माया शब्द – मा=नहीं , या= जो ,इन्हीं दो वर्णों के योग से विनिर्मित है। इसका शाब्दिक अर्थ हुआ कि, जो नहीं है ,वह माया है।अर्थात् जो जैसी नहीं, किन्तु भ्रम वश वैसी दीखती है,वह ” माया ” है।मतलब कि जो क्षण-क्षण परिवर्तन शील है,वह अस्थिर होने से नामरूप से भी अस्थिर है, अतः एक समय में कुछ और पुनः दूसरे समय दूसरी होने से ही माया नाम से अभिहित की जा रही है।
विवेकचूडामणिकार ने इसे परम पुरुषोत्तम की अव्यक्त शक्ति कहा है। यह अनादि, अविद्या, परा और सत्व-रजस्
तमात्मक है। विवेकीजन इसके कार्यों से ही, इसका अनुमान कर लेते हैं।इसके तीनों गुणों के संघात से ही जगत् का निर्माण हुआ है –
अव्यक्तनाम्नी परमेशशक्ति:
अनाद्यविद्या त्रिगुणात्मिका परा।
कार्यानुमेया सुधियैव माया
यया जगत्सर्वमिदं प्रसूयते।।110।।
अग्रिम पद्य में इसे अनिर्वचनीय कहा गया है। वह न तो सद् है, न असद् है, और न ही सदसद् अर्थात् उभयरूप।इसी तरह वह न भिन्न है न अभिन्न है और न ही भिन्नाभिन्न अर्थात् उभयरूप।इसी प्रकार वह न तो अंगों के सहित, न ही अंगों से रहित और न ही सांगानंग अर्थात् उभयात्मिका ही है।अन्तिम पंक्ति में निर्णय करते हुए कहते हैं कि, वह माया तो महा अद्भुत और वाणी से नहीं कहने योग्य है-
सन्नाप्यसन्नाप्युभमयात्मिका नो
भिन्नाप्यभिन्नाप्युभयात्मिका नो
सांगाप्यनंगाप्युभयात्मिका नो
महाद्भुतानिर्वचनीयरूपा।।111।।
अन्त में कहते हैं कि शुद्ध अद्वय ब्रह्म के बोध से ही इसकी निवृत्ति होगी-जैसै कि अज्ञान वश रस्सी में होने वाला सर्प का भ्रम , ज्ञान की उत्पत्ति के बाद ही नष्ट होता है।सुखदुखमोहादि कार्य इसके प्रसिद्ध सद्रजस्तम
के कारण प्रतीत होते हैं-
शुद्धाद्वयब्रह्मविबोधनाश्या
सर्पभ्रमो रज्जुविवेकतो यथा।
रजस्तम:सत्वमितिप्रसिद्धा
गुणास्तदीया:प्रथितै:स्वकार्यै:
।।112।।
शरीर के ही धर्म, ये बन्धन और मोक्ष ,माया से ही जनित हैं।वस्तुतः आत्मा में नहीं हैं।
जैसै कि क्रियाहीन”रज्जु” में सर्प की प्रतीति होना तन्निवृत्ति भ्रम मात्र है, वास्तविक नहीं-
मायाक्लृप्तौ बन्धमोक्षौ
न स्त:स्वात्मनि वस्तुत:।
यथा रज्जौ निष्क्रियायां
सर्पाभास-विनिर्गमौ।।570।।
।। हरिश्शरणम् ।।
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