कर्म का हेतु

गीता के अठारहवें अध्याय में भगवान् ने कर्म के हेतु भूत रहस्यों की चर्चा की है। दूसरे अध्याय में सबसे पहले”कर्मणि एव अधिकार: ते” का उपदेश करते हुए मानव-मात्र को कर्म में स्वतंत्र बताया है।मानवेतर जातियाँ भोगमात्र योनियाँ सिद्ध हैं।अन्ततः मानव ही भोग के साथ, कर्माधिकार प्राप्त सिद्ध होता है।
आगे चलकर “मोक्षसन्यास”
योग के अन्तर्गत (1) अधिष्ठान
अर्थात् परमात्मा(2)कर्ता अर्थात् व्यक्ति(3)करण अर्थात्
मन,बुद्धि, अहंकार-इन्द्रियादि
(4)विविध पृथक् चेष्टाएँ अर्थात्
अंगसंचालनादि ,संकल्पविकल्पादि (5) दैव अर्थात् भाग्य ,प्रारब्ध या अदृष्ट
ये सभी पाँचों मिलकर सभी मानवीय कर्मों के कारण होते हैं।
इन्हें मनुष्य , शरीर-मन-वचन
से करता है।
इन कर्मों ,न्याय्य(शास्त्र विधि
से किये हुए शुभ) अथवा इसके
विपरीत ,शास्त्रविधिहीन अशुभ
सभी में, जो केवल अपने को
(आत्मा को)ही कर्ता मानता है,
वह अकृतबुद्धि वाला है।वह अज्ञानी मलिन बुद्धि के कारण
यथार्थ सत्य को नहीं जानता।

अधिष्ठानं च कर्ता
करणं च पृथग् विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा
दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।
शरीरवाङ्मनोभि:
यत्कर्म प्रारभते नर:।
न्याय्यं वा विपरीतं वा
पञ्चैते तस्य हेतव:।
तत्रैवं सति कर्तारम्
आत्मानं केवलं तु य:।
पश्यति अकृतबुद्धित्वात्
न स पश्यति दुर्मति:।।
18/14,15,16

सत्संग एवं शास्त्रों के अभ्यास द्वारा तथा विवेक-विचार और शमदमादि आध्यात्मिक साधनों द्वारा, जिनकी बुद्धि शुद्धि नहीं होती है- ऐसे प्राकृत अज्ञानी मनुष्य को ” अकृतबुद्धि ” कहते हैं अतः, यहाँ “अकृतबुद्धित्वात्”
पद से कर्ता मानने का हेतु बताया गया है।अभिप्राय यह है कि समस्त कर्मों की पूर्णता में
उपर्युक्त अधिष्ठानादि ही पाँच कारण हैं।
असंगी आत्मा का उन पाँचों के साथ कोई सम्बन्ध नहीं।अतः भगवदुक्त उपर्युक्त पाँचों को कर्मों के कारणस्वरूप समझते हुए कर्मों में प्रवृत्त होने पर मुक्तपथ प्रवृत्ति होगी।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/08/18/कर्म-का-हेतु/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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