आशा त्याग करना पड़ेगा

आशा अर्थात् विषयाशा तो विष के समान अवश्य ही त्याज्य है।इसी कारण मन अनेकाग्र रहता है ।क्योंकि एक आशा की पूर्ति हो जाने पर, दूसरी उपजती है और दूसरी के पूरा होते ही, तीसरी आ खड़ी होती है।ऐसे ही यह क्रम निर्बाध चलता रहता है, कहीं भी विश्रांति या विश्राम नहीं है।

” आशा ” शब्द की निष्पत्ति संस्कृत की “आस् ” धातु से है,जिसका अर्थ है बैठना, स्थिर होना।
आस्यते आस्थीयते (संसार-
शरीरादौ मन:)अस्याम् इति आशा ।
जिस(शरीर संसार)में मन ,वचन कर्मादि से स्थिर/स्थित , होता जाये, वह आशा है।

दूसरे शब्दों में मन ,जब जीवनान्त सांसारिक भोग्य पदार्थों में स्थित रहकर, उसकी पूर्ति में सतत प्रयत्नशील हो, तब ऐसी मनोदशा ” आशा ” है।तात्पर्यत: विषयों को आसन देकर बैठा लेना आशा है।
इस ” आशा ” को भर्तृहरि ने अपने वैराग्य शतक में एक नदी का नाम दिया है।जिस नदी में मनोरथ का जल भरा हुआ है।उस जल में अप्राप्य तृष्णा की आकुल तरंगें हिलोरें ले रही हैं।अभीष्ट पदार्थ के प्रति प्रेमराग रूप घड़ियाल-मगरमच्छ घूम रहे हैं। अमुक अमुक वस्तु कब मिलेगी, ऐसे तर्क-वितर्क रुप पक्षी-गण उस नदी में विहार कर रहे हैं।यह धैर्य रूपी वृक्ष को अपनी लहरों से उखाड़ फेंकती है।मोह की भयंकर भँवरियाँ, जिसमें बराबर उठ रही हैं तथा उँची-उँची चिन्ताओं के दुस्तर तट के मध्य, जो आशा नदी बह रही है, उससे पार पाना बहुत कठिन है।इसके पार वही जा सकते हैं, जो विशुद्धान्त:करण वाले योगी हों।अतः आशा त्याग श्रेयस्कर है-

आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरंगाकुला
रागग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी।
मोहावर्तसुदुस्तरातिगहना
प्रोत्तुंगचिन्तातटी
तस्याः पारगता विशुद्धमनसो
नन्दन्ति योगीश्वरा:।।10।।

इसीलिए आचार्य शंङ्करने अपने “अपरोक्षानुभूति” में गुरू देवता की भक्ति से मन की परिपक्वता पर जोर दिया है ,जिससे प्रत्यक्ष परमानुभूति सिद्ध होती-
परिपक्वं मनो येषां
केवलोयं च सिद्धिद:।
गुरुदैवतभक्तानां
सर्वेषां सुलभो जवात् ।।144।।

और मानव तन के लिये तो ऐसी विषयाशा करना, अमृत छोड़ कर विष ग्रहण करने जैसा है।
कलिकलुषनाशनावतार बाबा तुलसी के शब्दों से यह प्रकरण पटाक्षिप्त हो रहा है-

नर तन पाइ विषय मन देहीं।
पलटि सुधा ते शठ विष लेहीं।।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/08/26/आशा-त्याग-करना-पड़ेगा/

Unknown's avatar

Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

Leave a comment