-
आगे राम लखन बन पाछे।
तापस वेश विराजत काछे।।
उभय बीच सिय(श्री) सोहति कैसे।
ब्रह्म जीव बिच माया जैसे।।
उक्त चौपाई में गोस्वामी जी ने अद्वैत वेदान्त का सूत्र रख दिया है जिसके बिम्ब में परब्रह्म के प्रतीक सर्वात्मा श्रीराम का आगे रहना समीचीन है, क्योंकि सर्वकारण कारण अग्रगण्य रहेगा ही ,जब वही समग्र ब्रह्माण्ड का सर्जक ” ब्रह्म ” है ,तब उसके आगे कौन हो सकता है? वही सर्वाधार, जगत् का नियन्ता, जगदात्मा होने से सबके आगे है।
शेषावतार लक्ष्मण जीवात्म प्रतिनिधि हैं, क्योंकि वे अपने निधि श्रीराम के प्रति आतुर, आकुल और विह्वल भाव से अभिभूत हैं।रामकार्य(सृष्टि विस्तार आधार) हेतु सारी धरती को अपने ऊपर धरते हैं।
इस सारी संरचना का प्रपंच विस्तार करनेवाली माया शक्ति श्री सीता महरानी हैं, जिनके भृकुटि विलास से सृजन पालन और संहार का सम्पूर्ण कार्य सम्पादित हो रहा है-भृकुटि विलास सृष्टि लय होई।
अद्वैत वेदान्त में माया को द्विधा- अविद्या और विद्या माया बताकर सृजन प्रक्रिया समझाई गई है।इसमें विद्या माया ईश्वर की संगिनी है, जबकि जगद्विस्तारिणी अविद्या माया है, जिसे आचार्य शङ्कर ने ‘ कार्यानुमेया ‘
‘ अनादि ‘ ‘अविद्या ‘ ‘ त्रिगणात्मिका’नाम दिया है। उक्त प्रसंग में भगवती सीता भगवान की चिरसंगिनी विद्यामाया हैं, जब कि उन्हीं का अपर रूप कारयित्री शक्ति अविद्या माया भी है।इस प्रकार यह स्वरुप से एक ही माया कार्य रूप में द्विधा विभक्त है।
मानसकार आगे इस दृष्टिकोण को विस्तार देते हुए कहते हैं कि, सीता माता प्रभु राम के पद चिह्नों के बीच में पैर रखती चलती हैं, जबकि लक्ष्मण जी उन पद चिह्नों के बगल दाहिने ओर पैर रखते हुए चल रहे हैं-
प्रभु पदरेख बीच बिच सीता।
धरति चरन मग चलत सभीता।।
सीय रामपद अंक बराएँ।
लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ।।
राम मायाधीश हैं, अतः उनकी माया सीता उनके प्रति पूर्ण आदरबद्ध होकर भयपूर्वक उनके पदचिन्हों के मध्य में पैर रखती हैं।उधर जीवप्रतीक लक्ष्मण जी सीताराम के पैरों को बचाकर उनके दक्षिण ओर खाली स्थान पर पैर रखते हुए चल रहे हैं। दक्षिण शब्द अनुकूलता को संकेतित करता है, जोकि ब्रह्म-जीव के अनुगमन और अनुकूलता को सार्थक बना रहा है।
अन्त में गोस्वामी जी ने इस प्रसंग की पूर्णता इस बात में की है, जिसमें जीव ब्रह्म का ऐक्य होकर जीवन की पूर्णता सिद्ध होती है।वे कहते हैं कि, जिन-जिन लोगों ने यह(ब्रह्म-माया-जीव) स्वरूप को निहारा, उन -उन लोगों ने सानन्द विना श्रम के भव सागर का दुस्तर मार्ग पार कर लिया-
जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय,
सिय समेत दोउ भाइ।
भव मगु अगम अनंद तेहि,
बीनु श्रम रहे सिराइ।।
इस प्रकार माया की पहचान करके मायाधीन जीवात्मा, मायाधीश की शरणागति से अपना आत्मस्वरूप प्राप्त कर सकता है।और इसके परिणाम स्वरूप देह बन्धन की ” कारा ” से मुक्त भी हो सकता है।
केन्द्रीभूत उक्त चौपाई- ब्रह्म जीव बिच माया जैसे – के आलोक में आलोचक समीक्षक विद्वज्जन काशी नगरी को ब्रह्मभूत, प्रयाग को जीवात्मभूत एवं विन्ध्याचल धाम को मायाभूत प्रतीकों से जोड़ने का सार्थक तर्क देते हैं। मेरी दृष्टि में ऐसी अन्त: दृष्टि हो पाने और इसे आचरण में उतार लेने पर हम अपने अहंभाव(जीवभाव) को काटकर अपने अज्ञत्व से जीवन्मुक्त हो सकते हैं।
भगवत्कृपा सहायिनी हो।

।।हरिश्शरणम्।।

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श्रद्धा से अमृतत्व प्राप्ति

संस्कृत भाषा का श्रद्धा शब्द बड़े आदर प्रीति पूर्वक व्यवहार में है।इसके अर्थ के विषय में विचार करने पर इसका सामान्य अर्थ सत्यनिष्ठा प्रतीत होता है।
आचार्य सायण (वेदभाष्यकार)ने इसका अर्थ आस्तिक्य बुद्धि किया है।अस्ति का भाव आस्तिक्य है।मतलब ,जगत् के समस्त प्रतिक्षण दृश्यमान परिवर्तन का प्रेरक एक अद्वितीय तत्व स्वीकारना ,ही आस्तिक्य बुद्धि है।
वेदान्त के प्रवेशिका ग्रन्थ “वेदान्तसार” के कर्ता सदानन्द योगीन्द्र ने गुरुओँ द्वारा उपदिष्ट वैदिक वाक्यों में विश्वास को श्रद्धा कहा है-
” गुरूपदिष्टवेदान्त-वाक्येषु विश्वास:एव श्रद्धा ”
अर्थात् गुरुओं के द्वारा बताए गये वैदिक वचनों में विश्वास रखना ही श्रद्धा है।
विश्वास ही श्रद्धा है।
“भवानी-शङ्करौ वन्दे श्रद्धा-विश्वास-
रूपिणौ”
बाबा तुलसी ने माँ को श्रद्धा और पिता को विश्वास कह डाला है।भगवती माँ है और भगवान् शिव पिता।एक स्थान पर दोनों एकाकार हैं। शिवाशिवयोरभेद: ।
अर्थात् जो शिव हैं वही शिवा हैं और जो शिवा हैं वही शिव हैं।
इस प्रकार मंथन से एक बात निकलती है कि श्रद्धा-विश्वास एक सिक्के के दो पहलू हैं।वस्तुतः श्रद्धा विश्वास ईश्वर के अस्तित्व और सर्वातिशायित्व का बोधक सिद्ध हुआ।
इसी बात की पुष्टि करते हुए “सर्व –
वेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह” मे आचार्य शङ्कर ने कहा-
गुरुवेदान्तवाक्येषु बुद्धिर्या निश्चयात्मिका।
सत्यमित्येव सा श्रद्धा निदानं मुक्तिसिद्धये।।210 ।।

गुरु और वेदान्त वाक्यों में जो निश्चयात्मिका सत्यस्वरूपिणी बुद्धि है,
वही श्रद्धा है।यह श्रद्धा ही मोक्षसिद्धि का मार्ग है।
आगे कहते हैं कि जैसे-जैसे देव ,गुरु,मन्त्र, तीर्थ, महात्मा और ओषधि आदि में श्रद्धा बलवती होती जाती है, वैसे-वैसे श्रद्धालु पुरुषों को सिद्धि प्राप्त होती जाती है।
दैवे च वेदे च गुरौ च मन्त्रे,
तीर्थे महात्मन्यपि भेषजे च।
श्रद्धा भवत्यस्य यथा यथान्त:
तथा तथा सिद्धिरुदेति पुंसाम्।।213।।

और श्रद्धा उत्पत्ति के विषय में कहते हैं कि यथार्थ बोलने वाले लोगों में श्रद्धा उपजती है-
यथार्थवादिनां पुंसां श्रद्धाजननकारणम्।
वेदेस्येश्वरवाक्यत्वाद् यथार्थत्वेन न संशय:।।213।।
गीता के चतुर्थ अध्याय में भगवान् ने श्रद्धावान् ,साधनपरायण ,जितेन्द्रिय को तत्वज्ञान प्राप्त करने वाला बताया है,जिसे पाकर मनुष्य अचिर ही परम शान्ति मुक्ति पा जाता है-
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं ,
तत्पर: संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां
शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।39।।

इस प्रकार ऐसे उद्धरणों से श्रद्धा युक्त व्यक्ति की शान्ति और मुक्ति सुविदित है।
भगवान् साहाय्य हों।

।।हरिश्शरणम्।।

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प्राण शक्ति समुच्चय से मुक्ति

गीता शास्त्र का आरम्भिक छ: अध्याय कर्मयोग के नाम से विख्यात है। इसके चतुर्थ अध्याय में भगवान् ने अपने अवतरित होने के रहस्य का वर्णन किया है।व्याख्या करनेवाले लोगों ने इस अध्याय को ज्ञान-कर्म-सन्यास-योग कहा है।
भगवान् कहते हैं कि मैंने इस अविनाशी योग को अपने पूर्व अवतार में,सूर्य के लिये प्रदान किया था।सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु को और मनु ने सूर्य वंश के प्रवर्तक अयोध्या नरेश इक्ष्वाकु से कहा। इस प्रकार परम्परा प्राप्त यह योग राजर्षियों ने जाना, किन्तु काल क्रम से पृथ्वी पर यह लुप्तप्राय हो गया-
इमं विवस्वते योगं
प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान् मनवे प्राह
मनुरिक्ष्वाकवेब्रवीत्।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं
राजर्षयो विदु:।
स कालेनेह महता
योगो नष्ट:परन्तप।।4/1,2।।
पतञ्जलि ने अपने योगसूत्र में कहा-तप:स्वाध्याय ईश्वरप्रणि-
धानानि क्रियायोग:।मतलब कि शारीरक तप ,मनोनिग्रह तथा ओम् का ध्यान सम्मिलित रूप में क्रियात्मक योग है(तस्य वाचक: प्रणव:)।
आचार्य ने आगे यह भी कहा कि ध्यान योग के क्रमिक उच्चतर अवस्था में योगी प्राण गति के श्वास-प्रश्वास में विच्छेद करके मुक्ति पा सकता है-
तस्मिन् सति श्वास-प्रश्वासयो:
गतिच्छेद: प्राणायाम:
योगसूत्र-2:9
योगी जनों ने ध्यान में अपनी प्राणशक्ति को षट्चक्रों में ऊर्ध्व-अध: प्रवाहित करते हुए
आधे मिनट के काल में ही , स्वाभाविक रूप से एक वर्ष की आध्यात्मिक उन्नति पाई है।
भगवान् ने गीता के चौथे अध्याय में कहा-
अपाने जुह्वति प्राणं
प्राणेपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुध्वा
प्राणायामपरायणाः।
अपरे नियताहाराः
प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।।29।।
अपान वायु में प्राण वायु के हवन द्वारा और प्राण वायु में अपानवायु के हवन द्वारा योगी प्राण और अपान दोनों की गति को रोक कर प्राणों पर नियंत्रण पा लेता है।
आगे पाँचवें अध्याय में श्लोक27एवं 28में इसका उपसंहार करते हुए कहते हैं कि वह ध्यान परायण योगी मुनिवत्
मुक्ति के चरम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपनी दृष्टि को भौहों के मध्य में स्थित करके नासिका तथा फेफड़ों में विचरने वाले प्राण और अपान को सम करते हुए वाह्यविषय भोगों से अपने ध्यान को हटाने में तथा इच्छा, भय,क्रोध को निकाल बाहर करने में समर्थ हो जाते हैं।ऐसे लोग सर्वदा बन्धनरहित हैं।
वाग्वैखरी -शब्दझरी …भुक्तये न तु मुक्तये- इत्यादि वचनों से आचार्य शंङ्कर ने सिद्ध किया है कि वाह्यकर्मकाण्ड अज्ञान का विनाश नहीं कर सकता।अपने
“अपरोक्षानुभूति” में वे कहते हैं एकमात्र अनुभूत ज्ञान ही अज्ञान को नष्ट करेगा।
इस प्रकार योग मार्गी अपने प्राणों की गति पर नियमन करके शब्द,स्पर्श, रूप,रस और गन्ध के पाँच वाह्यप्रवाहों को अन्त:प्रवाही बना कर इन्द्रियों से सम्बन्ध विच्छेद कर सकता है, जिससे इच्छानुकूल दिव्यपराचेतना से अपने मन को जोड़ लेता है।
ऐसी आत्मस्थ जीवन की श्रेष्ठ पद्धति योगी को अपने अहं की कारा से निकाल कर समष्टि और सर्व व्यापकता की गहनता में प्रविष्ट करा देती है और मुक्ति के समुन्नत विशालकाय प्रासाद में प्रवेश मिलता है।
यही मुक्ति की चरमावस्था है।
भगवान् सहायता करें।

।।हरिश्शरणम्।।

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कर्मयोग से बन्धमुक्ति

श्रीमद्भगवद्गीता का ,आरंभ से लेकर छ:अध्याय तक का तत्व विवेचन “कर्मयोग” के नाम से व्याख्यायित है।
इममें भगवान् ने कर्मयोग की सम्यक् मीमांसा की है।दूसरे अध्याय के चालीसवें मन्त्र में इस कर्मयोग की विशेषता बताई गई है।

वे कहते हैं कि इस कर्मयोग में आरम्भ अर्थात् बीज का नाश नहीं होता-नेहाभिक्रमनाशोस्ति

अभिक्रम शब्द का अर्थ है -आरम्भ।आरम्भ के नाश न होने से तात्पर्य है, बीजारोपण किये गए कर्मों से।
कर्मयोग से तात्पर्य है निर्लिप्त भाव से ,फलाकांक्ष न होकर कर्मों का सम्पादन करना।कठिन तो बहुत है कि कर्म करें, और फल कामना ,न करें।किन्तु अभ्यास से ऐसा सम्भव है ,तब जब कि, हम निश्चित कर लें कि “मा फलेषु कदाचन” का अर्थ ही फलकामना से विरत करने वाला है।

अतः सुनिश्चित है कि हम आसानी से इस बात पर दृढ हो जायें कि, फल हमारे हाथ में नहीं, वह तो प्रारब्ध एवं ईश्वर के आधीन है। जब फलप्राप्ति में स्वाधीनता नहीं है, तब फलों की चाहत में पड़े रहकर, द्वन्द्वों और राग-द्वेष के कारण अन्य जन्मों /शरीरों को क्यों निमन्त्रित करें।

इस प्रकार भगवान ने कहा कि कर्मयोग(निष्काम कर्मयोग)के मार्ग पर एक बार चल पड़ने पर, आरम्भ का नाश नहीं होगा अर्थात् वह व्यर्थ नहीं जायेगा, बल्कि अगले जन्म में (प्रारब्ध शेष रहने पर )पुनः इस कर्मयोग की यात्रा आरम्भ हो जायेगी, जहाँ से यह टूटी थी।

इसके अलावा, कर्मयोग के क्षेत्र में-प्रत्यवायो न विद्यते-मतलब कि प्रयासों का उल्टा फल भी नहीं होगा, क्योंकि उल्टा -पुल्टा फल तो तब होगा, जब वह फलाकांक्ष कर्म करेगा।
स्वल्पमपि अस्य धर्मस्य,
त्रायते महतो भयात्।।2/40।।

दूसरी और तीसरी अर्धाली में भगवान् इस कर्मयोग के आचरण से स्वत:प्राप्तव्य फल का निर्देश करते हुए कहते हैं कि, इस योग की साधना का अल्प प्रयास ही महान् ” भय ” से रक्षा करेगा।
इसके पहले उन्तालीसवें मन्त्र में कह आए हैं कि, ” बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ, कर्मबन्धं प्रहास्यसि ”
अर्थात् इस कर्मयोग पर चल कर तुम कर्मबन्धन को काट डालोगे।मतलब कि जन्मबन्ध से विनिर्मुक्त हो जाओगे।
इस प्रकार गीता गीत यह कर्मयोग का मार्ग ,जन्म-मृत्यु रूपी महान् भय से छुटकारा दिला देगा,मोक्ष प्राप्त होगा अथवा जीवात्मा को परमात्मा से मिला देगा।भगवान् सहायता करें।

।।हरिश्शरणम्।।

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नाम जप से भव बन्ध-मुक्ति

ईश्वर के स्त्री रूप अथवा पुरुष रुप में से किसी रूप का ध्यान और उनके नाम का स्मरण कलि काल में ,मुक्ति का साधन कहा गया है। निर्विवाद रूप से प्रमाणित है कि इस कलियुग में नर शरीर धारण का लक्ष्य ही भवबन्धन से मुक्ति है।इसके इतर धर्मार्थकाम की उपलब्धि पूर्वतः प्राप्त होने पर भी क्या विचित्रता है कि, मनुष्य मानव जीवन के चरम प्राप्तव्य मोक्ष को भूलकर कामादि के लिये ही सतत प्रयास रत रहता है।
बड़े-बड़े महापुरुषों ने बड़ी चतुराई से इस पर अपने विचार दिये हैं।देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र में शङ्कराचार्य ने कहा-
मुझे मोक्ष की आकांक्षा नहीं और न ही लोकवैभव अपेक्षित है।और किसी ज्ञान विज्ञान की आवश्यकता नहीं है, जिससे लेशमात्र सुख की कामना की जाये। अपेक्षित एकमात्र यही है कि, मेरा जन्म जब भी हो तो मृडानी -रुद्राणी -शिव-शिव भवानी नाम-जप होता रहे।
इस प्रकार की कामना में शुद्ध रूप से नामजप के फलस्वरूप पुनः जन्म को निवारित करने का भाव ही व्यक्त होता है।
बाबा तुलसी के शब्दों में तो इस भवबन्ध से मुक्ति का उपाय मात्र भगवन्नाम स्मरण ही है-

कलियुग केवल नाम अधारा।
सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।।
एक जगह कहते हैं-
नहिं कलि करम न भगति विवेकू।
राम नाम अवलम्बन एकू।।
अर्थात् कलिकाल में किसी अन्य धर्म-व्रत-कर्म की आवश्यकता नहीं है, मात्र नाम का आश्रय लेकर मुक्ति मिल सकती है।
भगवान् शिव ,पार्वती के साथ निरन्तर राम नाम जपते हैं।कृष्णं, जो मंगलकारी और अमंगलकारी है-
मंगल भवन अमंगल हारी।
उमा सहित जेहिं जपत पुरारी।।

कहाँ तक कहें, जिस नाम जप के कारण भगवान् गणेश को आदि पूज्यता प्राप्त हो गई-
महिमा जासु जानि गनराउ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।

एक बात सर्वविदित है कि, नाम और नामी में अभेद होता है।
ज्योंही नामस्मरण होता ,त्यों ही नामी के रूप,लीला, गुण,धाम की स्मृति उपस्थित हो जाती है और नामजापक अलौकिक रसमाधुरी में खोकर आत्म विस्मृति को प्राप्त हो जाता है।
यहाँ तक कि भगवत् स्मरण में निरत भक्त के कामक्रोधादि विनष्ट हो जाते हैं, और ऐसा व्यक्ति सभी में अपने प्रभु का दर्शन करने के कारण प्राणी मात्र से वैर-विरोध भूल जाता है-
उमा जे रामचरनरत,
विगत काममदक्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत,
केहिं सन करहिं विरोध।।

नाम जापक व्यक्ति की ,निरन्तर नामजप निरति के कारण,”सर्वं
खलु इदं ब्रह्म ” कीअवधारणा स्थिर होती जाती है।और लगता है भगवान् ने गीता में इसीलिए अनन्यभाव से स्मरण करनेवाले साधु को वचन भी दे डाला है कि, उसके अप्राप्त की प्राप्ति(योग)और प्राप्त वस्तुओं की सुरक्षा (क्षेम) की गारंटी मैं लेता हूँ-

अनन्या: चिन्तयन्तो मां,
ये जना: पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां,
योगक्षेमं वहाम्यहम्।।

अन्त में आदिकवि वाल्मीकि को सन्दर्भित कर गोस्वामी जी ने तो यहाँ तक कह डाला कि उलटा ही नाम का जप करके ,वे महाकवि ब्रह्मवत् पूजनीय हो गये-
उलटा नाम जपत जग जाना।
बालमीकि भये ब्रह्म समाना।।

तब इस कलिकाल में क्या कहें, नाम जप ही मुक्ति का उत्तम साधन सिद्ध होता है-

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव
नास्त्येव गतिरन्यथा।।

इत्यादि पुराणवचनों से इस नाम संकीर्तन प्रकरण को भगवदर्पण
किया जा रहा है। भगवान् साहाय्य हों।

।।हरिश्शरणम्।।

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मोक्ष साधन हेतु मानव शरीर की स्वतंत्रता

मनुष्य शरीर के लिये धर्म, अर्थ, काम (भोग)और मोक्ष इन चारों को चार पुरुषार्थ माना गया है।ये चार अर्थ यानी कि चार प्रयोजनों के लिए मानव शरीर की प्राप्ति ,भगवत् कृपा और स्वयं के प्रारब्ध से हुई मानी गई है।
परन्तु यदि इन प्रयोजनों की गहराई में जायें, तो ऐसा लगता है कि प्रारंभ के तीन प्रयोजनों हेतु, मानव परतन्त्र है, जबकि अन्तिम और चरम प्रयोजन हेतु स्वतंत्र।
एक श्लोक पञ्चतन्त्र में आता है, जिसमें शिशु के गर्भस्थ होते ही पाँच चीजों को स्थिर या निश्चित कर दिया जाता है-

आयु:कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पञ्चैतान्यपि सृज्यन्ते
गर्भस्थस्यैव देहिनः।।

अर्थात् शरीरोत्पत्ति के पूर्व गर्भ में ही पाँच चीजें निश्चित हो जाती हैं-1-आयु,2-कर्म(पेशा)
3-वित्त (चलाचल संपत्ति),4-विद्या(अध्ययन)और 5-निधन।
इस प्रकार उक्त पद्य के आलोक में विचार करें तो चार पुरुषार्थों में ,आचारादि धर्मों का पालन,अर्थादि संपत्ति की प्राप्ति और इसके अनुसार कामोपभोग का निश्चयीकरण यदि पूर्व शरीर द्वारा गर्भ में ही तय हो जाते हैं, तब इनकी प्राप्ति में पूर्वत:परतंत्रता ही मानी जायेगी।
किन्तु मानवीय शरीर मुक्ति(मोक्ष) प्राप्ति में स्वतन्त्र प्रतीत होता है।उत्तर काण्ड में मानसकार ने भगवान् श्री राम के मुख से कहलवाया है-

साधन धाम मोक्ष करि द्वारा।पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।।
सो परत्र दुख पावै
सिर धुनि धुनि पछताइ।
कालहिं कर्महिं ईश्वरहिं
मिथ्या दोष लगाइ।।
एहि तन कर फल विषय न भाई
स्वर्ग-उ स्वल्प अंत दुखदाई।।

जो न तरै भवसागर।
नर समाज अस पाइ।
सो कृत निन्दक मन्दमति।
आत्माहन गति जाइ।।

बाबा तुलसीदास की उक्त पंक्तियों से साफ हो जाता है कि नर तन से ही चरमपुरुषार्थ मोक्ष साध्य है।और इसी अन्तिम पुरुषार्थ में पुरूष की अपनी स्वतंत्रता है कि वह जन्मादि बन्धनमुक्त होना चाहता है अथवा नहीं।

इस बात को गीताशास्त्र में भगवान भी बताते हैं, जब उन्होंने कहा-

कर्मणि एव अधिकार:ते

अर्थात् कर्मणि, इस एकवचन के प्रयोग से प्रतीत होता है कि एक मात्र कर्म, मुक्ति कर्म में ही मानव शरीर की स्वतंत्रता है।

दूसरे क्षण अगली पंक्ति है-

मा फलेषु कदाचन।

अर्थात् अन्य प्राप्तव्य परिणामों(फलों) की प्राप्ति पूर्व शरीर से सुनश्चित होने से उनके लिए परतंत्रता है।

अतः उक्त पर्यालोचन से यह बात उभर कर सामने आई कि मानव शरीर को अर्थ भोगादि ,शरीर संसारादि के लिए नियोजित नहीं करना चाहिए क्योंकि वह तो पूर्व कर्मों से, मिलना ही है।
इस शरीर का चरम फल तो मोक्ष है।भगवान् सहायता करें।

।।हरिश्शरणम्।।

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मानव शरीर -प्राप्ति

मानव शरीर की उपलब्धि कैसै और किन कारणों से हुई, यह विचारणीय विषय है ।
सर्वप्रथम कैसे पर विचार करें तो मानसकार गोस्वामी तुलसीदास जी के उत्तर काण्ड में दृष्टिपात करने पर दो अलग अलग पंक्तियां आती हैं-
बड़े भाग मानुष तन पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन गावा।।

कबहुँक करि करुना नर देही।
देत ईश बिनु हेतु सनेही।।

भाग्य कर्मों के कारण देव दुर्लभ मानव देह मिला है। भाग्य को प्रारब्ध भी कहते हैं। यह प्रारब्ध कर्म , पूर्व शरीर से किया गया कर्म होता है।इसी को अदृष्ट या दूसरे शब्दों में ” दैव ” भी कहा गया है। इस प्रकार मानव शरीर का यह एक कारण हुआ।

दूसरी पंक्ति के अनुसार अकारण करुणावरुणालय भगवान् स्वयं ,अंशी होने के नाते अंश भूत जीव को स्नेहपूर्वक, बिना हेतु मानव शरीर दे देते हैं।

इस प्रकार मानसकार की उक्त पंक्तियों में विरोध सा दीखता है।
एक जगह , मानव शरीर का कारण प्रारब्ध है तो दूसरी जगह ईश्वर।परन्तु ऐसा है,नहीं।इन बातों विरोध नहीं, बल्कि विरोधाभास मात्र है।
क्योंकि विरोध एवं विरोधाभास दोनों पृथक्-पृथक् अर्थ वाले हैं।
इस सन्दर्भ में आचार्य शंङ्कर ने विवेकचूडामणि के प्रारंभ में ही एक बात कही है, जिसका उल्लेख आवश्यक हो जाता है-
दुर्लभं त्रयमेवैतद् देवानुग्रहहेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं
महापुरुषसंश्रय:।।

अर्थात् इस जगत् में तीन चीजें दुर्लभ हैं ,और उनका कारण देव का अनुग्रह(कृपा)मात्र है।वे हैं- मानव शरीर, मोक्षेच्छा और सत्संग ।
इन शांकरी पंक्तियों से भी मनुष्य देह प्राप्ति में ईश्वर का अनुग्रह ही कारणरुप में परिलक्षित होता है।

इस समग्र विरोधाभास का शमन ,गीताशास्त्र की ईश्वरीय वैखरी वाणी से होता है, जब अठारहवें अध्याय में यह बात आई है-

पञ्चैतानि महाबाहो
कारणानि निबोध मे।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि
सिद्धये सर्वकर्मणाम्।।18/13।।

मतलब कि सांख्य शास्त्र में कर्मों का अन्त करने के लिए, सभी कर्मों की सिद्धि(पूर्णता)
हेतु पाँच कारण समूहालम्बीकृत रूप से जानना चाहिए।वे क्या हैं-

अधिष्ठानं तथा कर्ता
करणं च पृथग् विधम्।
विविधाश्च पृथक् चेष्टा:
दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।18/14।।

अधिष्ठान(ईश्वर)एक
कर्ता(स्वयं व्यक्ति)दो
करण(भिन्न उपकरण इन्द्रियादि)तीन
चेष्टाएँ(गमन अंगसंचालनादि)चार
तथा
दैव(प्रारब्ध कर्म) पाँच
इस प्रकार भगवान् ने कर्म की सिद्धि(पूर्णता)में सर्वप्रथम ईश्वर और सबसे अन्त में पाँचवें कारण दैव (भाग्य)को रखा है।
गीतोक्त वाणी के आलोक में मनुष्य शरीर की प्राप्ति के कारणों की मीमांसा करें तो महात्मा तुलसी दास द्वारा परिगणित कारणद्वय में कोई विरोध नहीं दिखाई देता।
विरोध का आभास या प्रतीति होना विरोधाभास है यानी कि विरोध जैसा दीखना, जबकि विरोध कथंचित् नहीं नहीं होता है।
वस्तुत: ईश्वर और भाग्य दोनों ही मानवीय शरीर के कारक सिद्ध होते हैं, क्योंकि मुक्ति की बात इसी शरीर से सोची जा सकती है।
अतः चाहे मानसकार हों ,आचार्य शङ्कर हों अथवा
” गीता माँ ” सभी के कथनों में
मानवीय शरीर मिलने के कारणों में कोई विरोध नहीं है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/09/02/मानव-शरीर-प्राप्ति/