वेद हमारे ऋषियों की तप:प्राप्त चेतना के ब्रह्माण्डीय ज्ञान के आधार हैं। वैदिक ऋषियों को वेदमंत्रों का द्रष्टा कहा गया है, स्रष्टा नहीं-ऋषियो मन्त्रद्रष्टार:
इन वेदों ने मानव सभ्यता का संवाहक बन भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक सभ्यता को ज्ञान के आलोक से ऐसा मार्ग दिखाया है, जिससे मानव मात्र के समग्र कल्याण का पथ प्रशस्त किया।
वेदों के साथ उनके छ:अंगों का भी बड़ा महत्व है।शास्त्रज्ञ जनों के अनुसार- छन्द:शास्त्र, कल्पशास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, निरुक्त, शिक्षाऔर व्याकरण, इन्हीं को क्रमशः वेद के पैर, हाथ, नेत्र, कान ,नासिका तथा मुख कहा गया है।
इस प्रकार देखें तो वेद अर्थात् वेदार्थ जानने के लिये उक्त अंगों का ज्ञान आवश्यक है।
इसके छ:अंगों में से एक अंग ज्योतिष शास्त्र है।इसके द्वारा हम समग्र ब्रह्माण्ड पर पड़ने वाले सूर्यादि ग्रहों और नक्षत्रों के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।
इस शास्त्र के दो पक्षों में से गणितपक्ष सम्पूर्ण जगत् की काल गणना का मौलिक आधार है।पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणियों पर होनेवाले प्रभावों को इसी के द्वारा आनुमानिक दृष्टि से जाना जाता है।
दूसरे शब्दों में प्रकृति या सृष्टि के सभी अंग-प्रत्यंग परस्पर जुड़े होने से एक दूसरे पर प्रभाव डालते हैं।परस्पर आदान-प्रदान ही ब्रह्मांड की संतुलित लयबद्धता का मूलाधार है।
ज्योतिष शास्त्र के द्वारा ग्रहों के प्रभाव से मनुष्य की समस्त क्रिया-प्रक्रिया भी जानी जाती है।हमारी अवधारणा में किसी ग्रहादि में कृपा-कोप का कोई भाव नहीं होता,वे केवल धनात्मक-ऋणात्मक किरणें उत्सर्जित करते हैं।
मानव जाति को ये कोई लाभालाभ नहीं पहुँचाते, बल्कि उसके द्वारा अतीत में किये गये कार्य-कारण का सन्तुलन स्थापित करने के लिए वाह्य स्तर पर एक कार्यप्रणाली का विधिवत् माध्यम प्रस्तुत करते हैं।
जातक ऐसे दिन और समय में पैदा होता है, जब ग्रहनक्षत्रों की किरणें उसके पूर्व शरीर के कर्मों के साथ सम्पूर्ण तालमेल बैठाती हैं।उसकी जन्मकुण्डली उसके अतीत के कारणों के द्वारा संभावित अपरिवर्तनीय परिणामों को दर्शाने वाला एक महत्वपूर्ण आलेख होता है।किन्तु जन्मकुण्डली का सही प्रतिफलन केवल अन्त:प्रज्ञा से सम्पन्न व्यक्ति ही प्रस्तुत कर सकते हैं।और ऐसे लोग नगण्य हैं।
जन्म के क्षण में अन्तरिक्ष में स्पष्ट हो जाने वाले आदेश/प्रत्यादेशों का लक्ष्य, गत कर्मों(प्रारब्ध)के फलों को अति महत्व नहीं देना है।वरन् विश्व नियमोंके इन बन्धनों से मुक्ति हेतु मनुष्य की इच्छा शक्ति को को जगाना है।
ज्योतिष शास्त्र के प्रति अन्धश्रद्धा व्यक्ति को यन्त्र की तरह बना देती है जो अपने हर कार्य के लिए यांत्रिक मार्गदर्शन का दास बन जाता है।
जबकि विवेकवान् व्यक्ति सृष्टि(प्रकृति)के बदले स्रष्टा(प्रकृति के अध्यक्ष परमात्मा)में अपनी निष्ठा रखकर अपने ग्रहों के आगामी फलों को परिवर्तित कर सकता है।शनैः शनैः जितना अधिक परमात्मा के साथ अपनी एकात्मता का उसे बोध होता है, उतना ही अधिक प्रकृति का उस पर प्रभाव कम होता है।
आत्मा सदैव मुक्त है, वह अमर है वह अजन्मा है।
उस पर ग्रहादि शासन नहीं कर सकते।
जब मनुष्य यह जानने में समर्थ हो जाता है कि वह आत्मा है, शरीर नहीं, तब वह ग्रह नक्षत्रों के विवशताकारी योगों कुयोगों को पीछे छोड़ देता है।
जब तक आत्मिक विस्मति की साधारण अवस्था में वह किं कर्तव्य विमूढ बना रहता है, तभी तक प्रकृति के विधि नियम की सूक्ष्म जंजीरों में बँधा रहता है।
ईश्वर तो स्वयं सामंजस्य है, उसके साथ अपना सुर मिलाने पर, मनुष्य कोई अनुचित क्रिया कलाप नहीं करेगा, बल्कि उसके सारे कार्य ही ज्योतिषीय नियमों के अनुकूल सही समय पर होंगे।
गहन प्रार्थना और ध्यान के बाद वह स्वयं की दिव्य चेतना के सम्पर्क में आ जाता है ,और आन्तरिक सुरक्षा के बढ़कर अन्य कोई शक्ति नहीं, जो उसके अन्तस् में विद्यमान है।
” कस्तूरी कुंडल बसै मृग ढूँढ़ै
वन माँहिं ऐसे घट घट राम हैं ,
दुनियाँ देखै नाहिं। ”
नारायण! यदि पूर्व शरीर से ही, सब कुछ अन्तिम रूप से विनिश्चित हो जाता है, तब बाबा को यह कहने की जरूरत क्यों होती, कि –
” भाविउ मेटि सकैं त्रिपुरारी ”
।।हरिश्शरणम्।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/08/30/ज्योतिष-एवं-मनुष्य/