अविनाशी जीव का भ्रम

परमात्मा अविनाशी हैं, अतः उनका अंशभूत जीव भी अविनाशी है- ” अविनाशि तु तद् विद्धि ” गीता-2/17 ।
किन्तु समस्या ये है कि अविनाशी होकर भी नाशवान् शरीर -संसार के साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है-
ममैवांशो जीवलोके
जीवभूतः सनातन:।
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि
प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15/7।।

अर्थात्-इस संसार में जीव बना हुआ आत्मा स्वयं मेरा ही सनातन अंश है।परन्तु वह प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है अर्थात् अपना मान लेता है।
इस प्रकार अपनी बुद्धि से आत्मा का तादात्म्य प्राप्त कर चेतन ,अचेतन जड प्रकृति से आकृष्ट हो माया वश शरीरों को धारण करता रहता है ।
सुख प्राप्ति की कामना से स्वयं ” सुखराशी” दुखराशी प्रकृति के गुणों से आकर्षित होकर भटकता रहता है।
दु:खरूप संसार के साथ मैं-मेरे पन का सम्बन्ध मानकर ही जीव दु:खी होता है।शरीर संसार से थक हार कर जब, इन सुखाभासों से सम्बन्ध विच्छेद होता है, तब आत्यंतिक सुखानुभूति होने लगती है-

स ब्रह्मयोग-युक्तात्मा
सुखमक्षय्यमश्नुते।।5/21गीता।।
जैसै घर में पारस होते हुए भी कोई द्वार-द्वार जाकर भीख माँगे,ऐसे ही चेतन अमल सहज सुखराशी सांसारिक भोगसंग्रह में लग कर, फल रुप में दु:ख प्राप्त करता है-‘परिणामे विषमिव’ (गीता18/38)।
सुखाभासी सुख में संलग्न मनुष्य हमेशा भ्रम में रहकर दुखराशी बना रहता है।संसार में विद्यमान अन्यान्य लम्पटों, छद्मवेशी धार्मिकों, और वासना वासित कपटमुनिवेश धारकों के प्रति अन्ध श्रद्धाकृष्ट होकर परिवार ,समाज और स्वयं का नाश करता है।
ऐसे लोगों को पहचान कर उनसे विरत रहने की आवश्यकता है ।गोस्वामी जी ने इस कलिकाल में ऐसे लोगों से सावधान रहने के लिये ही मानस के उत्तर कांड में कुछ बातें कहीं हैं।उन्हीं का उल्लेख कर इस प्रकरण को विराम दिया जा रहा है-
मिथ्यारंभ दंभरत जोई।
ता कहु सन्त कहै सब कोई।।
सोइ सयान जो पर धनहारी।
जो कर दंभ सो बड़ आचारी।।
जो कह झूँठ मसखरी नाना।
कलजुग सोइ गुनवन्त बखाना।
निराचार जो श्रुतिपथत्यागी।
कलिजुग सोइ ग्यानी सो विरागी।।
जाके नख अरु जटा विशाला।
सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला।
अशुभ वेशभूषन धरे,
भच्छाभच्छ जे खाहिं।
तेइ जोगी ते सिद्ध नर
पूज्य ते कलिजुग माँहिं।।
जे अपकारी चार
तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ।
मनक्रम बचन लबार
तेइ बकता कलिकाल महुँ।।
गुरु सिख बधिर अंधकर लेखा
एक न सुनै एक नहिं देखा।।
हरै शिष्य धन शोक न हर -ई
सो गुरू घोर नरक मह पर-ई।
पर त्रिय लंपट कपट सयाने।
मोह द्रोहममता लपटाने।।
ते अभेद बादी ग्यानी नर।
मैं देखा चरित्र कलिजुग कर ।

कलिमल ग्रसे धर्म सब,
लुप्त भये सदग्रन्थ।
दंभिन्ह निज मति कल्पि करि
प्रगट किये बहु पंथ।।

इसलिये ऐसे मिथ्याचारियों से सावधान रहें।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/08/27/अविनाशी-जीव-का-भ्रम/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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