संस्कृत लक्षणग्रन्थों के अभिनव व्याख्याकार तन्त्रज्ञ अभिनवगुप्त पादाचार्य ने भगवान शिव की एक स्तुति की है।स्तुति के अनुसार-आत्मा शिव, मति शिवा, सहचारी प्राण, शरीर गृह, विषय सामग्री पूजा, निद्रा समाधि,पदसंचार प्रदक्षिणा, सारे शब्द स्तोत्र यहाँ तक कि जो -जो कर्म सम्पादित हो रहे हैं, वे सभी शिव की स्तुति ही हैं।
आत्मा(शिव)से बुद्धि(शिवा)का तादात्म्य होना अहं ब्रह्मास्मि की अवधारणा का पोषण करने वाला है।शरीर संचार हेतु प्राणादि वायु हैं।शरीर मे आत्मा का अधिष्ठान होने से वह आत्मा का घर है।विषयों से ईश्वरीय पूजा निरन्तर हो रही है ।और निद्रावस्था ही समाधि की अवस्था है।
शरीर की सामान्य रूप से तीन अवस्थायें हैं- 1-जाग्रत्
2-स्वप्न और 3-सुषुप्ति ।
अद्वैत वेदान्त की प्राथमिक पुस्तक ” वेदान्तसार “के कर्ता सदानन्द योगीन्द्र ने इस सुषुप्ति की चर्चा करते हुए कहा-” सुखमहम् अस्वापम् ” अर्थात्
जागरण(काल) अवस्था में हम कहते हैं ,मैं सुखपूर्वक सोया ।
यहाँ उक्त ” मैं ” ही आत्मा है।
इस समय शरीर तो अनेक इन्द्रियों सहित सोया रहता है, किन्तु असंगी आत्मा जाग्रत् काल में आभास कराता है, वह त्रिकालाबाधित सर्वसाक्षी था, शरीर के शयन का।
स्वप्नावस्था तो संसार के प्रपंच की तरह असद् ही है।
जाग्रत् काल में भी असत्प्रपंच ही भासता है।
इस प्रकार निद्रा काल में अनुभूत सुखशयन का बोद्धा ही असंगी ” आत्मा ” सिद्ध हुआ।
इस सम्बंध में यह भी ध्यान देने योग्य है कि, वह स्त्री शरीर था अथवा पुरुष शरीर यह भी भान नहीं होता।अतः उस “आत्मा ” का गुणों से परे होना और स्त्री-पुरूष भिन्न नपुंसक लिंगस्थानी ” ब्रह्म “सत्ता मात्र भी स्वत: सिद्ध होता है।
आचार्य शङ्कर ने अपने ग्रन्थ
” अपरोक्षानुभूति ” में उपर्युक्त बिन्दु से हटकर अवस्था त्रय को गुणोद्भूत मानते हुए वर्णन किया है-
यथैव व्योम्नि नीलत्वं
यथा नीरं मरुस्थले।
पुरुषत्वं यथा स्थाणौ
तद्वद् विश्वं चिदात्मनि।।
।।61।।
जिस प्रकार आकाश में नीलता, मरुस्थल में जल और ठूंठ में पुरुष की प्रतीति होती है उसी प्रकार चेतन आत्मा में विश्व भासता है।
।।हरिश्शरणम्।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/08/22/निद्रा-समाधि-है/
प्रणाम
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हरिश्शरणम्
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