माया रचित जगत्

माया शब्द – मा=नहीं , या= जो ,इन्हीं दो वर्णों के योग से विनिर्मित है। इसका शाब्दिक अर्थ हुआ कि, जो नहीं है ,वह माया है।अर्थात् जो जैसी नहीं, किन्तु भ्रम वश वैसी दीखती है,वह ” माया ” है।मतलब कि जो क्षण-क्षण परिवर्तन शील है,वह अस्थिर होने से नामरूप से भी अस्थिर है, अतः एक समय में कुछ और पुनः दूसरे समय दूसरी होने से ही माया नाम से अभिहित की जा रही है।
विवेकचूडामणिकार ने इसे परम पुरुषोत्तम की अव्यक्त शक्ति कहा है। यह अनादि, अविद्या, परा और सत्व-रजस्
तमात्मक है। विवेकीजन इसके कार्यों से ही, इसका अनुमान कर लेते हैं।इसके तीनों गुणों के संघात से ही जगत् का निर्माण हुआ है –

अव्यक्तनाम्नी परमेशशक्ति:
अनाद्यविद्या त्रिगुणात्मिका परा।
कार्यानुमेया सुधियैव माया
यया जगत्सर्वमिदं प्रसूयते।।110।।

अग्रिम पद्य में इसे अनिर्वचनीय कहा गया है। वह न तो सद् है, न असद् है, और न ही सदसद् अर्थात् उभयरूप।इसी तरह वह न भिन्न है न अभिन्न है और न ही भिन्नाभिन्न अर्थात् उभयरूप।इसी प्रकार वह न तो अंगों के सहित, न ही अंगों से रहित और न ही सांगानंग अर्थात् उभयात्मिका ही है।अन्तिम पंक्ति में निर्णय करते हुए कहते हैं कि, वह माया तो महा अद्भुत और वाणी से नहीं कहने योग्य है-

सन्नाप्यसन्नाप्युभमयात्मिका नो
भिन्नाप्यभिन्नाप्युभयात्मिका नो
सांगाप्यनंगाप्युभयात्मिका नो
महाद्भुतानिर्वचनीयरूपा।।111।।

अन्त में कहते हैं कि शुद्ध अद्वय ब्रह्म के बोध से ही इसकी निवृत्ति होगी-जैसै कि अज्ञान वश रस्सी में होने वाला सर्प का भ्रम , ज्ञान की उत्पत्ति के बाद ही नष्ट होता है।सुखदुखमोहादि कार्य इसके प्रसिद्ध सद्रजस्तम
के कारण प्रतीत होते हैं-

शुद्धाद्वयब्रह्मविबोधनाश्या
सर्पभ्रमो रज्जुविवेकतो यथा।
रजस्तम:सत्वमितिप्रसिद्धा
गुणास्तदीया:प्रथितै:स्वकार्यै:
।।112।।

शरीर के ही धर्म, ये बन्धन और मोक्ष ,माया से ही जनित हैं।वस्तुतः आत्मा में नहीं हैं।
जैसै कि क्रियाहीन”रज्जु” में सर्प की प्रतीति होना तन्निवृत्ति भ्रम मात्र है, वास्तविक नहीं-

मायाक्लृप्तौ बन्धमोक्षौ
न स्त:स्वात्मनि वस्तुत:।
यथा रज्जौ निष्क्रियायां
सर्पाभास-विनिर्गमौ।।570।।

।। हरिश्शरणम् ।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/08/10/माया-रचित-जगत्/

सूक्ष्म शरीर-गुण एवं कारणशरीर

स्थूल शरीर का विवेचन करने के उपरान्त विवेकचूडामणि-कार ने सूक्ष्म शरीर और उसमें व्याप्त गुणों का वर्णन किया है।
(वाक्-पायू-पस्थ-हस्त-पाद) पाँच कर्मेन्द्रियों, (श्रोत्र-त्वक्-चक्षुषी-जिह्वा-नासिका) इन पाँच ज्ञानेन्द्रियों ,(प्राणापान-समान-व्यानोदान)पञ्च प्राणों,(क्षिति-जल-पावक-गगन-समीर) पञ्च महाभूतों, अन्त:करण चतुष्टय, अविद्या, काम और कर्म का संघात सूक्ष्म शरीर कहा जाता है।

वागादि पञ्च श्रवणादि पञ्च
प्राणादि पञ्चाभ्रमुखानि पञ्च।
बुध्याद्यविद्यापि च कामकर्मणी
पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीरमाहु:।।98।।
इसे सूक्ष्म या लिंगशरीर भी कहा गया है, जो वासनात्मक कर्मफलों को अनुभव कराने वाला है।अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं होने से, यह आत्मा की अनादि उपाधि है-
इदं शरीरं शृणु सूक्षमसंज्ञितं
लिंगं त्वपंचीकृतभूतसंभवम्।
स-वासनं कर्मफलानुभावकं
स्वज्ञानतोनादिरुपाधिरात्मन:।।।99।।

स्वप्न इसकी अभिव्यक्ति की अवस्था है।जिसमें यह स्वयं अवशिष्ट मात्र अवभासित होता है।इस स्वप्न में स्वयं प्रकाश परात्मा शुद्ध चेतन ही विभिन्न पदार्थों के रूप में दृश्यमान होता है।इसमें जाग्रत् कालिक नाना अवस्थाओं के कारण, बुद्धि, कर्ता-भोक्ता भावों को प्राप्त होकर स्वयं प्रतीत होती है।

स्वप्नो भवत्यस्य विभक्त्यवस्था
स्वमात्रशेषेण विभाति यत्र।
स्वप्ने तु बुद्धि:स्वयमेव जाग्रत्-
कालीननानाविधवासनाभि:।
कर्त्रादिभावं प्रतिपद्य राजते
यत्र स्वयं ज्योतिरयं परात्मा।।100।।

शरीर के अन्दर इन इन्द्रियों में चिद् के आभास से व्याप्त अन्त:करण अभिमान के रूप में स्थित रहता है।सत्वादि गुणों के योग से यही त्रिविधावस्था को प्राप्त होता है-

अहङ्कार:स विज्ञेयः
कर्ताभोक्ताभिमान्ययम्।
सत्वादिगुणयोगेन
चावस्थात्रयमश्नुते।।105।।

बन्धन में पड़ा हुआ यह अहंकार
ही तीनों गुणों में आसंग से जनन-मरण क्रम धारण करता है।गुणों का स्वरूप इस प्रकार है-

रजोगुण में काम,क्रोध, लोभ, दम्भ,असूया(गुणों में भी दोषदृष्टि),अभिमान, ईर्ष्या और
मात्सर्य-ये सभी होते हैं।इससे प्रवृत्त”अहंभाव”संसार बन्ध का कारण है-

काम:क्रोधो लोभदम्भाद्यसूया-
हंकारेर्ष्यामत्सराद्या: तु घोरा:।
धर्मा एते राजसा: पुम्प्रवृत्ति:
यस्मादेषा तद्रजो बन्धहेतु:।।114।।

जन्म-मरण का आदि कारण ,जो विक्षेप शक्ति(नाना विषयों में चित्त को फेंकने वाली)के प्रसार का कारण है, तमोगुण कहा गया है।इसके कारण ही वस्तु कुछ की कुछ दीखने लगती है और यही आवरण शक्ति(आत्मस्वरूप को ढँकने वाली) की भी मूल है।

एषा वृत्तर्नाम तमोगुणस्य
शक्तिर्यया वस्त्ववभासतेन्यथा।
सैषा निदानं पुरुषस्य संसृते:
विक्षेपशक्ते:प्रसरस्य हेतु:।।115।।

इसमें अज्ञान, आलस्य,जडता, प्रमाद,मूढता, आदि रहते हैं।इससे युक्त मनुष्य कुछ नहीं समझता और निद्रालु या स्तम्भवत् जड बना रहता है-

अज्ञानमालस्यजडत्वनिद्रा-
प्रमादमूढत्वमुखा: तमोगुणा:।
एतै:प्रयुक्तो न हि वेत्ति किंचित्
निद्रालुवत्स्तम्भवदेव तिष्ठति।।118।।

इस प्रकार रजोगुण बद्ध शरीर का वर्णन करने के बाद आचार्य ने सत्वगुण के धर्म बताये हैं।
यह सत्वगुण जल के समान शुद्ध है, किन्तु रज-तम से मिलकर प्रवृति उत्पन्न करता है।
सत्वं विशुद्धं जलवत्तथापि
ताभ्यां मिलित्वा सरणाय कल्पते
मिश्रस्य सत्वस्य भवन्ति धर्मा-
स्त्वमानिताद्या नियमा यमाद्या:।
श्रद्धा च भक्तिश्च मुमुक्षता च
दैवी च सम्पत्तिरसन्निवृत्ति:।।119/120।।
इसके कारण अमानित्व ,यम-नियमादि, श्रद्धा, भक्ति,मुमुक्षता,दैवी सम्पत्ति और असत् के त्याग की स्थिति होती है।किन्तु इसमें रजस्तम का मिश्रण अवश्य रहता है।

इस प्रकार त्रिविध गुणों के संधात से निर्मित शरीर इन्द्रियादि विषयासक्त होकर ,अहंकार वश जन्मता मरता है।
ये सभी प्रकृति के भी गुण हैं, जिसे अव्यक्त की संज्ञा दी गई है।त्रिविध गुणों से युक्त प्रकृति ही आत्मा का “कारण शरीर”है।
इसकी अभिव्यक्ति की अवस्था”सुषुप्ति’ है, जिसमें बुद्धि की सम्पूर्ण वृत्तियाँ लीन हो जाती हैं,बीज रूप से स्थिर रहती हैं-

अव्यक्तमेतत्त्रिगुणैर्निरुक्तं
तत्कारणं नाम शरीरमात्मन:।
सुषुप्तिरेतस्य विभक्त्यवस्था
प्रलीनसर्वेन्द्रियबुद्धिवृत्ति:।।122।।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/08/09/सूक्ष्म-शरीर-गुण-एवं-कारण/

स्थूल शरीर और इन्द्रियाँ

आचार्य शङ्कर ने विवेकचूडामणि में मानव के स्थूल शरीर और इन्द्रियों का सम्यग् विवेचन किया है, जिसमें आत्म बुद्धि होकर ,वह भव-बन्ध में जकड़ा रहता है।
ऋषियों ने इस शरीर में आसक्त मानव जीव को सावधान करते हुए कहा-
सर्वोपि वाह्यसंसार:
पुरूषस्य यदाश्रय:।
विद्धि देहमिदं स्थूलं
गृहवद् गृहमेधिन:।।92।।
जिसके आश्रयण से जीवात्मा को समस्त वाह्य जगत् की प्रतीति होती है, वही उस गृहस्थ के घर की तरह, उसकी स्थूल देह है।इसी स्थूल देह के ही जन्म, जरा ,मरण,स्थूलता आदि विक्रियायें हैं।शिशु आदि अवस्थायें हैं ,वर्णाश्रमादि अनेक यम और नियम हैं।इसी की पूजा
मानापमान आदि विषेताएं हैं-
स्थूलस्य सम्भवजरा-
मरणानि धर्मा:।स्थौल्यादयो
बहुविधा:शिशुताद्यवस्था:।
वर्णाश्रमादिनियमा बहुधा
यमा: स्यु: ।पूजावमानबहु-
मानमुखा: विशेषा: ।।93।।
त्वचा, मांस, रूधिर, स्नायु, मेद,मज्जा और अस्थियों के समूह इस शरीर में मलमूत्रादि भरे रहते हैं, जिससे यह शरीर, निन्द्य कहा जाता है-
त्वङ्मांसरूधिरस्नायु-
मेदोमज्जास्थिसंकुलम्।
पूर्णं मूत्रपुरीषाभ्यां
स्थूलं निन्द्यमिदं वपुः।।89।।
इसी शरीर में पांच ज्ञान इन्द्रियाँ- श्रवण, त्वचा, नेत्र, घ्राण और जिह्वा तथा पांच कर्म इन्द्रियाँ-वाक् ,पाणि,पाद,गुदा और उपस्थ ये सभी होती हैं।इन्हीं से विषयों का ज्ञान होता है।
बुद्धीन्द्रियाणि श्रवणं त्वगक्षि घ्राणं च जिह्वा विषयावबोधनात्
वाक्पाणिपादं गुदमप्युपस्थ:
कर्मेन्द्रियाणि प्रणवेन कर्मसु।।94।।
इसी में प्राण वृत्ति अपने अन्य विकारों-अपान ,व्यान ,उदान और समान के साथ सूक्ष्म रूप से रहती है, जिससे शरीर का संचालन सम्यग् रूप से होता है।
और भी सूक्ष्यमेन्द्रियाँ वृत्ति रूप में इसी स्थूल शरीर में रहती हैं, जिन्हें अन्तरिन्द्रिय या अन्त:करणचतुष्टय कहा गया है-ये हैं -मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार।संकल्प-विकल्प के कारण मन, पदार्थ का निर्णय/निश्चय करने के कारण बुद्धि ,अहम्-अहम् ऐसा इस शरीर को ही मान लेने से अहंकार तथा अपने इष्ट अभीष्ट अभिलाष चिन्तन के कारण चित्त कहा जाता है-
निगद्यतेन्त:करणं मनोधी:अहंकृति:चित्तमिति स्ववृत्तिभि:।मन:तु संकल्प-विकल्पनादिभि:बुद्धि:पदार्थ-अध्यवसाय-धर्मत:।।95।।
अत्राभिमानाद् अहमित्यहं-
कृति:,स्वार्थानुसन्धान-
गुणेन चित्तम् ।।96।।
ऐसे देहेन्द्रिय,विषयों में आसक्त, स्वस्वभावानुसार एक से एक बँधे हुए जीवादि-हरिण,हाथी, पतंग, मछली औरभ्रमरादि सभी प्रतिपल मृत्यु को प्राप्त होते रहते हैं।तब शब्द, स्पर्श, रूप,रस,गन्ध पाँच विषयों में जकड़ा हुआ मनुष्य कैसे बच सकता है-
शब्दादिभि:पञ्च भिरेव पञ्च
पञ्चत्वमापु: स्वगुणेन बद्धा:।
कुरङ्गमातङ्गपतङ्गमीन-
भृङ्गा नर:पञ्च भिरञ्चित: किम् ।।78 ।।
।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com

मोक्ष(निर्वाण) हेतु विचार

आदि शङ्कर ने विवेकचूडामणि में मोक्ष के साधनों पर गहन विमर्श किया है। ब्रह्म का सत्यत्व और जगत् का मिथ्यात्व नित्यानित्य वस्तु विवेक कहा गया है और यही प्रथम हेतु है-
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या
इति एवं रूपो विनिश्चय:
सोयं नित्यानित्यवस्तुविवेक:
समुदाहृत:।।20।।

इसके बाद “वैराग्य”की उत्पत्ति होती है।दर्शन और श्रवणादि इन्द्रियों द्वारा देह से लेकर ब्रह्म लोक पर्यन्त अनित्य भोग्य पदार्थों में घृणा बुद्धि होना ही”वैराग्य”है-

तद् वैराग्यं जगुप्सा या
दर्शनश्रवणादिभि:।
देहादिब्रह्मपर्यन्ते हि
अनित्ये भोगवस्तुनि।।21।

तदनन्तर शम,दम ,उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान पूर्वक आसक्ति युक्त कर्मों का सर्वथा त्याग करना चाहिए।

शम-बारम्बार विषयों में दोषदृष्टि करने से, विषय समूह से विरक्त होकर चित्त का अपने लक्ष्य में स्थिर होना’शम’है।
विरज्य विषयव्रताद्
दोषदृष्ट्या मुहुर्मुहुः
स्वलक्ष्ये नियतावस्था
मनस: शम उच्यते।।22।।

इसी तरह पाँचों कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों को उनके-उनके विषयों से अलग करके अपने-अपने गोलकों में स्थित करना “दम” कहा गया।और वृत्ति का वाह्य विषयों का आश्रयण न करना ” उपरति “है ।

विषयेभ्य: परावर्त्य
स्थापनं स्व-स्व-गोलके
उभयेषामिन्द्रियाणां स
दम: परिकीर्तित: ।
वाह्यालम्बनं वृत्ते:
एषा उपरति:उत्तमा ।।23/24।।

आगे के क्रम में तितिक्षा है,जिसमें चिन्ता-शोक से रहित होकर विना किसी प्रतीकार के समस्त कष्टों को सहना पड़ता है-
सहनं सर्वदुःखानाम्
अप्रतीकारपूर्वकम्।
चिन्ता-विलापरहितं सा
तितिक्षा निगद्यते।।25।।

गुरवाक्यों और शास्त्र में सत्यत्व बुद्धि रखना, इसी को सज्जनों ने ” श्रद्धा ” कहा है।

शास्त्रस्य गुरूवाक्यस्य
सत्यबुद्ध्यावधारणम्।
सा श्रद्धा कथिता सद्भि:
यया वस्तूपलभ्यते।।26।।
सर्वदा स्थापनं बुद्धे:
शुद्धे ब्रह्मणि सर्वथा।
तत्ममाधानमित्युक्तं
न तु चित्तस्य लालनम्।।27।।

इस तरह अपनी बुद्धि में सभी प्रकार शुद्ध ब्रह्म में ही सदा स्थिरावस्थ होना,” समाधान” है।

उपर्युक्त शमदमोपरतितितिक्षा-श्रद्धासमाधान को वेदान्त शास्त्र के विद्वानों ने “षट्कसम्-पत्ति “कहा है।
ऐसे साधनों का अवम्बनकर्ता वास्तव में मुमुक्षु और निर्वाण सुख का अधिकारी है-

तत: श्रुति: तन्मननं सतत्वध्यानं चिरं नित्य-
निरन्तरं मुने: ।
ततोविकल्पं परमेत्य
विद्वान् इहैव निर्वाण-
सुखं समृच्छति।।72।।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com

अहंकार

आदि शङ्कर-पाद ने “विवेकचूडामणि”में अहंकार का स्वरूपानुसन्धान किया है।अजन्मा, नित्य, शुद्ध, बुद्ध,चैतन्यात्मा, जो कि परमात्मा अंशी का अंश मात्र है, सदा कूटस्थ, अविचल, आकाश शरीरस्वरुप से अभिन्न ही है।
वे कहते हैं कि वागादि पांच कर्मेन्द्रियाँ, श्रवणादि पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राणों सहित पञ्च प्राण, आकाशादि पञ्च महाभूत, बुद्धि आदि अन्त:करण चतुष्टय, अविद्या-काम और कर्म ये ही मिलकर”पुर्यष्टक” अथवा सूक्ष्म शरीर कहे जाते हैं।
वागादि पञ्च श्रवणादिपञ्च
प्राणादिपञ्चाभ्रमुखानि पञ्च।
बुध्याद्यविद्यापि च कामकर्मणी
पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीरमाहु:।
यह सूक्ष्म या लिंगशरीर अपंचीकृत भूतों से उत्पन्न हुआ है।यही वासनात्मक होकर कर्मफलों का अनुभोक्ता और अनुभावक है।
शरीर के अन्दर चक्षु आदि इन्द्रिय के गोलकों में चिदाभास के तेजसे व्याप्त हुआ अन्त:करण ही “मैं पन ” का आभास करता हुआ स्थित रहता है।
अन्त:करणमेतेषु
चक्षुरादिषु वर्ष्मणि ।
अहमित्यभिमानेन
तिष्ठत्याभासतेजसा।।105।।
इसी को अहंकार जाने।यही कर्ता, भोक्ता तथा मैं पन का अभिमान कराने वाला है और सत्वादि गुणों से त्रिविधावस्था को प्राप्त होता है।
अन्तिम बात इसके लिये आचार्य ने कहा-
विषयाणामानुकूल्ये
सुखी दु:खी विपर्यये ।
सुखं दु:खं च तद्धर्म:
सदानन्दस्य नात्मन।।1०7।।
यही अहंकार विषयों की अनुकूलता-प्रतिकूलता में सुखी-दु:खी होता रहता है।सुख और दुख इसी अहंकार के धर्म हैं।नित्यानन्द स्वरूप आत्मा के कदापि नहीं।
।।हरिश्शरणम्।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com

दुर्लभ-त्रय

भगवत्पाद आदि शङ्कराचार्य ने तीन चीजें को अत्यन्त दुर्लभ कहा है। “विवेकचूडामणि”नामक ग्रन्थ में उन्होंने उक्ति है-
दुर्लभं त्रयमेवैतद्
देवानुग्रहहेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं
महापुरुषसंश्रय:।।3।।

अर्थात् इस संसार में तीन दुर्लभ तत्व हैं-पहला मनुष्य योनि में जन्म, दूसरा संसार बन्ध से मुक्ति की कामना और तीसरा सत्पुरुषों का आश्रयण।
इन तीनों की प्राप्ति भी तभी सम्भव होती है, जब देवता गुरु का अनुग्रह प्राप्त हो।
आगे आचार्य पुनः इसी की पुष्टि करते हैं-
लब्ध्वा कथञ्चिन्नरजन्म
दुर्लभं
तत्रापि पुंस्त्वं श्रुतिपारदर्शनम्।
य:स्वात्ममुक्तौ न यतेत मूढधी:
स हि आत्महा स्वं विनिहन्ति
असद्ग्रहात्।।4।।

किसी प्रकार इस दुर्लभ मनुष्य जन्म को पाकर और उसमें भी,जिसमें वेदादि सिद्धान्तों का ज्ञान होता है ऐसा पुरुषत्व पाकर जो मूढबुद्धि अपने आत्मा की मुक्ति के लिए प्रयत्न नहीं करता, वह असद् में आस्था रखने के कारण स्वयं को नष्ट करता है।
यह मुक्ति कामना और सम्यक् तत्वावबोध,आत्मानात्म का विवेक, जो समस्त प्रतीतियों का चरम साक्षी “आत्मा” है, उसका अनुभव तथा आत्मा के विषय होने वाले “अनात्मा”का ज्ञान,देवगुरु कृपया ही प्राप्त होता है।वे कहते हैं-
अतो विमुक्त्यै प्रयतेत विद्वान्
संन्यस्तबाह्यार्थसुखस्पृह:सन्।
सन्तं महान्तं समुपेत्य देशिकं
तेनोपदिष्टार्थसमाहितात्मा।।3।।

इसीलिये मुमुक्षु विद्वान् वाह्य भोगीवृत्ति त्याग कर सन्त शिरोमणि गुरु-देव के शरणागत होकर, उनके उपदेश किये हुए विषयों में समाहित चित्त से मुक्ति हेतु प्रयत्न करे।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com

भाव ही सर्वश्रेष्ठ

आज मन में यह भाव आया कि,यह भाव क्या है। शाब्दिक दृष्टि से इसमें “भू ” धातु है, जिसका अर्थ सत्ता या अस्तित्व है।हमारी समझ में यह मानव प्राणी ही है, जिसमें अस्तित्व बोध होता है। ऐसा भाव मनुष्य में ही आता है, क्योंकि यह केवल भोग योनि नहीं, प्रत्युत कर्म योनि भी है। भू : भवनं भाव: भावनम् इत्यादि अपना(मानव) अस्तित्व विचार करने और तदनुकूल मानवीय गुणों को आत्मसात् करने के लिए झकझोरते हैं ।इसीलिये कहा भी गया-
यादृशी भावना यस्य
सिद्धि: भवति तादृशी।।
जाकी रही भावना जैसी।
प्रभु मूरति देखी तिन तैसी।।
न काष्ठे विद्यते देवो
न पाषाणे न हिरण्मये।
भावे हि विद्यते देवो
तस्माद् भावावलम्बनम्।।
तात्पर्यत: किसी काष्ठ, पाषाण या स्वर्ण मयी मूर्ति में देवता नहीं हैं, बल्कि हमारी अपनी भावना में ही देवत्व है ,इसलिये भाव का अवलम्बन ही सर्वश्रेष्ठ है।हम मनुष्य हैं ,हमें मानवता पूर्ण ही व्यवहार करना चाहिए।
वस्तुतः मानव जीवन में भाव या भावना ही है, जो उसे लौकिक/अलौकिक अवस्थान की प्राप्ति कराती है। इसलिए क्रान्तदर्शी कवि का भाव शब्दों की मूर्ति बन गया-
भरा नहीं जो भावों से
बहती जिसमें रसधार नहीं
वह हृदय नहीं वह पत्थर है
जिसमें स्व-देश से प्यार नहीं।
जिसको स्व – अपने ,अपनी आत्मा से प्यार नहीं वह चेतनात्मा नहीं बल्कि परिवर्तन शील/जड़ प्रकृति मात्र गुणों से प्रेम करनेवाला “पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम् ” की श्रेणी में रहने वाला है।
।।हरिश्शरणम्।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com

निष्काम कर्म

द्वितीयाध्याय गीता में भगवान् ने निष्काम कर्म का बड़ा सुन्दर सन्देश दिया है।यह श्लोक अत्यन्त प्रसिद्ध है-
कर्मणि एव अधिकार: ते
मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफल-हेतुः भू
मा ते संङ्ग: अस्तु अकर्माणि।।
अर्थात् कर्तव्य कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है।फलों में कभी नहीं।कर्मफल का हेतु मत बनो।अकर्म में भी आसक्ति न हो।
“कर्मणि एव अधिकार:” तत्वतः मानवेतर योनियों को नवीन कर्म की स्वतंत्रता नहीं है।मानव योनि कर्मयोनि है और अन्य योनियां भोगयोनि मात्र।देवदुर्लभ मानव शरीर द्वारा पुरातन कर्मों का फलभोग और नवीन कर्मों से पुरुषार्थ होता है।कीट-पतंग, पशु-पक्षी, देवता ब्रह्म लोक तक की योनियां भोग योनियां हैं।उनके लिये-“ऐसा करो ,ऐसा न करो “का विधि-निषेध नहीं है।जब कि मनुष्य विधि निषेध पूर्वक प्रारब्ध फल भोगते हुए, नवीन कर्म करने में स्वतंत्र होने से आत्मोद्धार में में भी स्वतंत्र है।
“मा फलेषु कदाचन” मतलब कि कर्मफलों में किंचित् अधिकार नहीं।तात्पर्य ये कि, फलेच्छ कर्म करने पर जन्म-मृत्यु रूप बन्धन प्राप्त होगा( फले सक्तो निबध्यते-5/12)।फलेच्छा अर्थात् भोक्तृत्व पर कर्तव्य टिका हुआ है और फलेच्छा मिटने से कर्तृत्व मिटेगा,जिससे मनुष्य कर्म करता हुआ भी नहीं बंधेगा।”फल में तेरा अधिकार नहीं” इसका स्वारस्य ये भी है कि, मनुष्य को यह स्वतंत्रता है कि वह फल के साथ अपना सम्बन्ध चाहे जोड़े या नहीं, इसमें वह स्वतंत्र है।
जब कर्म अनित्य हैं, तब उनका फल भी अनित्य है।अनित्य से नित्य मिलेगा नहीं।ऐसा समझ लेने पर निष्काम कर्मता आ जायेगी शनैः शनैः।
“मा कर्मफल-हेतु: भू ”
मतलब कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन ,बुद्धि आदि कर्मसामग्री के साथ ईषन्मात्र ममता न हो,क्योंकि ऐसा होने पर वह कर्म फलों का हेतु बन जायेंगीं।
(केवलैरिन्द्रियैरपि….. संगं त्यक्त्वा आत्मबुद्धये )में यही बात कही गई है।
“मा ते संग:अस्तु अकर्माणि ”
अर्थात् कर्म न करने में आसक्ति होगी नहीं, बल्कि स्वस्वभाव से प्रकृत्या आलस्य-प्रमादादि होंगे ही, जो तमोगुणात्मक भोग सुख की अनुभूति करायेंगे, अतः बन्धन भी होगा।इसलिये परिवर्तन शील वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, क्रिया,घटना अवस्था, स्थूल-कारण-सूक्ष्म-कारण शरीर के साथ सथ साधक को निर्लिप्त भाव से रहना चाहिए।
श्लोक के प्रथम-तृतीय पाद में समानता है-कर्म करने में ही अधिकार तथा कर्म न करने में अनासक्ति।
इसी प्रकार द्वितीय-चतुर्थ में-क्रमशः फलेच्छा निषेध और फल-हेतु बनने का निषेध।
तात्पर्यत: अकर्म में रूचि होने से प्रमादालस्य(तामस),कर्म तथा कर्मफलों में रूचि से(राजस)एवं इन सभी में रूचि न होने पर विवेक पूर्वक कर्मस्पृहा रहने पर सुखानुभूति के प्रकाश से(सात्त्विक)भावों के साथ सम्बन्ध बनता है।यही गुण-कर्म सम्बन्ध बन्ध कारक है।
अतः साधक को कर्म ,कर्मफल और त्याग सुखों में से किसी भी एक के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिए।यही निष्काम कर्म का विवेचन है।
।।हरिश्शरणम्।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com

भक्त लक्षण

गीता के बारहवें अध्याय में 13 से लेकर 19 श्लोकों तक भगवान् ने भक्त का स्वरूप बताया है-
अद्वेष्टा सर्वभूतानां
मैत्र: करुण एव च।
निर्ममो निरहंकार:
समदुःखसुखः क्षमी।।१३।।
सन्तुष्ट: सततं योगी
यतात्मा दृढनिश्चय:।
मयि अर्पितमनोबुद्धि:
यो मद्भक्त:स मे प्रिय:।।14।।

जो मनुष्य सभी से घृणा रहित, सभी से नि:स्वार्थ मैत्री करनेवाला, करूणा पूर्ण,अपने पन से रहित, मैं-मेरे की भावना से रहित, सुख दुःख में समान, क्षमाशील,सतत सन्तुष्ट, भगवद् ध्यान परायण, मन इन्द्रियों सहित शरीर को वश में करनेवाला, वज्र संकल्प वाला, मुझमें अर्पित मन और बुद्धि वाला है, वही मेरा भक्त है।

आगे कहते हैं –
यस्मान्नोद्विजते लोक:
लोकान्नोद्विजते च य:।
हर्षामर्षभयोद्वेगै: मुक्त:
य: स च मे प्रिय:।।15।।
अनपेक्षः शुचिः दक्ष:
उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी
यो मद्भक्त:स मे प्रिय:।।16।।

अर्थात् जिससे कोई जीव क्षुब्ध नहीं होता तथा जो स्वयं भी किसी जीव से क्षुब्ध नहीं होता, जो हर्ष -ईर्ष्या, भय-क्षोभ आदि से सर्वथा रहित है, वह मुझे प्रिय है।
किसी की अपेक्षा-उपेक्षा से शून्य, वाह्याभ्यन्तर पवित्र, कुशल, तटस्थ ,व्यथा शून्य,सभी कर्मों में कर्तापने के अभिमान से रहित है, वह मेरा प्रिय है।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि
न शोचति न कांक्षति।
शुभाशुभ-परित्यागी
भक्तिमान् य:स मे प्रिय:।।17।।

जो इष्ट प्राप्ति और अनिष्ट आगमन से कभी प्रसन्न नहीं होता, किसी वस्तु-व्यक्ति द्वेष नहीं करता, अनिष्टानिष्ट की प्राप्ति-वियोग में शोक नहीं करता, अप्राप्त वस्तु-व्यक्ति की इच्छा भी नहीं करता, शुभाशुभ कर्मों के फलों का समग्र त्याग करनेवाला है, वह भक्त मुझे प्रिय है।
अन्तिम दो श्लोकों में उपसंहार करते हैं-

सम:शत्रौ च मित्रे च
तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु
सम:संगविवर्जित:।।18।।
तुल्यनिन्दात्मस्तुतिर्मौनी
सन्तुष्टो येन केनचित्।
अनिकेत:स्थिरमति:
भक्तिमान्मे प्रियो नर:।।19।।

अर्थात् जो शत्रु-मित्र को समान आदर देना वाला, मानापमान में समान भाव वाला, शीतोष्णसुख
और दुखों में एक जैसा, सारे सांसारिक पदार्थों में अनासक्त, निन्दा-स्तुति काल में समान रहने वाला ,किसी भी वस्तुस्थिति में सन्तुष्ट रहनेवाला,निवास स्थान में ममता आकर्षण से शून्य, निश्चल बुद्धि से मेरा भजन करनेवाला, मनुष्य मुझे प्रिय है।

इस प्रकार हर परिस्थिति में सन्तुष्ट ,संसार में रहकर भी संसार भाव से असंग रहनेवाला,भगवान् की समस्त समष्टि में उन्हें देखकर व्यवहार करनेवाला मनुष्य भगवान् को प्रिय है।वही सच्चा भक्त है, क्योंकि उसका भजन-पूजन सांसारिक वस्तु-व्यक्ति के लिये नहीं होता।अभ्यास और भगवत् कृपा से ऐसी स्थिति प्राप्तव्य है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com