भगवत् प्राप्ति में सभी का अधिकार

गीता के नवम अध्याय में भगवान् ने अर्जुन से एक प्रतिज्ञा कराई है कि ,” हे अर्जुन तुम संकल्प करो कि मेरे भक्त का नाश नहीं होता”। इसमें आश्चर्य होता है कि उपदेष्टा भगवान् स्वयं प्रतिज्ञा नहीं करते, बल्कि अर्जुन से कराते हैं।फलितार्थ ये है कि भगवान् लोकहित में अपनी प्रतिज्ञा तो अवश्य तोड़ते हैं, किन्तु भक्त के संकल्प की सर्वविध रक्षा करते हैं।
भगवान् अंशी हैं और भक्त उनका अंश(ईश्वर अंश जीव अविनाशी।चेतन अमल सहज सुखराशी।।)अंश अपने अंशी के स्वरुप को प्राप्त हो तो यह उसकी स्वाभाविकता है।
उसे अपने अंशी से अभिन्न होना चाहिए, किन्तु नाना जन्मों के नाना शरीरों के प्रारब्ध वशात् वह भटकता रहता है लेकिन ज्यौं ही उसकी बुद्धि इस निश्चय पर पहुँचती है, कि संसार के भोग्य पदार्थों के भोग करते रहने पर एक के पूर्ण होने बाद दूसरे भोग आपतित हैं और
लिप्सा और अधिक बलवती होती जा रही है अतः मुझे तो कुछ ऐसा चाहिए जिसके बाद कोई कामना ही शेष न रहे।
अन्ततः ऐसी दृढ निष्ठा आती भी इसीलिए है किअंशी परमात्मा, चेतन, अमल और सहजसुखराशि है तो अंश भी तत् स्वभावापन्न ही होगा समय चाहे जो लग जाय।
इसीलिये भगवान् कहते हैं कि कोई पूर्व जन्मों में कितना बड़ा पापकर्मा हो,उसे उतनी ही सहजता से भगवत् प्राप्ति होगी जितनी की एक धर्मात्मा को बशर्ते उसकी धर्म वृत्ति प्रवृत्ति उद्भूत हो जाये।वह देह और आत्मा को पृथक् देखना आरम्भ करता है तो अंशी से उसकी अभिन्नता संकल्पबद्ध होती जाती है और मुक्ति मार्ग प्रशस्त होता जाता है।इसलिए कहते हैं-

अपि चेत् सुदुराचारो
भजते माम् अनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः
सम्यग् व्यवसितो हि स:।।30।।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा
शश्वत् शान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि
न मद्भक्तः प्रणश्यति।।31।।

अर्थात् यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव यानी कि क्रमशः अंशी-अंश-परमात्म -जीव के आधाराधेय सम्बन्धत्वेन अभिन्न भाव से मत्परायण होकर मुझे सतत भजता है, तो वह साधु ही मानने योग्य है।क्योंकि वह सम्यक् (भलीभाँति)व्यवसित
(यथार्थ निश्चयी)है।
इसीलिए वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और शश्वत्(नित्य स्थायी)शान्ति को प्राप्त कर लेता है।तुम संकल्प कर लो कि मेरे भक्त का नाश(पतन) नहीं होता।
मानसकार के शब्दों में-
सनमुख होइ जीव मोहिं जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
मतलब कि भगवान् के सन्मुख
(शरणागत)होते ही , भक्त के कोटि-कोटि जन्मों का पाप नष्ट हो जाता है और तत्क्षण भगवत् प्राप्ति भी ध्रुव हो जाती है।
इस प्रकार भगवत् प्राप्ति में
पापात्मा, दुरात्मा, स्त्री-पुरूष
उच्च-नीच कुलादि का कोई भेदभाव नहीं है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/08/19/भगवत्-प्राप्ति-में-सभी-का/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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